एक्सप्लेनर्स

रेप, हत्या और 'नरभक्षण'...इतने घिनौने आरोप लगे कि घरवालों ने भी दुत्कारा...19 साल बाद कैसे बरी हुआ सुरेंद्र कोली?

7 सितंबर, 2014 को सुरिंदर कोली मौत से चार घंटे दूर था। ब्लैक वारंट पर उसका नाम लिखा हुआ था और मेरठ जिला जेल में फांसी का प्रोटोकॉल लागू हो चुका था। 4 सितंबर को कोली को गाजियाबाद की डासना जेल से चुपचाप मेरठ ले जा या गया। फिर ऐसा क्या हुआ कि वह न सिर्फ मौत की सजा से बच गया बल्कि रिहाई भी नसीब हो गई।

Surendra Koli

कैसे आजाद हुआ सुरेंद्र कोली ? (PTI)

Surendra KoliNithari Case: निठारी कांड में 19 साल तक चले केस के बाद मुख्य आरोपी सुरेंद्र कोली अब आजाद हवा में सांस लेने वाला है। सुप्रीम कोर्ट ने कोली को आखिरी मामले से भी बरी करते हुए हुए उसकी रिहाई का रास्ता साफ कर दिया है। सुरेंद्र कोली 13 मामलों में मिली फांसी की सजा को धता बताकर सलाखों के पीछे से बाहर आ रहा है। कोली उस निठारी कांड का मुख्य आरोपी था जिसने पूरे देश को हिलाकर रख दिया था। नोएडा की कोठी में रात के स्याह अंधेरे में हुई दिल दहलाने वाली वारदात ने हर किसी के मन में खौफ पैदा कर दिया था। आखिर कैसे कोली मौत के मुंह से बच निकला, किन-किन कानूनी प्रक्रियाओं से गुजरा, किन वकीलों ने उसकी मदद की, आइए विस्तार से जानते हैं।

मौत से 4 घंटे दूर था कोली

7 सितंबर, 2014 को सुरिंदर कोली मौत से चार घंटे दूर था। ब्लैक वारंट पर उसका नाम लिखा हुआ था और मेरठ जिला जेल में फांसी का प्रोटोकॉल लागू हो चुका था। गाजियाबाद की सीबीआई अदालत द्वारा मासूमों के हत्यारे को सुनाई गई 13 मौत की सजाओं में से पहली सजा सुनाए पांच साल हो चुके थे और राष्ट्रपति द्वारा 2014 में उसकी याचिका खारिज किए जाने के बाद क्षमादान की उम्मीद भी खत्म हो गई थी। 4 सितंबर को कोली को गाजियाबाद की डासना जेल से चुपचाप मेरठ ले जा या गया जहां वह दिसंबर 2006 में निठारी कांड के लिए गिरफ्तारी के बाद से बंद था। उसकी फांसी 8 सितंबर को सुबह 5 बजे तय की गई थी। यह खबर फैल गई और मुंबई के एक वकील युग मोहित चौधरी तक पहुंच गई। अपनी दया याचिका खारिज होने के बाद कोली ने चौधरी और वकीलों पयोशी रॉय और सिद्धार्थ शर्मा को मदद के लिए लिखा था। जेल में किसी ने उसे सलाह दी थी कि वह उन तीनों से संपर्क करे जो मौत की सजा के मामलों में केस लड़ने के लिए जाने जाते हैं। कोली के उस पत्र ने सब कुछ बदल दिया। चौधरी के फोन पर आधी रात अधिवक्ता इंदिरा जयसिंह भी सक्रिय हुईं और जस्टिस एच.एल. दत्तू के पास पहुंचीं, जिन्होंने एक अन्य न्यायाधीश, जस्टिस अनिल दवे को भी जगाया। आधी रात को अदालत के कर्मचारियों को उनके घरों से बुलाया गया। कोली की फांसी की सजा रुक गई।

कोली ने हर बार खुद को बताया बेगुनाह

निठारी कांड मामले की शुरुआत पर चलते हैं। गिरफ्तारी के कुछ हफ्तों बाद, 25 जनवरी, 2007 को कोली और उसके मालिक मोनिंदर सिंह पंधेर दोनों की गाजियाबाद कोर्ट में वकीलों ने पिटाई कर दी थी। 16 अगस्त, 2007 को जब आरोप तय हुए, तो अदालत द्वारा नियुक्त वकीलों के साथ मुकदमा शुरू हुआ, लेकिन कोली ने जज से बार-बार कहा कि वह संतुष्ट नहीं है। उसने खुद ही मामलों की पैरवी की। 25 वर्षीय घरेलू नौकरानी नंदा देवी के लापता होने और हत्या से जुड़े 16 मामलों में से पांचवां मामला ऐसा था जिस पर बचाव पक्ष ने सवाल उठाए। बताया गया कि मामले में शिकायतकर्ता से भी जिरह नहीं की गई और पुलिस ने उसे कभी अदालत में पेश नहीं किया, और सिर्फ डीएनए सबूत के आधार पर यह स्थापित हो गया कि पीड़िता लापता हुई थी और कोली ने उसकी हत्या की थी।

