कैसे ट्रंप ने 1 साल में बदल दिया दुनिया का समीकरण, दोस्त बने 'दुश्मन' लेकिन भारत पर नहीं चला दांव
ग्रीनलैंड का मामला सबसे ज्यादा गर्म है, इसलिए सबसे पहले बात इसी की करते हैं। ट्रंप का कहना है कि अमेरिका की राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए ग्रीनलैंड पर उनका पूरी तरह से नियंत्रण जरूरी है। ट्रंप का तर्क है कि ग्रीनलैंड के आस-पास रूस और चीन के युद्धपोत और सबमरीन देखे जा रहे हैं, ऐसे में यदि अमेरिका ने ग्रीनलैंड को हासिल नहीं किया तो दुनिया के इस सबसे बड़े द्वीप पर रूस और चीन का कब्जा हो जाएगा जो कि अमेरिका की राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए खतरा होगा।
- Written by: आलोक कुमार राव
- Updated Jan 21, 2026, 01:33 PM IST
Donald Trump one Year as US prsident: अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के दूसरी बार राष्ट्रपति बने एक साल हो गए हैं। 20 जनवरी 2025 को उन्होंने राष्ट्रपति पद का कार्यभार संभाला। अमेरिका के 45वें राष्ट्रपति के रूप में उनका पहला कार्यकाल 20 जनवरी 2017 से 20 जनवरी 2021 तक रहा। उनके इस पहले कार्यकाल को सामान्य तौर पर देखा जाता है लेकिन व्हाइट हाउस में वापसी करने के बाद वह बहुत ज्यादा आक्रामक नजर आए हैं। अपने फैसलों से उन्होंने दशकों से चली आ रही और बनी-बनाई वैश्विक व्यवस्था को हिला कर रख दिया है। कोई समझ नहीं पा रहा है कि उनका अगला कदम और निशाना क्या होगा? गल्फ ऑफ मैक्सिको को गल्फ ऑफ अमेरिका करने, पनामा कैनाल को वापस लेने, कनाडा को 51वां राज्य बनाने, वेनेजुएला पर हमला, मनमाना टैरिफ और अब ग्रीनलैंड पर उनका रुख, इन सारे फैसलों के पीछे कोई तार्किक आधार नहीं, बल्कि इसके पीछे उनकी निजी महात्वाकांक्षा और अहंकार ज्यादा है। यहां हम ट्रंप के एक काल के भीतर लिए गए कुछ अहमों फैसलों की चर्चा करेंगे।
ग्रीनलैंड के पिटुफिक में अमेरिका का सैन्य बेस
ग्रीनलैंड का मामला सबसे ज्यादा गर्म है, इसलिए सबसे पहले बात इसी की करते हैं। ट्रंप का कहना है कि अमेरिका की राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए ग्रीनलैंड पर उनका पूरी तरह से नियंत्रण जरूरी है। ट्रंप का तर्क है कि ग्रीनलैंड के आस-पास रूस और चीन के युद्धपोत और सबमरीन देखे जा रहे हैं, ऐसे में यदि अमेरिका ने ग्रीनलैंड को हासिल नहीं किया तो दुनिया के इस सबसे बड़े द्वीप पर रूस और चीन का कब्जा हो जाएगा जो कि अमेरिका की राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए खतरा होगा। हालांकि, चीन ने ट्रंप के इस दावे को खारिज किया है। चीन का कहना है कि उसका इस तरह का कोई इरादा नहीं है। उसने ट्रंप को अपना नाम न घसीटने की नसीहत भी दी है। यहां यह जानना जरूरी है कि द्वितीय विश्व युद्ध के बाद से ही ग्रीनलैंड के पिटुफिक में अमेरिका का सैन्य बेस है। यहां अमेरिकी सेना, रडार, एयर डिफेंस और स्पेस सिस्टम पहले से तैनात हैं। ग्रीनलैंड के साथ उसका रक्षा समझौता भी है। यह समझौता अमेरिका को बड़ी संख्या में अपने सैन्यकर्मी भेजने की इजाजत देता है। ट्रंप चाहें तो इस सैन्य बेस का विस्तार भी कर सकते हैं लेकिन वह ऐसा नहीं कर रहे। उन्हें ग्रीनलैंड से कम कुछ भी नहीं चाहिए। उन्होंने साफ कर दिया है कि चाहे सीधी अंगुली से या टेढ़ी अंगुली से, वह ग्रीनलैंड को लेकर रहेंगे।
सैन्य अभियानों में यूरोप ने US का दिया साथ
ग्रीनलैंड पर उनके इस तेवर ने नाटो के 32 और यूरोप के 27 देशों को हैरान, परेशान और चिंतित कर दिया है। ये देश समझ नहीं पा रहे कि ट्रंप ऐसा क्यों कर रहे हैं। अमेरिका और यूरोप के बीच बहुत गहरी दोस्ती रही है। अमेरिका को जब-जब इन देशों की जरूरत पड़ी, वे कंधे से कंधा मिलकर खड़े रहे। इराक, सीरिया, अफगानिस्तान और न जाने कितने सैन्य अभियानों में इन देशों ने अमेरिका का साथ दिया। अपने सैनिक भेजे और खून बहाया। लेकिन ट्रंप अपने सहयोगी ओर मित्र देशों के साथ ही दुश्मन जैसा बर्ताव कर रहे हैं। ग्रीनलैंड पर ट्रंप के तेवर देखने के बाद यूरोपीय देश इस बात को समझ गए हैं कि अमेरिका खास तौर से ट्रंप पर भरोसा नहीं किया जा सकता। सुरक्षा को लेकर तो और भी नहीं। उन्हें लग गया है कि अपनी सुरक्षा के लिए अब अमेरिका पर निर्भर नहीं रहा जा सकता। उन्हें अपनी सुरक्षा खुद मिलकर करनी होगी। यूरोप के देश इसके लिए एक अलग से सुरक्षा तंत्र विकसित करने की बात भी करने लगे हैं। कहावत है कि दूध का जला छाछ भी फूंक-फूंककर पीता है, यूरोपीय देशों की यह हालत हो गई है कि वे पानी भी फूंककर पीने लगे हैं।
मैक्रौं के साथ ट्रंप का गतिरोध बढ़ गया है।
यूएस और यूरोप के बीच खिंची तलवार!
