शेख हसीना के अलावा इन नेताओं को भी सुनाई गई थी मौत की सजा।(फोटो सोर्स: टाइम्स नाउ नवभारत)
Sheikh Hasina Death Sentence: बांग्लादेश की अपदस्थ प्रधानमंत्री शेख हसीना को मौत की सजा सुनाई गई है। बांग्लादेश के अंतरराष्ट्रीय अपराध न्यायाधिकरण (ICT-BD) ने कथित मानवता के विरुद्ध अपराध के मामले में उन्हें सजा सुनाई।
15 साल तक देश के सत्ता की बागडोर संभालने वाली शेख हसीना अपनी बहन के साथ पिछले साल अगस्त महीने में जान बचाकर बांग्लादेश छोड़ भारत में शरण ली थी।
बांग्लादेश के राष्ट्रपिता कहे जाने वाले शेख मुजीबुर रहमान को भी सेना ने सत्ता से बेदखल कर दिया था। इतना ही नहीं बांग्लादेश की सेना ने 15 अगस्त, 1975 को तख्तापलट के इरादे से उनके धनमंडी 32 स्थित आवास पर धावा बोल दिया था। शेख मुजीबुर रहमान के साथ-साथ उनकी गर्भवती बहू और कई कर्मचारियों की सेना ने हत्या कर दी थी।
इतिहास में झांके तो शेख हसीना पहली ऐसी नेता नहीं है, जिसे फांसी की सजा सुनाई गई हो। इससे पहले भी कई ऐसा ताकतवर राजनेता और तानाशाह हुए, जो विद्रोह और सैन्य तख्तापलट के शिकार हो चुके हैं। आइए आज ऐसे 5 राजनेताओं का जिक्र करें, जिन्हें अदालत ने या सेना ने मौत की सजा सुनाई।
इराक के पूर्व राष्ट्रपति सद्दाम हुसैन (Saddam Hussein) को साल 2003 में अमेरिका ने इराक पर हमला करने के बाद उसे पकड़ लिया था। सद्दाम हुसैन को दोजैल हत्याकांड के लिए मानवता के खिलाफ अपराधों में दोषी ठहराया गया। उसके शासनकाल के दौरान शिया समुदाय और कुर्द आबादी पर बड़े पैमाने पर अत्याचार के मामले सामने आए।
30 दिसंबर 2006 को उन्हें फांसी दे दी गई। इराक की राजधानी बगदाद के पास के इलाके ‘खादमिया’ में एक इराकी कंपाउंड में कंक्रीट से बने हुए चैंबर में उसे फांसी दी गई। इस कंपाउंड को ‘कैंप जस्टिस’ कहा गया।
हालांकि, पाकिस्तान में एक पूर्व प्रधानमंत्री भी रहे, जिसे सेना ने फांसी के फंदे पर लटका दिया। हम बात कर रहे हैं, पूर्व प्रधानमंत्री जुल्फिकार अली भुट्टो (Zulfikar Ali Bhutto) की।
साल 1977 में भुट्टो के खिलाफ चुनावी धांधली के आरोपों और नागरिक अशांति के बीच, जिया ने "ऑपरेशन फेयर प्ले" के तहत 5 जुलाई को सैन्य तख्तापलट कर भुट्टो को सत्ता से हटा दिया और मार्शल लॉ लागू किया। नरल जिया-उल-हक के फौजी शासन ने उन्हें एक राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी की हत्या का दोषी ठहराया। जुल्फिकार अली भुट्टो को 1979 में फांसी पर लटका दिया गया।
फासीवाद के जनक कहे जाने वाले बेनिटो मुसोलिनी (Benito Mussolini) की भी अंत काफी दर्दनाक हुई। इटली में फासीवाद की विचारधारा को खड़ा करने वाले मुसोलिनी ने 1922 से 1943 तक देश पर तानाशाही शासन चलाया। दूसरे विश्व युद्ध के बीच जब इटली जर्मनी के साथ खड़ा था।
