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1971 के युद्ध में रूस ने भारत की कैसे की मदद? बंगाल की खाड़ी में क्या करने आया था US का सांतवां बेड़ा

मास्को सही मायने में दिल्ली के साथ दोस्ती निभाता आया है और भारत इस दोस्ती का कद्र करता आया है। दशकों की इस दोस्ती में कभी दरार नहीं आई। इस रिश्ते में आज भी वही गर्मजोशी, अपनापन और प्रेम कायम है जो दशकों पहले था। भारत को सैन्य रूप से एक शक्तिशाली देश बनाने में रूस का बड़ा योगदान रहा है। आज भी भारतीय सेना में करीब 60 प्रतिशत हथियार रूस निर्मित हैं।

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1971 के युद्ध में भारत की मदद के लिए रूस ने भेजा था अपना युद्धक पोत। तस्वीर-Facebook/Bangladesh Old Photo Archive

India Russia Friendship: रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन दो दिन चार से पांच दिसंबर तक भारत के दौरे पर हैं। करीब चार साल बाद वह दिल्ली आ रहे हैं। वैश्विक स्तर पर रूस को अलग-थलग करने की पश्चिम की कोशिशों के बीच पुतिन का यह भारत दौरा हो रहा है। यूक्रेन युद्ध के लिए पुतिन के खिलाफ अंतरराष्ट्रीय न्यायालय से गिरफ्तारी वारंट भी जारी है। बावजूद इसके वह भारत आ रहे हैं। यूक्रेन युद्ध शुरू होने के बाद रूसी राष्ट्रपति बहुत ही कम देशों की यात्रा पर गए हैं और अब वह भारत आ रहे हैं। यह भारत और रूस की अटूट दोस्ती और करीबी रिश्ते को दर्शाता है। यह रिश्ता ऐतिहासिक और समय की कसौटी पर खरा उतरा है। रूस के साथ भारत के राजनयिक, सैन्य, आर्थिक, सांस्कृतिक रिश्ते पहले से प्रगाढ़ तो हैं ही दोनों देशों के बीच रिश्ते भावनात्मक धागे से भी जुड़े हैं। भारत को कूटनीतिक एवं सैन्य स्तर जब भी जरूरत पड़ी, रूस ने हमेशा साथ दिया। उसने कभी पीठ नहीं दिखाई।

भारतीय सेना में 60 प्रतिशत हथियार रूसी

मास्को सही मायने में दिल्ली के साथ दोस्ती निभाता आया है और भारत इस दोस्ती का कद्र करता आया है। दशकों की इस दोस्ती में कभी दरार नहीं आई। इस रिश्ते में आज भी वही गर्मजोशी, अपनापन और प्रेम कायम है जो दशकों पहले था। भारत को सैन्य रूप से एक शक्तिशाली देश बनाने में रूस का बड़ा योगदान रहा है। आज भी भारतीय सेना में करीब 60 प्रतिशत हथियार रूस निर्मित हैं और आधुनिक एवं नए हथियारों के लिए भारतीय सेना अभी भी रूस पर काफी निर्भर है। सैन्य हथियार एवं साजो-सामान के लिए रूस पर निर्भरता इसलिए है क्योंकि आजादी के बाद जब भारत को हथियारों की जरूरत थी तो अमेरिका सहित यूरोप के देशों ने हथियार देने से मना कर दिया। पश्चिमी देशों द्वारा हथियार देने से मना किए जाने के बाद भारत, रूस के पास गया। रूस ने भारत को हथियार तो दिए ही साथ ही अपने सहयोग से उसने भारत में हथियार निर्माण का पूरा इको-सिस्टम खड़ा करने में दिल्ली की मदद की।

