पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव 2026 का जनादेश धीरे-धीरे आ रहा है, लेकिन उससे पहले राज्य का राजनीतिक भविष्य साफ हो चुका है। राज्य में पिछले 15 सालों से सत्तारूढ़ टीएमसी का किला ढ़ह गया है और भाजपा का कमल लहलहाकर खिल गया है। यह सामान्य चुनावी परिणाम नहीं है बल्कि बंगाल की राजनीतिक संरचना, क्षेत्रीय दलों और गठबंधनों के साथ ही राष्ट्रीय राजनीति की दिशा तीनों को प्रभावित करने वाला एक निर्णायक मोड़ है। 2011 से पहले जिस तरह टीएमसी लेफ्ट को पूरी तरह से धराशायी कर सत्ता में आई थी, लगभग उसी तरह अब भाजपा ने डेढ़ दशक तक सत्ता में रही ममता बनर्जी की अगुवाई वाली तृणमूल कांग्रेस को हटा दिया है। भारतीय जनता पार्टी का बंगाल की सत्ता तक पहली बार पहुंचना,ये कोई साल दो साल की कहानी नहीं है, बल्कि इसकी जमीन कई सालों से तैयार हो रही थी। आज हम उन्हीं कारणों और भाजपा की रणनीतियों को समझेंगे कि कैसे बंगाल में ये पावर शिफ्ट संभव हो पाया।
2011 से 2026 सत्ता विरोधी लहर
बंगाल के राजनीतिक इतिहास पर नजर डालें तो वहां 2011 का चुनाव बड़ा बदलाव का प्रतीक बना था। तब युवा ममता बनर्जी ने 34 साल से बंगाल में काबिज वाम मोर्चा सरकार को उखाड़ फेंका था। उस समय ममता बनर्जी ने परिवर्तन के लिए लेफ्ट के खिलाफ एंटी-इंकम्बेंसी,उद्योगों-कारोबार का पतन और ग्रामीण असंतोष ने तब तृणमूल कांग्रेस को मजबूती दी थी। अब 15 सालों बाद फिर से बंगाल में इतिहास ने खुद को दोहराया। स्ट्रीट फाइटर की छवि वाली ममता बनर्जी के कार्यकाल में धीरे-धीरे भ्रष्टाचार, हिंसा, महिलाओं के प्रति अपराध जैसे -आरजीकर केस से घिर गई। वहीं भाजपा ने इन सबको टीएमसी के खिलाफ अपने हथियार के तौर पर प्रयोग किया। भाजपा ने इन सबको अपने मुद्दों में शामिल किया और टीएमसी सरकार के 15 साल की रिपोर्ट कार्ड जनता के सामने पेश की। जिसका फायदा उसे रिकॉर्ड तोड़ 92% से अधिक मतदान के दौरान दिखा। भारत के चुनावी इतिहास में इतने बड़े स्तर पर मतदान को अक्सर बदलाव की सामूहिक इच्छा का संकेत माना जाता है और वोटिंग परसेंटेज आने के बाद जैसा राजनीतिक विश्लेषक कह रहे थे कुछ वैसा ही हुआ।
ममता के 1500 पर भाजपा के 3,000 रुपये पड़े भारी
बंगाल में भाजपा की जबरदस्त लहर का आधार उसकी आक्रामक कल्याणकारी मुहिम भी रही। सीएम ममता बनर्जी की 'लक्ष्मी भंडार'योजना को लंबे समय से एक अभेद्य सामाजिक सुरक्षा कवच माना जाता रहा था,लेकिन भाजपा ने इस बार टीएमसी के इस कवच को भी भेद दिया। भाजपा ने अपने घोषणापत्र में 'भरोसे के वादा' किया और टीएमसी की सबसे बड़ी ताकत को ही उसकी कमजोरी बना दिया। टीएमसी द्वारा प्रस्तावित बढ़ोतरी से दोगुनी यानी 3,000 रुपये मासिक सहायता राशि का वादा करके भाजपा ने राज्य के विशाल महिला वोट बैंक को सफलतापूर्वक अपने पक्ष में कर लिया।
SIR और मतदाता संरचना का बदलाव
2026 चुनाव का सबसे विवादास्पद और निर्णायक पहलू रहा SIR रहा। इस प्रक्रिया के तहत 90 लाख नाम मतदाता सूची से हटाए गए, जिससे कुल वोटरों की संख्या में भारी बदलाव आया। तृणमूल कांग्रेस ने इसके जरिए अल्पसंख्यकों और खास समुदायों को निशाना बनाने का आरोप लगाया और इसके खिलाफ सुप्रीम कोर्ट तक पहुंची। वहीं भाजपा ने इसे फर्जी वोटर्स की सफाई बताया।
एसआईआर के तहत मतदाता सूची से लगभग 90 लाख नाम हटा दिए गए,जो मतदाताओं की कुल संख्या का लगभग 12% है। इनमें से 60 लाख से अधिक को अनुपस्थित या मृत घोषित कर दिया गया,जबकि 27 लाख के मामले न्यायाधिकरणों के समक्ष लंबित रहे। विचाराधीन लोगों में से लगभग 65% मुस्लिम थे,और मतुआ समुदाय के दलित (नामासुद्र)हिंदू भी इससे काफी प्रभावित हुए।
पश्चिम बंगाल में मतदाताओं की कुल संख्या 7,04,59,284 (7.04 करोड़) थी,जिसमें विचाराधीन नामों को शामिल नहीं किया गया है। एसआईआर प्रक्रिया से पहले यह संख्या 7,66,37,529 (7.66 करोड़) थी। इससे मतदाता सूची में 61 लाख से अधिक नामों का परिवर्तन हुआ है।
