क्या है ला नीना और अल नीनो? एक के कारण बर्फीली ठंड तो दूसरी की गर्मी देती है झुलसा
अल नीनो और ला नीना- दोनों प्रशांत महासागर से जुड़ा हुआ एक जलवायु पैटर्न है। जिसके कारण पूरी दुनिया के मौसम में उथल-पुथल मचते रहा है। एक के कारण जहां भीषण गर्मी देखने को मिलती है, तो दूसरे के कारण , बारिश और कुछ इलाकों में भीषण ठंड।
- Curated by: शिशुपाल कुमार
- Updated Jan 30, 2026, 04:23 PM IST
आमतौर पर भारत में जब बर्फीली ठंड पड़ती है या फिर जला देने वाली गर्मी पड़ती है तो अल नीनो और ला नीना का नाम सामने आने लगता है। मौसम विभाग की ओर से कहा जाने लगता है कि ला नीना के कारण ठंड ज्यादा पड़ रही है। अल नीनो के कारण गर्मी ज्यादा पड़ रही है। अब सवाल ये है कि आखिर अल नीनो और ला नीना है क्या, दोनों में अंतर क्या है, भारत पर अल नीनो और ला नीना का क्या असर पड़ता है, किससे जला देने वाली गर्मी होती है और किससे गला देने वाली ठंड? आइए जानते हैं।
क्या है ला नीना?
ला नीना, यानि कि जब ज्यादा बारिश और ठंड पड़ती है तो इसकी बात होने लगती है। इस साल दिल्ली-पंजाब समेत उत्तर भारत में जिसके कारण भीषण ठंड पड़ रही है, उसका एक कारण ला नीना भी है। ला नीना के कारण ही हमें बर्फीली ठंड झेलनी पड़ रही है। ला नीना का संबंध प्रशांत महासागर से है। यह प्रशांत महासागर से जुड़ी हुई एक बड़ी पर्यावरणीय घटना है, जो भारत समेत पूरी दुनिया के मौसम पर अपना असर डालता है।
ला नीना कब होती है?
प्रशांत महासागर में ला नीना का जन्म तब होता है, जब भूमध्यरेखीय प्रशांत महासागर के मध्य और पूर्वी हिस्से में समुद्र की सतह का तापमान सामान्य से ज्यादा ठंडा हो जाता है। सामान्य हालात में प्रशांत महासागर में पूर्व से पश्चिम की ओर व्यापारिक हवाएं बहती हैं। ला नीना के दौरान ये हवाएं और तेज हो जाती हैं, जिससे ठंडा पानी दक्षिण अमेरिका के तट की ओर ऊपर आ जाता है। इससे समुद्र की सतह और ठंडी हो जाती है और वैश्विक मौसम चक्र बदल जाता है।
नासा अर्थ ऑब्जर्वेटरी चार्ट
ला नीना का भारत समेत पूरी दुनिया पर असर
ला नीना में भीषण बर्फीली ठंड पड़ती है। साइबेरिया से निकली ठंडी हवा हिमालय को भी पार कर जाती है और भारत में भीषण ठंड का प्रकोप हो जाता है। भारत में ला नीना को आम तौर पर मजबूत मानसून से जोड़कर देखा जाता है। इस दौरान दक्षिण-पश्चिम मानसून अधिक सक्रिय रहता है, जिससे कई हिस्सों में सामान्य से ज्यादा बारिश होती है। वैश्विक स्तर पर देखें तो ला नीना ऑस्ट्रेलिया और दक्षिण-पूर्व एशिया में भारी बारिश और बाढ़ की स्थिति पैदा कर सकती है, जबकि दक्षिण अमेरिका के पश्चिमी तट पर मौसम अपेक्षाकृत ठंडा और शुष्क हो जाता है। उत्तरी अमेरिका में इसके असर से कुछ क्षेत्रों में सर्दियां ज्यादा ठंडी और बर्फीली हो सकती हैं, जबकि अटलांटिक महासागर में तूफानों की संख्या बढ़ने की संभावना रहती है।
- भारत में दक्षिण-पश्चिम मानसून मजबूत रहता है, सर्दियों में भारी ठंड पड़ सकती है
- भारत में सूखे की आशंका कम होती है
- ऑस्ट्रेलिया और दक्षिण-पूर्व एशिया में ज्यादा बारिश
