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भारत ही नहीं इन देशों में भी सेंध लगा चुके हैं घुसपैठिए, जानिए सरकारों पर कैसे बन गए हैं बोझ

अमेरिका, पश्चिमी यूरोप, मध्य पूर्व और एशियाई देशों में घुसपैठ की समस्या काफी बढ़ चुकी है। दशकों से भारत भी इस समस्या से जूझता आया है लेकिन इस समस्या निजात पाने के लिए भारत ने कमर कस ली है। भारत उस 'दरवाजे' को बंद कर रहा है जहां से सबसे ज्यादा घुसपैठ होती है।

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देशों के लिए बड़ी चुनौती है घुसपैठ को रोकना। तस्वीर-AI
Written by: Alok Rao
Updated May 29, 2026, 14:29 IST

Illegal Immigration Across World : घुसपैठ अथवा अवैध अप्रवासन किसी एक देश की नहीं बल्कि एक वैश्विक समस्या और चुनौती है। महाद्वीपों का कोई भी हिस्सा इस संकट से अछूता नहीं है। यह समस्या हर जगह है। संघर्ष, युद्ध, आर्थिक असमानता और जलवायु परिवर्तन जैसे कारक घुसपैठ और अवैध अप्रवासन को बढ़ावा देते हैं। अमेरिका, पश्चिमी यूरोप, मध्य पूर्व और एशियाई देशों में घुसपैठ की समस्या काफी बढ़ चुकी है। दशकों से भारत भी इस समस्या से जूझता आया है लेकिन इस समस्या निजात पाने के लिए भारत ने कमर कस ली है। भारत उस 'दरवाजे' को बंद कर रहा है जहां से सबसे ज्यादा घुसपैठ होती है। पश्चिम बंगाल से लगने वाली बांग्लादेश की सीमा पर फेंसिंग का काम शुरू हो गया है। एक बार यह काम पूरा हो जाने के बाद बांग्लादेश से होने वाली घुसपैठ पर काफी हद तक रोक लग जाएगी। यहां हम घुसपैठ और अवैध अप्रवासन का सामना करने वाले प्रमुख देशों के बारे में जानेंगे-

अमेरिका-कनाडा में घुसपैठ

यह देश अवैध या अनधिकृत प्रवासियों के लिए दुनिया का प्रमुख गंतव्य माना जाता है। यहां मुख्य रूप से मैक्सिको, मध्य अमेरिका (जैसे ग्वाटेमाला, होंडुरास) और अब बढ़ते हुए दक्षिण अमेरिका (जैसे वेनेजुएला) सहित अन्य क्षेत्रों से लोग दक्षिणी सीमा के रास्ते प्रवेश करते हैं। कनाडा में भी अनियमित सीमा पार करने के मामले सामने आते हैं, जहां कई शरणार्थी अमेरिका के रास्ते विशेष कानूनी खामियों का उपयोग करके प्रवेश करने की कोशिश करते हैं।

यूरोपीय संघ

इन दिनों पूरा यूरोपीय संघ बड़े पैमाने पर अनियमित प्रवासन का सामना कर रहा है, विशेष रूप से यहां भूमध्यसागर और पश्चिमी बाल्कन मार्गों के जरिए बड़ी संख्या में लोग नावों के जरिए अवैध रूप से दाखिल होते हैं। उत्तर अफ्रीका और मध्य पूर्व से भूमध्यसागर पार करके आने वाले प्रवासियों और शरणार्थियों के इटली, ग्रीस और स्पेन मुख्य प्रवेश द्वार हैं। इससे इन देशों को भारी प्रशासनिक, सामाजिक और राजनीतिक चुनौतियों का सामना करना पड़ता है। ब्रिटेन में भी घुसपैठ एक बड़ी समस्या बनी हुई है। यहां फ्रांस से छोटी नाव से इंग्लिश चैनल पार कर लोग अवैध रूप से दाखिल होते हैं। जर्मनी और फ्रांस यूरोप के प्रमुख आंतरिक गंतव्य देश हैं, जहां बड़ी संख्या में अनधिकृत प्रवासी अंततः बसने और शरण मांगने का प्रयास करते हैं।

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ऑस्ट्रेलिया दक्षिण-पूर्व एशिया से समुद्री रास्तों द्वारा होने वाले अनधिकृत प्रवेश का सामना करता रहा है। ऑस्ट्रेलिया ने सख्त सीमा नीतियां और ऑफशोर प्रोसेसिंग जैसी व्यवस्थाएं लागू की हैं ताकि समुद्री मार्ग से अवैध प्रवेश को रोका जा सके।

एशिया और मध्य पूर्व

तुर्की लाखों शरणार्थियों की मेजबानी करता है और यूरोप में प्रवेश करने की कोशिश करने वाले प्रवासियों के लिए एक प्रमुख ट्रांजिट देश भी है। एशिया में मलेशिया और थाईलैंड अक्सर ट्रांजिट और गंतव्य केंद्र के रूप में काम करते हैं, जहां म्यांमार और बांग्लादेश जैसे पड़ोसी देशों से बड़ी संख्या में अवैध कामगार और शरणार्थी पहुंचते हैं। तो वहीं अफगानिस्तान में अस्थिरता के कारण ईरान लगातार अनियमित सीमा पार प्रवेश का सामना कर रहा है।