पाकिस्तान के खिलाफ शुरू हुआ लिबरेशन वार

एक्सपर्ट मानते हैं कि 1971 के युद्ध में भी रूस ने भारत की बहुत बड़ी मदद की। 1971 से पहले आज के पाकिस्तान के दो हिस्से थे। पूर्वी पाकिस्तान और पश्चिमी पाकिस्तान। बांग्लादेश बनने से पहले यह पूर्वी पाकिस्तान था। पूर्वी पाकिस्तान था तो पाकिस्तान का ही हिस्सा लेकिन इसके साथ बराबरी का सलूक नहीं हुआ। पश्चिमी पाकिस्तान खासकर पंजाब के हुक्मरान पूर्वी पाकिस्तान के लोगों पर काफी अत्याचार और जुल्म करते थे। बांग्ला भाषी मुस्लिम पाकिस्तान के चंगुल से आजाद होन के लिए आंदोलन छेड़ दिया। शेख मुजीबुर्रहमान की अगुवाई में पूर्वी पाकिस्तान को आजाद कराने की मुहिम शुरू हो गई। मुक्त वाहिनी बनी और लिबरेशन वार शुरू हुआ। पाकिस्तान किसी भी कीमत पर पूर्वी पाकिस्तान को बांग्लादेश बनना नहीं देखना चाहता था। इस बगावत को दबाने के लिए उसने ऑपरेशन सर्चलाइट शुरू किया। पाकिस्तान का दमन चक्र बेहद क्रूर था।

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खास है भारत और रूस की दोस्ती। तस्वीर-PTI

...फिर भारत ने सैन्य दखल का निर्णय लिया

पाकिस्तानी सेना का प्रमुख जनरल याह्या खान बंगाली आकांक्षाओं को सैन्य बल से दबा रहा था। लाखों की संख्या निर्दोष लोग मारे जाने लगे। बड़ी संख्या में महिलाओं का रेप हुआ। इससे डरकर लाखों की संख्या में बांग्लादेशी नागरिक भारत की तरफ आने लगे। इससे भारत की आंतरिक सुरक्षा को खतरा पैदा हो गया था। खुफिया एजेंसियों की रिपोर्ट थी कि बांग्लादेश (पूर्वी पाकिस्तान) से बड़ी संख्या में शरणार्थी भारत में दाखिल हो सकते हैं। इस रिपोर्ट पर कार्रवाई करते हुए तत्कालीन इंदिरा गांधी की सरकार ने सैन्य हस्तक्षेप का निर्णय लिया। भारतीय सेना ने पूर्वी पाकिस्तान में धावा बोल दिया। पूर्वी पाकिस्तान में भारत के साथ लड़ाई शुरू हो गई। बांग्लादेश में कई मोर्चों पर भारत और पाकिस्तान की सेनाएं आमने-सामने थीं। जिस समय 1971 का युद्ध लड़ा गया उस समय अमेरिका, ब्रिटेन और चीन पूरी तरह पाकिस्तान के साथ थे। पाकिस्तान के पास अमेरिकी टैंक, लड़ाकू जहाज और अन्य हथियार थे। तो भारत के पास रूस निर्मित मिग-21 और टैंक। एक तरह से कहिए तो यह युद्ध अमेरिकी और रूसी हथियारों से लड़ाई लड़ी गई।

1971 में हुआ सोवियत रूस के साथ समझौता

पाकिस्तान के इस इन ताकतवर मुल्कों की लामबंदी देख भारत को भी जरूरत महसूस हुई कि वह रूस के साथ अपने रिश्ते को आगे बढ़ाए। भारत ने एक शक्तिशाली संतुलन शक्ति की आवश्यकता को पहचाना। इससे स्वतंत्र भारत के इतिहास की सबसे महत्वपूर्ण कूटनीतिक पहलों में से एक का मार्ग प्रशस्त हुआ। भारत ने 9 अगस्त 1971 को सोवियत संघ के साथ शांति, मित्रता और सहयोग संधि पर हस्ताक्षर किए। यह संधि केवल प्रतीकात्मक नहीं थी। इसने भारत को स्पष्ट राजनीतिक आश्वासन दिए और आवश्यक होने पर प्रत्यक्ष सैन्य सहायता का मार्ग खोला। इस समझौते ने सुनिश्चित किया कि संकट की घड़ी में सोवियत शक्ति भारत के पीछे खड़ी होगी। यह ऐसा समझौता था जो आने वाले हफ्तों में निर्णायक साबित हुआ।