भारी सुरक्षा व्यवस्था से निकला वोटरों का डर
इस बार बिना हिंसा चुनाव कराने के लिए आयोग ने पश्चिम बंगाल में केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बलों की 2407 कंपनियों, यानी लगभग 2.4 लाख कर्मियों को तैनात किया। यह 2021 के विधानसभा चुनाव के लिए तैनात 725 कंपनियों से तीन गुना से अधिक और 2024 के आम चुनाव के दौरान राज्य में तैनात 92,000 कर्मियों से लगभग तीन गुना अधिक है। वहीं, केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बल (सीएपीएफ)के 24 लाख कर्मियों की तैनाती भी 2021 की संख्या से तीन गुना अधिक रही। इससे राज्य में बिना हिंसा और शांतिपूर्वक चुनाव के लिए शील्ड बनी। जिससे मतदाता सिंडिकेट राज के डर के बिना मतदान कर पाए।
सरकारी कर्मियों की नाराजगी, भाजपा की जीत का कारण
बंगाल में भाजपा की जीत का बड़ा कारण ममता सरकार के प्रति सरकारी कर्मियों की नाराजगी भी रही। बंगाल के राज्य कर्मियों में वित्तीय समानता को लेकर लंबे समय से वर्तमान सरकार से असंतुष्टता देखी जा रही थी। वे लंबे समय से सातवें वेतन आयोग को लागू करने की मांग कर रहे थे। भाजपा ने उनकी इस नाराजगी को भुनाते हुए अपने घोषणापत्र में वादा किया कि भाजपा 7वें वेतन आयोग को लागू करेगी और 45 दिनों के भीतर सभी महंगाई भत्ते के बकाया का भुगतान भी करेगी। इसने राज्य सरकार के कर्मचारियों पर टीएमसी के प्रभाव को बेअसर कर दिया। इस तरह 'वेलफेयर पॉलिटिक्स'पहली बार इतनी आक्रामक और प्रतिस्पर्धी हो गई,जिसने चुनावी गणित को पूरी तरह बदल दिया।
‘डबल इंजन’ बनाम ‘बंगाली अस्मिता’
इस बार बंगाल में चुनाव के दौरान दो बड़े नैरेटिव आमने-सामने थे। जहां ममता बनर्जी ने “बंगाली अस्मिता” और क्षेत्रीय पहचान को केंद्र में रखा, वहीं नरेंद्र मोदी और बीजेपी ने डबल इंजन सरकार का नारा दिया यानी केंद्र और राज्य में एक ही पार्टी की सरकार होने से तेज विकास। भाजपा ने इसके लिए अन्य भाजपा शासित राज्यों का उदाहरण भी दिया और यूपी और असम जैसे राज्यों के सीएम को भी बंगाल में प्रचार के लिए उतारा। इसके साथ ही इस बार बीजेपी ने अपनी रणनीति भी बदली।उसने बंगाल में खुद को 'आउटसाइडर'की छवि से बाहर निकाला।
'बाहरी' होने की धारणा को बेअसर करना
शायद भाजपा की सबसे बड़ी रणनीतिक सफलता अपने आपको 'बंगाली रंग'देना रही। कुर्माली और राजबोंगशी भाषाओं को आठवीं अनुसूची में मान्यता देने का वादा करके और उत्तरी बंगाल की पहाड़ियों के लिए स्थायी राजनीतिक समाधान का प्रस्ताव रखकर भाजपा ने उप-राष्ट्रवाद पर टीएमसी के एकाधिकार को समाप्त कर दिया। ममता बनर्जी ने 2021 में जिस "दिल्ली के जमींदार" के नारे का प्रभावी ढंग से इस्तेमाल किया था,वह 2026 में बेअसर साबित हुआ,क्योंकि भाजपा ने जंगलमहल और उत्तरी बंगाल क्षेत्रों में गहरी जड़ें जमा चुकी क्षेत्रीय आकांक्षाओं का समर्थन किया।
'महत्वाकांक्षी बंगाल' का प्रचार
इस बार भाजपा का चुनाव प्रचार विकास, कानून व्यवस्था और पहचान की राजनीति पर केंद्रित रहा है। राजनीति के चाणक्य कहे जाने वाले अमित शाह ने बंगाल में डेरा डाल दिया। इसके अलावा,योगी आदित्यनाथ और हिमंता बिस्वा सरमा सहित भाजपा के अन्य स्टार प्रचारकों ने भाजपा के एजेंडे में'महत्वाकांक्षी बंगाल' को प्रचारित किया। भाजपा ने 1 करोड़ नौकरियों के सृजन और राज्य को रसद केंद्र में बदलने का वादा करके,भाजपा ने एक विशाल औद्योगिक योजना प्रस्तुत की।
2029 के लिए बंगाल में ममता की हार इंडिया ब्लॉक के लिए झटका
बंगाल में भाजपा की हार विपक्षी इंडिया ब्लॉक के लिए एक बड़ा झटका है। ममता बनर्जी, जिन्होंने खुद को भाजपा के राष्ट्रीय वर्चस्व की प्रमुख चुनौती के रूप में पेश किया था,अब एक अनिश्चित राजनीतिक भविष्य का सामना कर रही हैं। कोलकाता में भाजपा की जीत ने 2029 के लोकसभा चुनावों से पहले राष्ट्रीय स्तर पर पहले से ही कमजोर हो रहे इंडिया ब्लॉक को एक स्पष्ट संदेश दिया है।