13 मामलों में मिली थी मौत की सजा

इस मामले में पुलिस रिपोर्ट के अनुसार, नंदा के पति ने नाले में मिली एक चूड़ी और एक चप्पल से उनके अवशेषों की पहचान की थी। वह छह महीने पहले लापता हो गई थी। ज्यादातर मुकदमों में कोली ने खुद ही केस की पैरवी की थी। 2009 से 2022 के बीच बलात्कार, हत्या, और नरभक्षण के आरोपी कोली को जांच एजेंसियों ने 13 मामलों में मौत की सजा सुनाई थी। पहली सजा रिम्पा हलदर मामले में हुई थी। हाई कोर्ट ने 11 सितंबर, 2009 को कोली की मौत की सजा की पुष्टि की, लेकिन पंढेर को बरी कर दिया। दो साल बाद फरवरी 2011 में सुप्रीम कोर्ट ने कोली की दोषसिद्धि को बरकरार रखा और उसके इकबालिया बयान को स्वीकार्य बताया, हालांकि उसने दावा किया था कि उसे यातना देकर यह बयान दिया गया था। कुछ ही महीनों के भीतर, 24 से 31 मई, 2011 के बीच उसे फांसी पर लटकाने के लिए मौत का वारंट जारी कर दिया गया। उत्तर प्रदेश के राज्यपाल के पास उसकी दया याचिका दो साल से ज्यादा समय तक लटकी रही, उसके बाद अप्रैल 2013 में उसे खारिज कर दिया गया। जुलाई 2014 में राष्ट्रपति द्वारा इसे खारिज करने से पहले एक और साल बीत गया। तब तक, कोली तीन साल से ज्यादा समय तक एकांत कारावास में बिता चुका था।

राम जेठमलानी ने भी की जिरह

जयसिंह की याचिका पर सुप्रीम कोर्ट द्वारा फांसी पर रोक लगाने के बाद, उसने एक नई पुनर्विचार याचिका पर खुली अदालत में सुनवाई की अनुमति दे दी। पयोशी रॉय की टीम ने राम जेठमलानी को सलाहकार के रूप में नियुक्त किया, जो अक्टूबर 2014 में खुली अदालत में हुई पुनर्विचार सुनवाई के दौरान जस्टिस मार्कंडेय काटजू और ज्ञान सुधा मिश्रा के समक्ष निशुल्क उपस्थित हुए। जेठमलानी ने तर्क दिया कि कोली का इकबालिया बयान झूठा और अविश्वसनीय था और दबाव में लिया गया था। महत्वपूर्ण फोरेंसिक साक्ष्य - जिसमें शव परीक्षण के निष्कर्ष भी शामिल हैं, उन्हें दबा दिया गया था। जेठमलानी ने एक और अहम बिंदु पर जोर दिया कि मुकदमे के दौरान कोली को कभी भी उचित बचाव का अवसर नहीं दिया गया। सुप्रीम कोर्ट ने 28 अक्टूबर, 2014 को इस पुनर्विचार याचिका को खारिज कर दिया, लेकिन इस कार्यवाही ने मामले में कमियों को उजागर कर दिया था। 31 अक्टूबर को गैर-सरकारी संगठन पीपुल्स यूनियन फॉर डेमोक्रेटिक राइट्स ने एक याचिका दायर की, जिसमें कोली की दोषसिद्धि को चुनौती नहीं दी गई, बल्कि उसकी दया याचिका पर कार्रवाई में देरी को चुनौती दी गई।