पाकिस्तान को चीन ने दिया झटका

1971 के युद्ध में सोवियत संघ की भूमिका केवल राजनीतिक बयानबाजी या कूटनीतिक समर्थन तक सीमित नहीं थी। उसकी सैन्य सहायता ने वह परिस्थितियां पैदा कीं जिनके कारण भारत युद्ध को प्रभावी ढंग से आगे बढ़ा सका। 1971 में भारत की सबसे बड़ी चिंताओं में से एक था कि चीन पाकिस्तान की ओर से संघर्ष में शामिल हो सकता है। पाकिस्तान को उम्मीद थी कि भारत के साथ किसी भी टकराव में चीन हिमालयी सीमा पर सैन्य हस्तक्षेप करेगा लेकिन चीन के हस्तक्षेप कोई काल्पनिक खतरा नहीं था; केवल दो वर्ष पहले, 1969 में, सोवियत संघ और चीन के बीच उस्सूरी नदी पर, विशेषकर दामांस्की द्वीप के आसपास, हिंसक झड़पें हुई थीं। 1968 से तनाव बढ़ता गया था और सात महीने तक कई घातक संघर्ष हुए थे। अंततः सोवियत सैन्य प्रतिक्रिया में भारी तोपखाने, जिनमें BM-21 ग्रैड रॉकेट भी शामिल थे, का उपयोग किया गया, जिसने चीनी ठिकानों को गंभीर नुकसान पहुंचाया।

दूसरा मोर्चा खोलने के लिए तैयार नहीं हुआ चीन

जब भारत युद्ध की तैयारी कर रहा था तब सोवियत संघ ने बीजिंग के प्रभाव को काउंटर करने का अवसर देखा और नई दिल्ली का समर्थन करने का निर्णय लिया। मॉस्को ने चीन-सोवियत सीमा पर 44 मोटराइज्ड डिवीजन तैनात कर दिए। यह भारी तैनाती चीन के लिए एक प्रत्यक्ष भूमि-खतरा बन गई, जिससे बीजिंग भारत के विरुद्ध दूसरा मोर्चा खोलने के लिए तैयार नहीं हुआ। संघर्ष बढ़ने पर अमेरिका और ब्रिटेन ने पाकिस्तान के पक्ष में परिणाम को प्रभावित करने का प्रयास किया। दिसंबर 1971 की शुरुआत में यह प्रयास नाटकीय रूप से सामने आया, जब अमेरिकी नौसेना के 7वें बेड़े — जिसमें परमाणु-संचालित विमानवाहक पोत यूएसएस एंटरप्राइज शामिल था उसने बंगाल की खाड़ी में प्रवेश किया। साथ ही, ब्रिटेन ने भी विमानवाहक पोत एचएमएस ईगल को अरब सागर में भेजा। दो बड़े पश्चिमी कैरियर बैटल ग्रुप्स की यह संयुक्त तैनाती एक गंभीर खतरा थी।

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युद्ध में 93 हजार पाकिस्तानी सैनिकों ने किया सरेंडर। तस्वीर-PTI