ग्रीनलैंड के मसले पर कुछ एक देश को छोड़ दिया जाए तो पूरा यूरोप एक पेज पर है। यहां तक कि ब्रिटेन भी अमेरिका के खिलाफ बोल रहा है। फ्रांस, जर्मनी, नार्वे और स्वीडन ने अपने सैनिक भेजे हैं। इस बीच, अमेरिका ने भी ग्रीनलैंड स्थित अपने सैन्य बेस पर मिलिट्री एयरक्राफ्ट उतारकर गहमागहमी बढ़ा दी है। ग्रीनलैंड जिसकी सुरक्षा की जिम्मेदारी डेनमार्क के पास है, वह भी तरह-तरह के हथियार यहां भेज रहा है। कहने का मतलब है कि ग्रीनलैंड में अमेरिका और यूरोप संघर्ष और टकराव के रास्ते पर हैं। अमेरिका और यूरोप इस तरह आक्रामक तरीके से एक-दूसरे के साथ पेश आएंगे, और उनमें तलवारें खिंच जाएंगी, दुनिया ने इसकी कल्पना नहीं की थी लेकिन ट्रंप ने यह कर दिखाया है। वह 'बधाई' के पात्र हैं। ट्रंप जैसे किरदार को ही देखकर यह कहावत बनी है कि जिसका दोस्त ऐसा हो तो उसे दुश्मन की क्या जरूरत है। यह सब देखकर रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन भी मन ही मन खुश हो रहे होंगे कि ट्रंप के एक कदम से यूरोप का पूरा ध्यान यूक्रेन से हटकर ग्रीनलैंड और अपनी सुरक्षा पर आ गया है क्योंकि युद्ध की इस घड़ी में यूक्रेन खुद को अब अकेला और असहाय पा रहा है।
टैरिफ लगाकर भारत पर दबाव बनाने का चला दांव
भारत को लेकर भी ट्रंप ने खिसियाहट भरे फैसले लिए। भारत-पाक युद्ध रुकवाने का क्रेडिट नहीं दिए जाने पर वह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से नाराज हो गए। अपने इगो की संतुष्टि के लिए उन्होंने भारत पर 25 प्रतिशत अतिरिक्त टैरिफ लगा दिया। वह अब भी और टैरिफ लगाने की धमकी दे रहे हैं। लेकिन भारत चुप है, कोई प्रतिक्रिया नहीं दे रहा। भारत का रुख साफ है कि आप चाहे जितना टैरिफ लगाएं, लेकिन भारत अपनी रणनीतिक स्वायत्तता के साथ कोई समझौता नहीं करेगा। वह वही करेगा जो देश हित में होगा। ट्रंप के रुख को देखते हुए भारत अपने बाजार के लिए विकल्पों पर तेजी के साथ आगे बढ़ रहा है। ईयू के साथ व्यापार समझौता होने जा रहा है। यह ट्रंप के लिए एक बड़े झटका से कम नहीं है।
भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी।
ट्रंप के फैसले से भारत-यूएस रिश्ते में पड़ी गांठ
ट्रंप को लग रहा था कि अमेरिका के साथ व्यापार समझौता के लिए भारत उनकी खुशामद करेगा, वह पीएम मोदी के फोन का इंतजार कर रहे थे लेकिन पीएम ने ऐसा नहीं किया। भारत ने साफ कर दिया है कि अमेरिका के साथ व्यापार समझौता करने के लिए उसे कोई जल्दी नहीं है और न ही वह उतावला है। कहने का मतलब है कि भारत को अपने दबाव में लेने की ट्रंप ने बहुत कोशिश की लेकिन वह उनकी बातों और झांसों में नहीं आया। उनका हर दांव उल्टा पड़ गया। एक बात तो साफ है कि बीते करीब दो दशकों में अमेरिका ने भारत के साथ अपने रिश्ते बेहतर करते हुए संबंधों में एक रवानगी लाई थी, लेकिन अपने बयानबाजी और फैसलों से ट्रंप ने उसे निचले स्तर पर ला दिया है। ट्रंप के दूसरे कार्यकाल के 'अजीबो-गरीब' फैसलों से यही बात साबित हुई है कि उन पर भरोसा नहीं किया जा सकता।