दूसरे विश्व युद्ध के बीच जब उसी सत्ता कमजोर हुई तो हिटलर ने उसकी मदद की, लेकिन 1945 में जब युद्ध समाप्ति की ओर था। इसी बीच 25 अप्रैल को मित्र देशों की सेना के समर्थन से इतालवी पक्षपातियों ने मिलान और उत्तरी इटली के अन्य प्रमुख शहरों पर कब्जा कर लिया।
मुसोलिनी अपनी जान बचाने के लिए स्विट्जरलैंड भाग रहा था, तभी उसे और उसके साथी क्लारा पेटाची का पकड़ लिया गया। मुसोलिनी और पेटाची को पास के एक फार्म हाउस में ले जाया गया, जहां उन्हें रात भर रखा गया।
अगले दिन, 28 अप्रैल 1945 को दोनों क पक्षपातियों के एक फायरिंग दस्ते द्वारा मार दिया गया। दोनों को गोली मार दी गई। बाद में उनका शव भीड़ को दिखाने के लिए मिलान के सार्वजनिक चौक में उल्टा लटकाया गया।
अफगानिस्तान के पूर्व राष्ट्रपति मोहम्मद नजीबुल्लाह (Mohammad Najibullah) की मौत ऐसी घटना है, जिसकी आज भी चर्चा होती है । सोवियत समर्थित सरकार चलाने वाले नजीबुल्लाह की सत्ता 1992 में काबुल के गिरते ही खत्म हो गई।
हालात इतने बिगड़ गए कि उन्हें अपनी जान बचाने के लिए संयुक्त राष्ट्र के ऑफिस में पनाह लेनी पड़ी। चार साल तक वे उसी इमारत के अंदर बंद रहे न बाहर जा सकते थे, न राजनीति में वापस लौट सकते थे।
लेकिन 1996 में सब कुछ अचानक बदल गया। तालिबान ने काबुल पर कब्जा कर लिया और शहर में दहशत फैल गई। तालिबान लड़ाके संयुक्त राष्ट्र भवन में घुसे और नजीबुल्लाह को जबरदस्ती बाहर ले गए। न मुकदमा, न सुनवाई, न वकील कुछ भी नहीं। उन्हें सड़क पर ही बेरहमी से पीटा गया और अगले ही दिन मार दिया गया।
इसके बाद तालिबान ने नजीबुल्लाह और उनके भाई के शवों को काबुल के बीचोंबीच आर्याक चौक पर लटका दिया, ताकि पूरे शहर को यह संदेश दिया जा सके कि अब सत्ता किसके हाथ में है। नजीबुल्लाह की मौत सिर्फ एक नेता का अंत नहीं थी। यह अफगानिस्तान के उस दौर की याद है, जब कानून, न्याय और इंसानियत सब कुछ हथियारों के आगे बेबस था।
कभी रोमानिया के तानाशाह रहे निकोले चाउशेस्कू (Nicolae Ceaușescu) के खिलाफ सिर्फ दो घंटे का ट्रायल चला था और उसे मौत की सजा सुना दी गई। दरअसल, 1989 की रोमानियाई क्रांति के दौरान कम्युनिस्ट शासक निकोले चाउशेस्कू और उनकी पत्नी एलेना को विद्रोहियों ने गिरफ्तार किया। सत्ता गिरते ही उन पर एक त्वरित सैन्य अदालत में मुकदमा चलाया गया।
अदालत ने चाउशेस्कू दंपति को नरसंहार, क्रूर दमन, भ्रष्टाचार और राष्ट्र की संपत्ति लूटने जैसे गंभीर आरोपों में दोषी पाया और तुरंत मौत की सजा सुना दी। फैसला आते ही दोनों को फायरिंग स्क्वॉड द्वारा गोली मार दी गई।
यह घटना पूर्वी यूरोप में कम्युनिस्ट शासन के पतन की सबसे निर्णायक और प्रतीकात्मक घटनाओं में दर्ज है, जिसने पूरे क्षेत्र की राजनीति को नए दौर में प्रवेश कराया।
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