इन झीलों से नेपाल के साथ भारत पर भी मंडरा रहा खतरा
हजारों सालों से पृथ्वी ने खुद को जिस तरह बनाए रखा था, इंसानों ने विकसित होने के क्रम में इसका ऐसा दोहन किया कि इसका पारा चढ़ने लगा। पिछले सौ-डेढ़ सौ सालों में इंसानों ने इस धरती को धुएं और गैसों से इतना गंदा कर दिया कि इसकी बनावट ही बदलने लगी। यह बदलाव ही क्लाइमेट चेंज या जलवायु परिवर्तन कहलाता है। इसी बदलाव की देन है कि नेपाल के हिमालयी क्षेत्र में तेजी से पिघल रहे ग्लेशियर अब एक गहरी चिंता का विषय बन गए हैं। विशेषज्ञों ने चेतावनी दी है कि देश में मौजूद 2,000 से अधिक ग्लेशियल झीलों में से 42 झीलें ऐसी हैं, जिनमें किसी भी समय ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फ्लड यानी GLOF का खतरा पैदा हो सकता है। यह खतरा केवल नेपाल तक सीमित नहीं है, बल्कि इसकी संभावित तबाही भारत के पूर्वी राज्यों तक भी असर डाल सकती है। आइए समझते हैं क्या है यह खतरा।
इंटरनेशनल सेंटर फॉर इंटीग्रेटेड माउंटेन डेवलपमेंट (ICIMOD) के विशेषज्ञों ने नेपाल में 2,069 ग्लेशियल झीलों की सूची तैयार की है, जिनमें से 42 को “हाईली एट रिस्क” यानी अत्यधिक जोखिम वाली श्रेणी में रखा गया है। ये सभी झीलें कोसी प्रांत में स्थित हैं, जो नेपाल के सबसे संवेदनशील इलाकों में से एक है। विशेषज्ञ शरद प्रसाद जोशी के अनुसार, संखुवासभा जिले में चार ऐसी झीलें हैं, जहां लगातार निगरानी की जरूरत है। इनमें बोटखोला और मकालू क्षेत्रों की झीलें प्रमुख हैं, जबकि लोअर बारुन क्षेत्र की टल्लोपोखरी झील को सबसे अधिक जोखिम वाला माना गया है। यह झील लगभग तीन किलोमीटर लंबी और 206 मीटर से अधिक गहरी है, जो अपनी विशालता और तेजी से बदलते आकार के कारण संभावित खतरे को कई गुना बढ़ा देती है।
ICIMOD और UNDP की 2020 में जारी रिपोर्ट में भी नेपाल के साथ चीन और भारत तक फैले नदी तंत्रों में संभावित खतरनाक ग्लेशियल झीलों की पहचान की गई थी। इस रिपोर्ट में कुल 47 संभावित खतरनाक झीलों का जिक्र किया गया था, जिनमें 25 तिब्बत, 21 नेपाल और एक भारत में स्थित है। इनमें से 42 झीलें कोसी बेसिन में पाई गईं, जिससे यह स्पष्ट होता है कि यह पूरा नदी तंत्र अत्यधिक जोखिम झेल रहा है। रिकॉर्ड बताते हैं कि नेपाल में हर वर्ष जलवायु के कारण आई आपदाओं से औसतन 333 मौतें और 17 मिलियन डॉलर से अधिक की संपत्ति का नुकसान होता है। 1977 के बाद से नेपाल में 26 GLOF घटनाएं दर्ज की जा चुकी हैं और जलवायु परिवर्तन के कारण इन घटनाओं की आशंका लगातार बढ़ रही है।
कोसी नदी नेपाल के पहाड़ी क्षेत्रों से निकलकर सीधे बिहार में प्रवेश करती है। इस नदी का इतिहास पहले से ही विनाशकारी बाढ़ों से भरा रहा है। यदि नेपाल के ऊपरी इलाकों में स्थित कोई जोखिम वाली ग्लेशियल झील टूटती है, तो इसका असर कुछ ही घंटों में भारत तक पहुंच जाएगा। अरुण घाटी, पूर्वी नेपाल की कई बस्तियां और आगे चलकर बिहार के तराई क्षेत्र तक अचानक आई बाढ़ से प्रभावित हो सकते हैं। रिपोर्टें यह भी बताती हैं कि तिब्बत में स्थित 13 ग्लेशियल झीलें भी नेपाल और भारत के उत्तरी इलाकों के लिए गंभीर खतरा पैदा कर सकती हैं, क्योंकि ये झीलें भी उन्हीं नदियों के सिस्टम से जुड़ी हैं।
GLOF की स्थिति में केवल जनहानि ही नहीं होती, बल्कि बिजली परियोजनाएं, माइक्रो-हाइड्रो प्लांट, सड़कें, पुल, खेती की जमीन और नदी किनारे बसे गांव पूरी तरह तबाह हो सकते हैं। नेपाल के कई बांध और हाइड्रोपावर प्रोजेक्ट सीधे उन नदियों के किनारे बनाए गए हैं जो ग्लेशियल झीलों से फलती-फूलती हैं, इसीलिए इनके जोखिम कई गुना बढ़ जाते हैं। भारत के लिए भी यह खतरा उतना ही बड़ा है, क्योंकि तराई के अधिकांश क्षेत्र खेती पर निर्भर हैं और कोसी के उफान से बड़े पैमाने पर नुकसान हो सकता है।
ICIMOD और नेपाल सरकार मिलकर कई कदम उठा रहे हैं, जिनमें झीलों की नियमित निगरानी, सैटेलाइट इमेज और ड्रोन की मदद से उनकी बनावट का अध्ययन और खतरनाक झीलों के जलस्तर को कम करना शामिल है। 2016 में नेपाल ने इम्जा त्सो नामक खतरनाक झील का जलस्तर कम कर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सराहना हासिल की थी। इसके अलावा, समुदाय आधारित अर्ली वार्निंग सिस्टम भी स्थापित किए जा रहे हैं, ताकि किसी भी संभावित बाढ़ की चेतावनी समय पर स्थानीय लोगों तक पहुंच सके। ICIMOD की विशेषज्ञ नीरा श्रेष्ठा प्रधान के अनुसार महिलाएं, बच्चे और बुजुर्ग किसी भी आपदा में सबसे अधिक प्रभावित होते हैं, इसलिए विशेष प्रशिक्षण और जागरूकता कार्यक्रम इनके लिए शुरू किए गए हैं।
हिमालयी क्षेत्र जलवायु परिवर्तन का केंद्र-बिंदु बन चुका है, जहां तापमान में हर साल मामूली बढ़ोतरी भी ग्लेशियरों पर अत्यधिक प्रभाव डाल रही है। जोखिम वाली झीलों की संख्या बढ़ रही है और नेपाल सहित भारत के लिए भी खतरे का दायरा लगातार बड़ा होता जा रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि अभी पर्याप्त कदम नहीं उठाए गए, तो आने वाले वर्षों में GLOF की घटनाएं और घातक रूप ले सकती हैं। यह संकट केवल पर्यावरण का नहीं, बल्कि लाखों लोगों की सुरक्षा और जीवन से जुड़ा हुआ है।
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