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दुनिया को कैसे बदल सकता है 'ईरान का पतन', भारत पर होगा क्या असर?

अगर विरोध प्रदर्शनों के कारण खामेनेई शासन का पतन हो जाता है, तो ईरान में सुचारू रूप से सत्ता हस्तांतरण की संभावना लगभग न के बराबर होगी। यहां गहरी कबीलाई, सांप्रदायिक अराजकता फैल जाएगी। एक ऐसा सत्ता शून्य होगा जो इराक से भी बदतर होगा। इसका दुनिया और भारत पर क्या असर होगा, समझने की कोशिश करते हैं।

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Photo : AP
ईरान सरकार का पतन हुआ तो क्या-क्या होगा असर

47 साल पहले ईरान में राजशाही का पतन हुआ और उसकी जगह अमेरिका-विरोधी एर ऐसे धर्मतंत्र वाले शासन की स्थापना हुई जिसने ईरान का इतिहास ही बदल डाला। अब ऐसा लगता है कि इस्लामी गणराज्य ईरान एक उसी तरह की क्रांति के कगार पर है। एक ऐसी क्रांति जो सर्वोच्च नेता अयातुल्ला अली खामेनेई के नेतृत्व वाली सरकार को उखाड़ फेंकेगी। हजारों ईरानी नागरिक रोजाना सड़कों पर उतर रहे हैं और 'खामेनेई मुर्दाबाद', 'यह साल खून का साल है, खामेनेई का तख्तापलट होगा' जैसे भड़काऊ नारे लगा रहे हैं। ये लोग खामेनेई के 35 साल के शासन के अंत की मांग कर रहे हैं। इसके जवाब में ईरानी सरकार ने वही किया है जो वह हमेशा करती आई है। लोगों को दबाने कुचलने के लिए अत्यधिक बल का इस्तेमाल किया। मरने वालों की ताजा संख्या 2,500 से अधिक हो चुकी है, कुछ कार्यकर्ताओं का कहना है कि यह संख्या 12,000 तक भी पहुंच सकती है। इस स्थिति के बीच, अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने सार्वजनिक रूप से चेतावनी दी है कि अगर ईरान विरोध प्रदर्शनों का जवाब हिंसा से देता है तो अमेरिका सैन्य हमले करेगा। इन सब बातों को मिलाकर देखें तो एक ही सवाल उठता है जो ज्यादातर लोग पूछ रहे हैं—क्या इस्लामी गणराज्य का तख्तापलट हो जाएगा? और अगर ऐसा होता है, तो आगे क्या होगा? भारत पर इसका क्या असर होगा?

क्या ईरान में खामेनेई शासन का अंत हो रहा है?

ईरान में पिछली बार 2023 में महसा अमिनी नाम की लड़की की मौत के विरोध में बड़े पैमाने पर प्रदर्शन हुए थे। तेहरान में पिछले साल दिसंबर के अंत में विरोध प्रदर्शन भड़क उठे थे। ईरान की राष्ट्रीय मुद्रा के तेजी से अवमूल्यन, मुद्रास्फीति के रिकॉर्ड स्तर और आर्थिक विकास के किसी स्पष्ट नजरिए और समाधान के अभाव ने तेहरान के बाजार के व्यापारियों को अपनी दुकानें बंद करने और विरोध प्रदर्शन करने के लिए सड़कों पर उतरने के लिए मजबूर कर दिया। हालांकि, ये विरोध प्रदर्शन जल्द ही राष्ट्रव्यापी प्रदर्शनों में तब्दील हो गए और इतने बड़े पैमाने पर हुए जो काफी समय से नहीं देखे गए थे। समाज के हर वर्ग के लोग - छात्र, शिक्षक, परिवार के मुखिया सड़कों पर उमड़ पड़े। ये लोग बेखौफ होकर नारे लगाते हुए खामेनेई शासन के अंत की मांग कर रहे थे। उनमें से कई ने राजशाही की बहाली की मांग की और "शाह अमर रहें" और "यह आखिरी लड़ाई है, पहलवी लौटेंगे" जैसे नारे लगाए, जो ईरान के अंतिम शाह के पुत्र रजा पहलवी के समर्थन में थे। सवाल उठ रहे हैं कि क्या ईरान में खामेनेई शासन का अंत हो रहा है?

ईरान में संग्राम (AP)

इसके जवाब में ईरानी अधिकारियों ने 8 जनवरी को देशभर में इंटरनेट बंद कर दिया, जिससे देश के भीतर की घटनाओं का पूरा ब्यौरा अस्पष्ट हो गया। इसके अलावा, उन्होंने समर्थकों को दबाने के लिए बल प्रयोग शुरू कर दिया। बड़े पैमाने पर सख्ती से प्रदर्शनकारियों को कुचलने की कोशिश हुई। सैकड़ों लोगों क मौत हुई और हजारों घायल हुए। डॉक्टरों ने बताया कि उनके द्वारा इलाज किए जा रहे कई मरीजों की आंखों और सिर में गोली के घाव थे। इससे पता चलता है कि सेना की कार्रवाई कितनी सख्त थी।

पतन हुआ तो किस स्थिति में होगा ईरान?

