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इजराइल-लेबनान समझौता : नेतन्याहू, हिज्बुल्ला-बेरूत के लिए क्या हैं इस सीजफायर के मायने?

इजराइली प्रधानमंत्री नेतन्याहू का बयान पर इस सीजफायर डील पर सवाल उठाता है। नेतन्याहू ने इस डील को पूरे मन के साथ स्वीकार नहीं किया है। नेतन्याहू ने कहा है कि वह अभी लेबनान नहीं छोड़ेंगे और दक्षिणी लेबनान में आईडीएफ मौजूद रहेगी।

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Photo : AP
इजराइल-लेबनान के बीच 10 दिन का सीजफायर।
Written by: Alok Rao
Updated Apr 17, 2026, 21:11 IST

Israel-Lebanon ceasefire : मध्य पूर्व में इजराइल और लेबनान के बीच सीजफायर पर समझौता हो गया है। दोनों देशों के बीच 10 दिनों का सीजफायर हुआ है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने इस डील की घोषणा की। हालांकि, लेबनान में इजराइल के हमले लेबनान की फौज पर नहीं थे। वह हिज्बुल्ला को निशाना बनाकर हमले कर रहा था। हिज्बुल्ला को ईरान का समर्थन है। हिज्बुल्ला, ईरान के 'एक्सिस ऑफ रेजिस्टेंस' का हिस्सा है, इसमें हमास और हूथी भी शामिल हैं। यह सीजफायर डील कब तक टिकता है, यह महत्वपूर्ण है क्योंकि सीजफायर में हिज्बुल्ला नहीं है। यही नहीं, इस डील की इजराइल में आलोचना होनी शुरू हो गई है। इजराइल में कई लोग प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू की रणनीति पर सवाल उठा रहे हैं। लोगों का कहना है कि हिज्बुल्ला के खिलाफ कार्रवाई में इजराइल को अच्छी बढ़त हासिल हुई है लेकिन इस सीजफायर पर सहमत होकर उन्होंने एक तरह से अपनी यह बढ़त गंवा दी है। खास बात है कि इन 10 दिनों के भीतर इजराइल और लेबनान दोनों अपने मतभेदों को दूर करने और क्षेत्र में शांति कायम करने के दीर्घकालीन उपायों पर चर्चा करेंगे। व्हाइट हाउस ने दोनों देशों के नेताओं की एक बैठक भी प्रस्तावित की है।

हम अभी लेबनान नहीं छोड़ेंगे-नेतन्याहू

इजराइली प्रधानमंत्री नेतन्याहू का बयान इस सीजफायर डील पर सवाल उठाता है। नेतन्याहू ने इस डील को पूरे मन के साथ स्वीकार नहीं किया है। नेतन्याहू ने कहा है कि वह अभी लेबनान नहीं छोड़ेंगे और दक्षिणी लेबनान में आईडीएफ मौजूद रहेगी। उन्होंने कहा कि लेबनान के पास समझौते का अच्छा मौका है। वहीं, ट्रंप द्वारा सीजफायर की घोषणा किए जाने के बाद बेरूत की सड़कों पर लोग इस सीजफायर का जश्न मनाने लगे। लोग मोजतबा खामनेई की तस्वीर लेकर झूमते दिखे। पहले बात करते हैं कि इस सीजफायर के जरिए इजराइल और लेबनान चाहते क्या हैं और उनकी मंशा क्या है। इस सीजफायर में उनके लिए क्या है।

लेबनान ने कभी इजराइल को आधिकारिक मान्यता नहीं दी

अमेरिकी विदेश मंत्रालय की ओर से जारी प्रेस रिलीज में उन बातों का जिक्र किया गया है, जिन पर इजराइल और लेबनान में अपनी रजामंदी दी है। इसमें कहा गया है कि इजराइल और लेबनान इस बात पर सहमत हुए हैं कि दोनों देश स्थायी शांति हासिल करने के लिए माहौल तैयार करेंगे। दोनों देश एक दूसरे की संप्रभुता का सम्मान करते हुए एक-दूसरे के साथ लगनी वाली अपनी सीमा पर सुरक्षा तंत्र मजबूत करेंगे।

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इसमें खास बात यह है कि इसमें 'एक दूसरे की संप्रभुता एवं क्षेत्रीय अखंडता को पूरी तरह से मान्यता देने' पर सहमति जताई गई है। यह इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि लेबनान ने इजराइल को कभी आधिकारिक रूप से मान्यता नहीं दी है। जबकि इजराइल की मंशा अपनी सीमा के उत्तर लेबनान में करीब 30 किलोमीटर का बफर जोन बनाने की है। यही नहीं, इजराइल अपनी सुरक्षा करने को अधिकार का तर्क देकर अपने पड़ोसी देशों पर हमले करते आया है।