भारत में 3 करोड़ तक हो सकती है घुसपैठियों की संख्या

भारत में घुसपैठ की समस्या दशकों से है लेकिन बीते दो दशकों में इसमें ज्यादा तेजी आई। बांग्लादेश से बड़ी संख्या में अवैध तरीके से वहां के नागरिक भारत में दाखिल हुए। यह संख्या करोड़ों में पहुंच चुकी है। साल 2026 में गृह राज्य मंत्री किरन रिजिजू ने राज्यसभा को बताया कि दो करोड़ से ज्यादा बांग्लादेशी नागरिक अवैध तरीके से भारत में रह रहे हैं। यह आंकड़ा दस साल पहले का है। एक्सपर्ट मानते हैं कि भारत में अभी बांग्लादेशी घुसपैठियों की संख्या तीन करोड़ से ज्यादा हो सकती है। भारत और बांग्लादेश के बीच करीब 4000 किलोमीटर लंबी सीमा है। इसमें से करीब 2200 किलोमीटर सीमा पश्चिम बंगाल के साथ लगती है। इसमें से लगभग 1600 किलोमीटर लंबी रेखा पर फेंसिंग हो चुकी है, बाकी 600 पर फेंसिंग होनी बाकी है।

ममता सरकार ने की घुसपैठ की अनदेखी

बंगाल और बांग्लादेश के बीच कई ऐसी जगहें जो पूरी तरह से खुली हुई हैं। अब सीमा सुरक्षा बल इन जगहों की फेंसिंग करेगा। घुसपैठ पर रोक लगाने के लिए सीएम सुवेंदु ने करीब 142 एकड़ भूमि बीएसएफ को सौंप भी दी है। जमीन मिलने के बाद इन जगहों पर उसने फेसिंग का काम शुरू कर दिया है। सवाल है कि यह काम पहले भी यानी ममता सरकार के समय भी हो सकता था लेकिन नहीं हुआ। फेसिंग के लिए बीएसएफ ममता सरकार से बार-बार जमीन मांगती रही लेकिन उसकी इस मांग को ठंडे बस्ते में डाला जाता रहा और घुसपैठ होती रही। घुसपैठ को लेकर राजनीतिक बयानबाजी भी खूब होती रही। सुवेंदु सरकार के एक्शन के बाद अब ममता बनर्जी से सवाल पूछे जा रहे हैं कि यह काम उनके कार्यकाल में क्यों नहीं हुआ? तो इसका जवाब यही है कि अपने राजनीतिक फायदे और मुस्लिमों के तुष्टिकरण के लिए ममता सरकार ने घुसपैठ के खिलाफ एक्शन नहीं लिया। उनकी सरकार ने घुसपैठ को बढ़ावा और उन्हें संरक्षण दिया।

अपने वादे पर आगे बढ़ रही भाजपा

रिपोर्टों में दावा किया गया है कि लाखों की संख्या में बांग्लादेशी घुसपैठियों को बंगाल में आने की अनुमति दी गई। बॉर्डर के इलाकों में उन्हें बसाया गया और वोटरलिस्ट में उनका नाम शामिल किया गया। इससे राष्ट्रीय सुरक्षा को गंभीर खतरा पैदा हुआ। घुसपैठ की समस्या से स्थानीय लोग परेशान हुए क्योंकि उनके संसाधनों पर दबाव और अतिक्रमण दोनों हुआ। लोगों के हक पर घुसपैठिए सेंधमारी करने लगे। बंगाल चुनाव में भाजपा ने इसे एक बड़ा मुद्दा बनाया। भाजपा ने वादा किया कि सरकार में आने पर वह एक-एक घुसपैठिए को बंगाल से बाहर करेगी। अब सरकार में आने के बाद भाजपा अपने इस वादे को पूरा कर रही है। बीते 11 मई को हुई अपनी कैबिनेट की पहली बैठक में सुवेंदु अधिकारी ने बीएसएफ को जमीन देने के फैसले पर मुहर लगाई। यह घुसपैठ के खिलाफ भाजपा के इरादे एवं संकल्प को दिखाता है।

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घुसपैठ से सरकारों पर बढ़ता है बोझ

अवैध घुसपैठिए दुनिया भर की सरकारों के लिए एक बड़ा बोझ बनते जा रहे हैं। इससे आर्थिक संसाधनों, राष्ट्रीय सुरक्षा और जनकल्याण योजनाओं पर गंभीर असर पड़ता है। जिन देशों में बड़े पैमाने पर अवैध प्रवासन होता है, वहां सरकारों को जनसंख्या दबाव, सीमा सुरक्षा और स्वास्थ्य, आवास, शिक्षा तथा रोजगार जैसी सुविधाओं की बढ़ती मांग से जूझना पड़ता है। सरकारों को निगरानी व्यवस्था, डिटेंशन सेंटर, निर्वासन प्रक्रिया और सीमा पर बुनियादी ढांचे को मजबूत करने पर भारी खर्च करना पड़ता है। अनियंत्रित प्रवासन से जनसंख्या रिकॉर्ड को सही बनाए रखना और सरकारी लाभों का निष्पक्ष वितरण भी चुनौती बन जाता है। कई क्षेत्रों में आशंका रहती है कि आपराधिक गिरोह, मानव तस्करी नेटवर्क और कट्टरपंथी तत्व कमजोर सीमाओं का फायदा उठाकर अवैध गतिविधियों को बढ़ावा दे सकते हैं। इससे पुलिस, खुफिया एजेंसियों और स्थानीय प्रशासन पर अतिरिक्त दबाव बढ़ता है।

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