कर्नाटक में 2007 में हुआ था कुछ ऐसा जो आज भी लोगों को नहीं भूलता। फोटो- टाइम्स नाउ नवभारत।
Karnataka 2007 Political Crisis: कर्नाटक की राजनीति पिछले कई दिनों से अस्थिरता और अटकलों के दौर से गुजर रही थी। सत्तारूढ़ कांग्रेस के भीतर नेतृत्व परिवर्तन की चर्चाओं ने माहौल गर्म कर दिया था, जिसके चलते मुख्यमंत्री सिद्धारमैया और उपमुख्यमंत्री डीके शिवकुमार के बीच सत्ता संतुलन को लेकर तनातनी खुलकर सामने आ गई थी। मुख्यमंत्री सिद्धारमैया और डिप्टी सीएम डीके शिवकुमार के बीच बढ़ती तनातनी ने पार्टी के भीतर असहज माहौल पैदा कर दिया था। आलम यह था कि दोनों वरिष्ठ नेताओं के बीच तनाव कम करने के लिए कांग्रेस के शीर्ष नेतृत्व को परदे के पीछे से हस्तक्षेप करना पड़ा और आखिर में बीते दिन सिद्धारमैया के बुलावे पर दोनों नेताओं ने एक साथ 'सियासी नाश्ता' किया। इसके बाद दोनों एक साथ मीडिया के सामने आए और न सिर्फ एकजुटता का संदेश दिया, बल्कि पार्टी आलाकमान के निर्णय को सर्वोपरि बताते हुए किसी भी तरह की अंदरूनी कलह से इनकार किया। बता दें कि कर्नाटक के राजनीतिक इतिहास में यह पहली बार नहीं है, जब सीएम पद को लेकर इस तरह की रस्साकसी देखी गई हो, इससे पहले साल 2007 में तो राज्य ने इससे भी बुरा शक्ति संघर्ष देखा था। हम आज आपको वो पूरा किस्सा बताएंगे कि कैसे नेतृत्व परिवर्तन की सौदेबाजी जब पूरी नहीं हो सकी तो न सिर्फ भाजपा और जेडीएस का गठबंधन टूटा बल्कि सरकार ही गिर गई....
सबसे पहले चलते हैं 2004 में जब राज्य में विधानसभा चुनाव हुए। उन चुनावों में किसी भी राजनीतिक दल को स्पष्ट बहुमत नहीं मिला। उन चुनावों में भारतीय जनता पार्टी ने अपनी ताकत दिखाते हुए 79 सीटें हासिल कर सबसे बड़ी पार्टी बनकर सामने आई थी, बावजूद इसके वह सरकार नहीं बना पाई। तब 65 सीटें जीतने वाली कांग्रेस और 58 सीटें हासिल करने वाली जनता दल सेक्युलर (जेडीएस) ने सरकार चलाने के लिए आपस में गठबंधन किया। दोनों ने धरम नारायण सिंह को राज्य का सीएम बनाया। कर्नाटक के इतिहास में यह पहली बार था जब वहां गठबंधन की सरकार बनी
इसके दो साल बाद ही कांग्रेस और जेडीएस की राहें अलग हो गईं। 2006 में दोनों के बीच मतभेद हुए और गठबंधन टूट गया। तब जेडीएस ने भाजपा से संपर्क किया और दोनों ने मिलकर सरकार बनाई।
2006 में जेडीएस के कांग्रेस से अलग होने के बाद भाजपा और एचडी कुमारस्वामी के बीच एक राजनीतिक डील हुई। इसमें दोनों ने 20-20 का फार्मूला तय किया। इसमें तय हुआ कि शुरुआत के 20 महीने जेडीएस के पास सत्ता रहेगी और एच.डी. कुमारस्वामी सीएम बनेंगे। इसके बाद अगले 20 महीने के लिए भाजपा सत्ता में आएगी और तब सीएम पद भाजपा नेता बीएस येदियुरप्पा संभालेंगे।
भाजपा ने भी उस समय इस पर अपनी सहमति दे दी, क्योंकि उसे पहली बार दक्षिण भारत में अपनी पैठ बनाने के लिए रास्ता साफ दिखा। उस समय इस समझौते को कर्नाटक के राजनीतिक इतिहास में बडे और महत्वपूर्ण प्रयोग के तौर पर देखा गया।
बाद में बड़े दबाव और सार्वजनिक आलोचना के चलते जेडीएस ने आखिरकार भाजपा को अचानक समर्थन देने की घोषणा कर दी और फिर से समझौता कर लिया।इसके बाद 12 नवंबर 2007 को बीएस येदियुरप्पा ने कर्नाटक के मुख्यमंत्री पद की शपथ ले ली। हालांकि वे ज्यादा दिन सीएम नहीं रह सके। जब येदियुरप्पा को विधानसभा में अपना बहुमत साबित करना था, तब ऐन वक्त पर जेडीएस ने फिर से पलटी मार दी और मात्र सात दिन बाद ही 19 नवंबर 2007 को उनकी सरकार गिर गई।
राजनीतिक दलों में विश्वास की कमी के उस दौर में आखिरकार जब किसी दल के लिए बहुमत का कोई रास्ता नहीं बचा तो वहां राष्ट्रपति शासन लागू कर दिया गया। यह कर्नाटक की राजनीति की बड़ी उथल-पुथल थी जिसने राज्य की सत्ता व्यवस्था को पूरी तरह हिला दिया।
आखिरकार कर्नाटक राजनीतिक अस्थिरता के दौर से बाहर निकला और मई 2008 में विधानसभा चुनाव हुए। उस चुनाव में लोगों ने अस्थिरता की जिम्मेदारी जेडीएस पर डालते हुए भाजपा को भरपूर समर्थन दिया और भाजपा पहली बार दक्षिण भारत में पूर्ण बहुमत की सरकार बना पाई।
आज जब कर्नाटक में एक बार फिर सत्ता को लेकर खींचतान जारी है, तब फिर से 2007 की यादें ताजा हो जा रही हैं। तब भी सीएम पद को लेकर ही खींचतान थी। हालांकि, तब विवाद के चलते सरकार ही गिर गई थी वहीं, आज कांग्रेस नेतृत्व इसे शांत करने की कोशिश में है।
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