अगर विरोध प्रदर्शनों के कारण खामेनेई शासन का पतन हो जाता है, तो ईरान में सुचारू रूप से सत्ता हस्तांतरण की संभावना लगभग न के बराबर होगी। यहां गहरी कबीलाई, सांप्रदायिक अराजकता फैल जाएगी। एक ऐसा सत्ता शून्य होगा जो इराक से भी बदतर होगा। ऐसी आशंकाएं हैं कि अगर ईरानी शासन का पतन हो जाता है, तो उसके नियंत्रण में रहने वाले मिलिशिया - लेबनान में हिज्बुल्लाह, यमन में हौथी, इराक और सीरिया में शिया मिलिशिया बेलगाम हो जाएंगे। वे स्वतंत्र युद्ध मशीन बन जाएंगे, पुराने बदले को नई क्रूरता के साथ पूरा करेंगे। ये हथियारों से लैस, वित्त पोषित और बेहद उग्र होंगे। इसके अलावा, इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कोर एक अधिक शक्तिशाली बल बन जाएगा, जिसमें कट्टरपंथी शीर्ष पदों पर आसीन होंगे। विशेषज्ञों का मानना है कि वे वैचारिक प्रतिद्वंद्वियों को खत्म करते हुए ईरान के अहम बुनियादी ढांचे पर कब्जा करने की कोशिश करेंगे। यह भी आशंका है कि अस्थिर ईरान सबसे खतरनाक हथियारों का खुला बाजार बन जाएगा।

क्या भारत को चिंतित होना चाहिए?

बेशक, ईरानी शासन के पतन से इस क्षेत्र का स्वरूप पूरी तरह बदल जाएगा। इसके प्रभाव भारत सहित व्यापक स्तर पर महसूस किए जाएंगे। भारत के लिए, ईरान में शासन का पतन पश्चिम और मध्य एशिया में उसके रणनीतिक, आर्थिक और भू-राजनीतिक हितों पर सीधा प्रभाव डालेगा। नई दिल्ली के लिए चाबहार परियोजना जो पाकिस्तान को दरकिनार करते हुए अफगानिस्तान और मध्य एशिया का प्रवेश द्वार है, सबसे बड़ी चिंता का विषय है। शासन बदलाव से चीन को अपना प्रभाव बढ़ाने का अवसर भी मिल सकता है, जिससे भारत की क्षेत्रीय और समुद्री स्थिति कमजोर हो जाएगी। इसके अलावा, एक अस्थिर ईरान पूरे पश्चिम एशियाई क्षेत्र को उथल-पुथल में धकेल देगा। इसके भारत के लिए गंभीर परिणाम होंगे, क्योंकि इस पूरे क्षेत्र में लगभग आठ से नौ मिलियन भारतीय रहते हैं। साथ ही, भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए इस क्षेत्र पर बहुत अधिक निर्भर है, इसकी लगभग 60 प्रतिशत ऊर्जा जरूरतें यहीं से पूरी होती हैं। क्षेत्र में किसी भी प्रकार की अस्थिरता भारत की ऊर्जा सुरक्षा के लिए खतरा है और इसका मुद्रास्फीति यानी महंगाई पर भी प्रभाव पड़ेगा। तेल के दामों बेतहाशा बढ़ोतरी हो सकती है। ईरान के साथ भारत का चाबहार पोर्ट (Chabahar Port) प्रोजेक्ट चल रहा है। यह अफगानिस्तान और मध्य एशिया का व्यापार रास्ता है। ईरान में सत्ता पतन से यह रास्ता अमेरिका/पाकिस्तान ब्लॉक के हाथ में जा सकता है। ट्रंप और आसिम मुनीर का गठजोड़ पहले ही भारत को परेशान कर रहा है। इसके साथ ही भारत का सेंट्रल एशिया कनेक्शन भी कमजोर पड़ जाएगा।

बाकी दुनिया पर क्या होगा?

विशेषज्ञों का कहना है कि अगर ईरान शासन गिरता है, तो रूस पर इसका बहुत गहरा प्रभाव पड़ेगा, खासकर यूक्रेन के साथ युद्ध पर, क्योंकि ईरानी शासन रूस को ड्रोन या अन्य आपूर्ति और गोला-बारूद नहीं पहुंचा पाएगा। आज ईरान कैस्पियन सागर के रास्ते रूस को उसकी सभी जरूरतें पूरी करता है। तेहरान तेल और ईंधन की खरीद-बिक्री करके मॉस्को को प्रतिबंधों से बचने में भी मदद करता है। अगर यह व्यवस्था खत्म हो जाती है, तो रूस को और भी नुकसान उठाना पड़ेगा। वित्तीय नुकसान के अलावा, रूस एक महत्वपूर्ण रणनीतिक साझेदार भी खो देगा। बर्लिन स्थित रूसी विदेश नीति विशेषज्ञ हन्ना नोटे के मुताबिक, अगर यह शासन गिरता है, तो मुझे लगता है कि रूस के लिए ईरान में अपनी संपत्ति और प्रभाव बनाए रखना बहुत मुश्किल हो जाएगा। ईरान में सत्ता का पतन खाड़ी सहयोग परिषद (कुवैत, सऊदी अरब, बहरीन, कतर, संयुक्त अरब अमीरात और ओमान) के भीतर विभाजन को और बढ़ा देगा। ऐसी आशंकाएं हैं कि रियाद और अबू धाबी के बीच प्रतिद्वंद्विता, जो पहले से ही यमन में देखने को मिल रही है, अगर खामेनेई सरकार गिर जाती है तो ईरान में भी फैल सकती है।

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