- दक्षिण अमेरिका के पश्चिमी तट पर ठंडा और शुष्क मौसम
- अमेरिका के कुछ हिस्सों में सर्दियां ज्यादा ठंडी
- अटलांटिक क्षेत्र में ज्यादा तूफान
अल नीनो और ला नीना में अंतर
| विषय | अल नीनो (El Niño) | ला नीना (La Niña) |
| मूल अर्थ | समुद्र का असामान्य रूप से गर्म होना | समुद्र का असामान्य रूप से ठंडा होना |
| समुद्री स्थिति | प्रशांत महासागर के मध्य और पूर्वी हिस्से में तापमान सामान्य से अधिक | शांत महासागर के मध्य और पूर्वी हिस्से में तापमान सामान्य से कम |
| व्यापारिक हवाएं | कमजोर पड़ जाती हैं | सामान्य से ज्यादा मजबूत हो जाती हैं |
| भारत पर असर | मानसून कमजोर, बारिश कम होने की आशंका | मानसून मजबूत, बारिश ज्यादा होने की संभावना, ठंड में वृद्धि |
| कृषि पर प्रभाव (भारत) | फसलों को नुकसान, सूखे का खतरा | खेती के लिए अनुकूल, लेकिन बाढ़ का खतरा |
| तापमान का असर | गर्मी बढ़ सकती है, लू की स्थिति | कुछ इलाकों में ठंड बढ़ सकती है |
| वैश्विक प्रभाव | खाद्य संकट, जल संकट, मौसम असंतुलन | बाढ़, तूफान, कुछ क्षेत्रों में सूखा |
अल नीनो क्या है
जैसा ला नीना प्रशांत महासागर से संबंधित जलवायु घटना है, उसी तरह से अल नीनो भी प्रशांत महासागर से ही निकलता है। अल नीनो के कारण भीषण गर्मी होती है, भारत मेंअल नीनो के कारण जला देने वाली गर्मी देखने को मिलती रही है। अल नीनो, ला नीना के ठीक उल्ट है। अल नीनो को दुनिया की सबसे प्रभावशाली जलवायु घटनाओं में से एक माना जाता है और इस पर मौसम वैज्ञानिकों की लगातार नजर रहती है।
अल नीनो कब पैदा होती है?
अल नीनो तब बनता है, जब भूमध्यरेखीय प्रशांत महासागर के मध्य और पूर्वी हिस्से में समुद्र की सतह का तापमान सामान्य से ज्यादा गर्म हो जाता है। इससे वायुमंडलीय दबाव और हवाओं का पैटर्न बदल जाता है, जिसका असर पूरी दुनिया में महसूस किया जाता है। यह मौसमी घटना हर 3 से 5 साल में होती है। इसके कारण पूर्वी हवाएं कमजोर पड़ जाती हैं। अल नीनो आमतौर पर कई महीनों से लेकर एक साल या उससे अधिक समय तक भी रह सकती है।
अल नीनो का प्रभाव (फोटो- NASA)
अल नीनो का भारत समेत पूरी दुनिया पर प्रभाव
भारत पर अल नीनो का प्रभाव आमतौर पर नकारात्मक माना जाता है। इसके दौरान दक्षिण-पश्चिम मानसून कमजोर पड़ सकता है, जिससे कई इलाकों में कम बारिश होती है। इसका सीधा असर कृषि पर पड़ता है, क्योंकि खेती का बड़ा हिस्सा मानसून पर निर्भर है। धान, दालें और तिलहन जैसी फसलें प्रभावित हो सकती हैं। बारिश की कमी से जलाशयों का स्तर गिरता है और पीने के पानी व सिंचाई की समस्या बढ़ जाती है। कई बार अल नीनो के वर्षों में गर्मी भी ज्यादा पड़ती है और लू जैसी स्थितियां बनती हैं। दुनिया के अन्य हिस्सों में भी अल नीनो का असर अलग-अलग रूप में दिखता है। ऑस्ट्रेलिया और दक्षिण-पूर्व एशिया में सूखा पड़ सकता है, जबकि दक्षिण अमेरिका के कुछ हिस्सों में भारी बारिश और बाढ़ आती है। अमेरिका में कुछ क्षेत्रों में असामान्य गर्मी तो कहीं अत्यधिक वर्षा देखने को मिलती है। अफ्रीका में कहीं सूखा तो कहीं मूसलाधार बारिश से संकट पैदा हो जाता है।