युद्ध में तीन तरफ से थी भारत को घेरने की योजना

अमेरिकी रणनीति के विश्लेषणों के अनुसार, योजना भारत को तीन ओर से घेरने की थी। पूर्व में अमेरिकी बेड़ा, पश्चिम में ब्रिटिश नौसेना और जमीनी मोर्चे पर पाकिस्तानी सेना। अमेरिका का दबाव नौसैनिक गतिविधियों तक सीमित नहीं था। डीक्लासिफाइड दस्तावेज बताते हैं कि राष्ट्रपति निक्सन ने चीन को भारत के खिलाफ सैन्य कार्रवाई शुरू करने के लिए प्रोत्साहित किया था। रिकॉर्ड्स के अनुसार, हेनरी किसिंजर को बीजिंग से संपर्क कर भारतीय सीमा की ओर चीनी सैनिकों को मोबलाइज करने का आग्रह करने का निर्देश दिया गया था। कुछ टिप्पणियां यहां तक बताती हैं कि निक्सन ने कहा था कि भारत को 'एक बड़े अकाल' की जरूरत है जो अमेरिकी प्रशासन की भारत-विरोधी सोच की तीव्रता को दर्शाता है। अमेरिकी और ब्रिटिश बेड़ों की यह संयुक्त तैनाती एक खतरनाक टकराव का संकेत दे रही थी।

सोवियत रूस ने सोवियत पैसिफिक फ्लीट रवाना किया

समुद्री टकराव में निर्णायक मोड़ तब आया जब भारत ने तत्काल सोवियत हस्तक्षेप का अनुरोध भेजा। मॉस्को ने असाधारण तीव्रता से प्रतिक्रिया दी।

वलादिवोस्तोक से सोवियत पैसिफिक फ्लीट जिसमें परमाणु सक्षम युद्धपोत भी शामिल थे, वे तेजी से हिंद महासागर की ओर रवाना हुए।एडमिरल व्लादिमीर क्रुगल्याकोव के नेतृत्व में यह बेड़ा दो बड़े टास्क ग्रुप्स से मिलकर बना था। इनमें परमाणु-संचालित पनडुब्बियां, क्रूजर और विध्वंसक शामिल थे जिनमें से कई में अमेरिकी और ब्रिटिश पोतों का सीधे सामना करने की क्षमता थी। सोवियतों ने टास्क फोर्स 40 भी गठित की, जिसे आवश्यक होने पर इस तैनाती को और मजबूत करने के लिए तैयार रखा गया। एक सोची-समझी शक्ति-प्रदर्शन रणनीति के तहत सोवियत परमाणु पनडुब्बियों को जानबूझकर सतह पर लाया गया ताकि अमेरिकी उपग्रह उन्हें आसानी से पहचान सकें।

अमेरिकी, ब्रिटेन के बेड़ों ने अपना मार्ग बदल लिया

इस प्रदर्शन का उद्देश्य स्पष्ट संदेश देना था कि सोवियत संघ किसी भी अमेरिकी सैन्य कार्रवाई को बर्दाश्त नहीं करेगा। अमेरिकी और ब्रिटिश बेड़े तुरंत स्थिति की गंभीरता को समझ गए। सोवियत संघ से संभावित सीधी भिड़ंत और वॉशिंगटन तथा लंदन में दक्षिण एशिया के लिए युद्ध लड़ने की कोई राजनीतिक इच्छा न होने के कारण दोनों बेड़ों ने अपना मार्ग बदल दिया। वे भारतीय जलक्षेत्र में नहीं आए, और इस तरह एक ऐसा टकराव टल गया जो संघर्ष को किसी भी दिशा में चरम पर ले जा सकता था। पश्चिमी बेड़ों के हटते ही भारतीय सेनाएं बिना किसी बाहरी हस्तक्षेप के अपने अभियानों को जारी रख सकीं। 16 दिसंबर 1971 को पाकिस्तान की पूर्वी कमान ने आत्मसमर्पण कर दिया और लगभग 93,000 सैनिकों का यह समर्पण द्वितीय विश्व युद्ध के बाद की सबसे बड़ी सामूहिक सैन्य सरेंडर घटनाओं में से एक था।

आलोक कुमार राव
आलोक कुमार राव author

19 वर्षों से मीडिया जगत में सक्रिय आलोक राव ने प्रिंट, न्यूज एजेंसी, टीवी और डिजिटल चारों ही माध्यमों में काम किया है। इस लंबे अनुभव ने उन्हें समाचारो... और देखें

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