अब कर्नाटक में 'शिव' सरकार का गठन होने जा रहा है। कांग्रेस के 'संकटमोचक' कहे जाने वाले डोड्डालाहल्ली केम्पेगौड़ा शिवकुमार (डीके शिवकुमार) को राज्य का अगला मुख्यमंत्री बनाया जा सकता है।
सिद्दारमैया ने न सिर्फ मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा दिया, बल्कि कांग्रेस आलाकमान द्वारा दी गई राज्यसभा सीट की पेशकश को भी विनम्रतापूर्वक अस्वीकार कर दिया। दरअसल, कांग्रेस आलाकमान भी भली-भांति जानता है कि भले ही उन्होंने मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा दे दिया हो, लेकिन राज्य की सियासत और कांग्रेस पार्टी के भीतर उनका रसूख आज भी बेहद मजबूत है।
सीएम पद से इस्तीफा देने के बाद सिद्दारमैया ने डीके शिवकुमार को लगाया गले।
'अहिंडा' फॉर्मूला और वफादार विधायक
सिद्दारमैया की ताकत का सबसे बड़ा स्रोत कर्नाटक का 'अहिंडा' (Alpsankhyataru, Hindulidaru, Dalitaru) सोशल इंजीनियरिंग फॉर्मूला है, जो अल्पसंख्यक, पिछड़े वर्ग (OBC) और दलितों का एक मजबूत गठबंधन है। इस सामाजिक गठबंधन की आबादी कर्नाटक में लगभग 60 प्रतिशत से अधिक है। सिद्दारमैया को इस पूरे ब्लॉक का निर्विवाद नेता माना जाता है। विशेष रूप से कुरुबा समुदाय (जिससे वे खुद आते हैं) और मुस्लिम मतदाताओं के बीच उनका ऐसा भावनात्मक जुड़ाव है, जो कांग्रेस के किसी अन्य नेता (यहाँ तक कि डीके शिवकुमार) के पास भी नहीं है।
इसके अलावा, सिद्दारमैया की सबसे बड़ी ताकत उनके वफादार विधायक हैं। पार्टी के 135 विधायकों में से एक बहुत बड़ा हिस्सा सीधे तौर पर सिद्दारमैया का वफादार माना जाता है। यही वजह है कि पद छोड़ने के बाद भी, आगामी नए कैबिनेट के गठन और मंत्रालयों के बंटवारे में उनकी राय सबसे महत्वपूर्ण रहने वाली है; क्योंकि उनके समर्थक विधायकों को नजरअंदाज करना नई सरकार की स्थिरता के लिए जोखिम भरा हो सकता है।
कर्नाटक कांग्रेस के कई विधायक सिद्दारमैया के वफादार हैं।
वेलफेयर पॉलिटिक्स की छवि
सिद्दारमैया की ताकत उनकी जन-कल्याणकारी नीतियां भी हैं। अपने पहले कार्यकाल (2013-18) में 'अन्न भाग्य' जैसी योजनाएं और हालिया कार्यकाल में कांग्रेस की '5 गारंटियों' को जमीन पर उतारने का श्रेय जनता सिद्दारमैया को ही देती है। गरीबों और ग्रामीण इलाकों में उनकी छवि एक ऐसे नेता की है जो बजट और अर्थशास्त्र को बखूबी समझता है और समाज के अंतिम पायदान पर खड़े व्यक्ति तक सीधे मदद पहुंचाता है।
शासन-प्रशासन और संगठन का लंबा अनुभव
कर्नाटक की राजनीति में पिछले 45 वर्षों के इतिहास में वे 5 साल का कार्यकाल पूरा करने वाले पहले मुख्यमंत्री बने। वहीं, पूरे इतिहास में वे देवराज उर्स के बाद दूसरे ऐसे नेता हैं, जिन्होंने मुख्यमंत्री के तौर पर अपने 5 साल का कार्यकाल सफलतापूर्वक पूरा किया। इसके अलावा, वे 9 बार के विधायक और दो बार राज्य के उपमुख्यमंत्री रह चुके हैं, और साल 2009 से ही लगातार कांग्रेस विधायक दल (CLP) के नेता के रूप में संगठन को संभाल रहे हैं।
सिद्दारमैया के पैर छूते नजर आए डीके शिवकुमार।
बेदाग और साफ छवि
सिद्दारमैया की सबसे बड़ी पूंजी उनकी बेदाग और साफ-सुथरी छवि है। उनके मुकाबले प्रतिद्वंद्वी डीके शिवकुमार पर भ्रष्टाचार के कई गंभीर आरोप हैं, जिसके चलते उन्हें जेल की यात्रा भी करनी पड़ी थी। कांग्रेस आलाकमान के मन में हमेशा यह डर बना रहा कि अगर डीके शिवकुमार को कमान सौंपी जाती है, तो भाजपा केंद्रीय जांच एजेंसियों के मामलों को दोबारा खोलकर सरकार के लिए मुश्किलें खड़ी कर सकती है।
ऐसे में यदि शिवकुमार को दोबारा जेल जाना पड़ता, तो यह कांग्रेस के लिए एक बड़ा राजनीतिक झटका होता। विशेष रूप से तब जब कांग्रेस ने खुद भाजपा के खिलाफ भ्रष्टाचार को ही अपना सबसे बड़ा चुनावी हथियार बनाया था। इन सभी परिस्थितियों के बीच सिद्दारमैया ही पार्टी के लिए सबसे सुरक्षित, विश्वसनीय और पहली पसंद बनकर उभरे।
समानांतर पावर सेंटर
उनके राज्य की राजनीति में ही बने रहने के फैसले का मतलब है कि डीके शिवकुमार के मुख्यमंत्री बनने के बाद भी कर्नाटक कांग्रेस में सिद्दारमैया एक 'समानांतर पावर सेंटर' बने रहेंगे। उनके बिना राज्य में कोई भी बड़ा राजनीतिक या प्रशासनिक फैसला लेना आसान नहीं होगा।
मतलब साफ है कि मुख्यमंत्री न रहते हुए भी राज्य की सियासत में सिद्दारमैया की धाक बनी रहेगी। डीके शिवकुमार भले ही एक बेहतरीन संगठनकर्ता और 'ट्रबलशूटर' हैं, लेकिन वोटों को सीटों में बदलने वाली जो 'मास अपील' सिद्दारमैया के पास है, उसकी कमी कांग्रेस को 2028 के विधानसभा चुनावों में भारी पड़ सकती है। यही कारण है कि पद से हटने के बाद भी कर्नाटक की सत्ता की चाबी काफी हद तक सिद्दारमैया के इर्द-गिर्द ही घूमती रहेगी।