दक्षिणी लेबनान में इजरायली सेना की 5 डिवीजन

बीबीसी की रिपोर्ट के मुताबिक दक्षिणी लेबनान में इजराइली सेना की अभी पांच डिवीजन हैं और बीते दिन सेना के प्रवक्ता ने कहा कि इजराइल की फौज आगे बढ़ना जारी रखेगी। बीबीसी की रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि इस सीजफायर की घोषणा के बारे में नेतन्याहू के कैबिनेट को भी नहीं पता था। कैबिनेट के कई मंत्रियों के लिए यह हैरान करने वाला था। इजराइल के एक बड़े मीडिया संगठन ने कहा कि सजीफयार की घोषणा से ठीक पहले नेतन्याहू ने मात्र पांच मिनट की नोटिस पर सुरक्षा पर कैबिनेट की बैठक बुलाई। इसमें यह भी कहा गया कि मंत्रियों से सीजफायर पर कोई वोट नहीं कराया गया।

हिज्बुल्ला का निरस्त्रीकरण करना होगा इजराइल का लक्ष्य

यह समझौता कहता है कि इजराइल अपने आत्मरक्षा के अधिकार को सुरक्षित रखेगा और किसी भी समय, योजनाबद्ध, आसन्न या जारी हमलों के खिलाफ आवश्यक कदम उठा सकता है। संघर्षविराम इसके रास्ते में बाधा नहीं बनेगा। साथ ही, 'लेबनान की सरकार यह सुनिश्चित करने के लिए ठोस कदम उठाएगी कि हिज्बुल्ला और अन्य गैर-राज्य सशस्त्र समूह इजराइल के खिलाफ किसी भी तरह की कार्रवाई न करें। अगर संघर्ष विराम कायम रहता है और बातचीत आगे बढ़ती है, तो इजराइल का मुख्य लक्ष्य हिज्बुल्ला का निरस्त्रीकरण होगा। दूसरी ओर, लेबनान चाहता है कि इजराइली सेना उसकी जमीन खाली करे, पुनर्निर्माण के लिए अंतरराष्ट्रीय मदद मिले, विस्थापित लोग वापस लौटें और इजराइल में बंद लेबनानी कैदियों को रिहा किया जाए।

ईरान इसे अपनी जीत के रूप में पेश करेगा

1993 के बाद यह पहला मौका है जब लेबनान और इजराइल सीधे बातचीत कर रहे हैं। इससे पहले ज्यादातर संघर्षविराम संयुक्त राष्ट्र, अमेरिका या फ्रांस जैसे तीसरे पक्ष की मध्यस्थता से होते थे। आमतौर पर विवाद का मुद्दा यही रहा है कि इजराइल कहता है लेबनान ने हिज्बुल्ला को निरस्त्र नहीं किया, जबकि लेबनान का आरोप है कि इजराइल ने उसकी जमीन नहीं छोड़ी। देश के भीतर नेतन्याहू को भारी आलोचना का सामना करना पड़ रहा है।

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उत्तरी इजराइल के लोग, जहां हिज्बुल्ला के रॉकेट हमले होते हैं, अपनी सुरक्षा को लेकर चिंतित हैं। इसके अलावा, ईरान पहले ही कह चुका था कि उसका अमेरिका के साथ संघर्षविराम तभी टिकेगा जब लेबनान भी इसमें शामिल होगा। ऐसे में ईरान यह दावा कर सकता है कि उसने इजराइल के दो मोर्चों ईरान और लेबनान पर उसके अभियान को रोक दिया। लेबनान के राष्ट्रपति मार्च से ही सीधे वार्ता की पेशकश कर रहे थे, लेकिन इसे तब स्वीकार किया गया जब अमेरिका-इजराइल-ईरान के बीच संघर्षविराम बना।

लेबनान और हिज्बुल्ला के लिए इसका मतलब

सबसे पहले, यह आम लोगों के लिए राहत लेकर आता है। पिछले डेढ़ महीने में लगभग 1,000 लोगों की मौत हुई है और करीब 10 लाख लोग विस्थापित हुए हैं। शरणार्थी शिविर और अस्पतालों पर भारी दबाव है। संघर्षविराम के बाद, सरकार ने लोगों से तुरंत घर न लौटने की अपील की, लेकिन कई लोग वापस जाने लगे हैं। लेबनान की सरकार हिज्बुल्ला को निरस्त्र करना चाहती है, लेकिन उसके पास इसके लिए पर्याप्त संसाधन नहीं हैं। वह हिज्बुल्ला की उन कार्रवाइयों का विरोध करती है जो देश को क्षेत्रीय युद्ध में खींच लेती हैं। 2 मार्च को रॉकेट हमलों के बाद सरकार ने उसके सैन्य गतिविधियों पर रोक लगा दी थी। हालांकि, सरकार उसके साथ सीधे सैन्य टकराव भी नहीं चाहती, क्योंकि कमजोर होने के बावजूद यह संगठन अभी भी एक मजबूत ताकत है और लेबनान के कई हिस्सों में इसका जनसमर्थन है। अगर यह संघर्षविराम अंतरराष्ट्रीय समर्थन दिलाने में सफल होता है, तो लेबनान सरकार हिज्बुल्ला के खिलाफ कदम उठाने पर विचार कर सकती है, लेकिन वह गृहयुद्ध जैसी स्थिति से बचना चाहती है।

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