मौत की सजा आजीवन कारावास में बदली गई

28 जनवरी, 2015 को मुख्य न्यायाधीश डी.वाई. चंद्रचूड़ की अध्यक्षता वाली हाई कोर्ट की पीठ ने इस याचिका पर सुनवाई करते हुए कोली की मृत्युदंड की सजा को आजीवन कारावास में बदल दिया। अदालत ने कहा कि उसकी दया याचिका पर कार्रवाई में लंबी और अनावश्यक देरी अनुच्छेद 21 के तहत उसके जीवन के अधिकार का उल्लंघन करती है। 2016 से 2023 के बीच जब निठारी के बाकी मामलों की सुनवाई चल रही थी, कोली के वकीलों ने हाई कोर्ट में मामलों पर बहस की। बचाव पक्ष ने बरामदगी के सबूतों की विश्वसनीयता पर भी सवाल उठाए। तर्क दिया कि जिस जगह अवशेष मिले थे, उससे सिर्फ निकटता को ही दोषसिद्धि का आधार नहीं माना जा सकता। चौधरी ने कहा कि अगर ऐसा था, तो आस-पास रहने वाले अन्य लोगों, जिनमें डी6 कोठी के डॉ. नवीन चौधरी भी शामिल हैं, जिनकी कोठी के पीछे कई खोपड़ियां मिली थीं, उनकी भी जांच होनी चाहिए थी। नवीन, जिसे पहले अंग व्यापार घोटाले में गिरफ्तार किया गया था, उससे कभी पूछताछ नहीं की गई। उन्होंने बचाव पक्ष के सबूतों का भी हवाला दिया, जिसमें दिखाया गया था कि डी5 के बाहर का नाला, जहां से हड्डियाँ बरामद हुई थीं, एक हफ्ते पहले ही साफ किया गया था। तमाम जिरह के बाद 16 अक्टूबर, 2023 को अदालत ने पंढेर और कोली दोनों को बरी कर दिया। कोर्ट ने माना कि अभियोजन पक्ष अपराध साबित करने में विफल रहा और सीबीआई की जांच को विफल बताया। पंढेर तो बरी हो गया, लेकिन कोली, रिम्पा हलधर मामले में आजीवन कारावास की सजा काटता रहा। अब सुप्रीम कोर्ट ने उसे इस मामले से भी बरी करते हुए रिहाई का आदेश सुनाया है।

क्या था निठारी हत्याकांड?

निठारी हत्याकांड का खुलासा 29 दिसंबर 2006 को नोएडा के निठारी में व्यवसायी मोनिंदर सिंह पंढेर के घर के पीछे एक नाले से आठ बच्चों के कंकाल मिलने के बाद हुआ था। अक्टूबर 2006 में या उससे पहले ही नोएडा के सेक्टर 31 से ऐसी खबरें लगातार आ रही थीं कि वहां से कुछ गरीब परिवारों के बच्चे लगातार गायब हो रहे हैं। इसी दौरान पायल नाम की एक लड़की नोएडा के सेक्टर 31 की गायब हो गई और उस लड़की की तलाश करती हुई सेक्टर 31 की डी-5 कोठी पर पहुंची। यहां से पुलिस ने 16 मानव खोपड़ियां, कंकाल के अवशेष और कपड़े बरामद किए। तब बंगले के मालिक मोनिंदर सिंह पंढेर और उसके नौकर सुरेंद्र कोली को गिरफ्तार किया गया। उनसे हुई पूछताछ में देश और दुनिया को चौंका देने वाला निठारी कांड सामने आया।

बच्चियों से रेप-मर्डर और मांस पकाकर खाने के आरोप

29 दिसंबर, 2006 को निठारी गांव से सटे नोएडा के सेक्टर 31 में बंगला संख्या डी-5 के पीछे नाले में बोरियों में 16 मानव खोपड़ियां, कंकाल के अवशेष और कपड़ों के टुकड़े मिले थे। 30 दिसंबर को कुछ और कंकाल मिले। मामले ने पूरे देश को हिलाकर रख दिया। पहली बार इस तरह का केस पुलिस के सामने आया था। तुरंत सुरेंद्र कोली और मोनिंदर पंधेर की गिरफ्तारी हुई, लेकिन पंधेर पर हल्के आरोप लगाए गए। जबकि कोली पर दुष्कर्म, अपहरण और हत्या के आरोप लगाए गए। राज्य/सीबीआई की ओर से अभियोजन पक्ष ने कहा कि कोली एक सीरियल किलर है। कहा कि कोली छोटी लड़कियों को बहला-फुसलाकर ले जाता था और फिर उनकी हत्या कर उनका मांस भी पकाकर खाता था। यानी कोली पर नरभक्षण के आरोप भी लगे थे। आरोप इतने घिनौने थे कि इस कांड के बाद कोली के घरवालों ने भी उसे दुत्कार दिया था और उससे नाता तोड़ने का ऐलान किया था। देश में अपनी तरह का यह पहला मामला था जहां आरोपी पर रेप, हत्या के साथ नरभक्षण के भी आरोप लगे थे। इस मामले की गूंज न सिर्फ देश, बल्कि विदेशों में भी सुनाई पड़ी थी।

एक्सप्लेनर्स

लेटेस्ट न्यूज

अमित कुमार मंडल
अमित कुमार मंडल Author

अमित मंडल टाइम्स नाउ नवभारत डिजिटल में न्यूज डेस्क पर Assistant Editor के रूप में काम कर रहे हैं। प्रिंट, टीवी और डिजिटल—तीनों माध्यमों में कुल मिलाकर... और देखें

End of Article