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नौगाम पुलिस स्टेशन धमाका: बरामदगी के बाद थाने में क्यों रखे गए थे बड़ी मात्रा में विस्फोटक, क्या है प्रोटोकॉल?

दिल्ली धमाके में आरोपियों को धरपकड़ में व्यस्त जम्मू-कश्मीर पुलिस को शुक्रवार की रात बड़ा नुकसान पहुंचा। जिस विस्फोटक पदार्थों को उसने आतंकियों से बरामद किया था, वे थाने में ही फट गए और पुलिसकर्मी ही इसकी चपेट में आ गए। बड़े पैमाने पर जानमाल का नुकसान हुआ। आखिर क्यों रखा गया था थाने में विस्फोटक, और इन्हें रखने का क्या प्रोटोकॉल होता है।

Naugam Blast

कैसे हुआ नौगाम धमाका?

श्रीनगर के बाहरी इलाके नौगाम पुलिस स्टेशन हुए धमाके ने पूरे देश को हैरान किया है और सदमे में डाला है। स्टेशन में 350 किलोग्राम से ज्यादा अमोनियम नाइट्रेट और सैकड़ों किलोग्राम अन्य विस्फोटक बनाने वाली सामग्री रखी थी। इसके अलावा केमिकल, बैटरियां, डेटोनेटर और टाइमर भी यहां रखे हुए थे। ये विस्फोटक सामग्री लाल किला विस्फोट से जुड़े जैश-ए-मोहम्मद के आतंकी मॉड्यूल से बरामद की गई थी और जम्मू-कश्मीर पुलिस द्वारा फरीदाबाद से 1,000 किलोमीटर से भी ज़्यादा दूर ले जाई गई थी। सवाल उठ रहा है कि कैसे इसमें विस्फोट हो गया और इतनी बड़ा हादसा हो गया जिसने लोगों को दहला दिया। आखिर क्या है पूरा मामला और क्या है बरामद विस्फोटकों को रखने का प्रोटोकॉल, जानने की कोशिश करते हैं।

धमाके में कितनी मौतें हुईं?

दिल्ली धमाके में आरोपियों को धरपकड़ में व्यस्त जम्मू-कश्मीर पुलिस को शुक्रवार की रात बड़ा नुकसान पहुंचा। जिस विस्फोटक पदार्थों को उसने आतंकियों से बरामद किया था, वे थाने में ही फट गए और पुलिसकर्मी ही इसकी चपेट में आ गए। बड़े पैमाने पर जानमाल का नुकसान हुआ। इस विस्फोटक सामग्री के कारण नौगाम पुलिस स्टेशन में भीषण विस्फोट हुआ, जिसमें नौ लोगों की मौत हो गई। ये ऐसा हादसा है जिसकी बुरी यादें उनके जेहन से कभी नहीं मिट सकेंगी। हादसे में कुल 9 लोगों की मौत हुई है। इसमें एक SIA का सदस्य, तीन FSL टीम के सदस्य, दो क्राइम फोटोग्राफर, मजिस्ट्रेट टीम से जुड़े दो रेवेन्यू ऑफिशल और एक टेलर की मौत हो गई। साथ ही 24 पुलिसवाले और कई आम नागरिक भी घायल हुए।

क्यों रखा था थाने में विस्फोटक?

दरअसल, आगे की जांच के लिए ही इन विस्फोटकों को थाने में रखा गया था। FSL द्वारा इन विस्फोटकों की जांच के लिए कुछ दिनों से काम चल रहा था। DGP के मुताबिक, बड़ी सावधानी से FSL टीम द्वारा विस्फोटक की जांच की जा रही थी। लेकिन दुर्घटनावश इसमें विस्फोट हो गया। हालांकि, डीजीपी ने विस्फोट के पीछे और आतंकी घटना जैसी किसी भी वजह को खारिज किया है। वर्षों पहले अमोनियम नाइट्रेट की एक और जब्ती का उदाहरण देते हुए अधिकारी ने कहा, कई साल पहले, इसी इलाके में एक बम का पता चला था। उसमें भी कई किलोग्राम अमोनियम नाइट्रेट था। जिस पुलिस दल ने इसका पता लगाया था, उसने बम निरोधक दस्ते को बुलाकर और नियंत्रित विस्फोट द्वारा विस्फोटक सामग्री को नष्ट करके एक विवेकपूर्ण निर्णय लिया था। विस्फोटक सामग्री गिरफ्तार डॉक्टर मुजम्मिल गनई के किराए के आवास से बरामद 360 किलोग्राम विस्फोटक का हिस्सा था। जांच के तहत इसके नमूने लिए जा रहे थे।

क्या होता है विस्फोटकों को रखने का प्रोटोकॉल?

पुलिस अधिकारियों के अनुसार, बरामद सामग्री को वायुरोधी कंटेनरों में भरकर छोटे ट्रकों में ले जाया गया। उन्होंने कहा कि मानक संचालन प्रक्रिया (एसओपी) का सख्ती से पालन किया गया और सभी सावधानियां बरती गईं। एक वरिष्ठ अधिकारी ने कहा कि जब भी किसी पुलिस स्टेशन में कोई मामला दर्ज होता है, तो उसे जांच करनी होती है और जांच के दौरान बरामद कोई भी सामग्री दस्तावेज, प्रतिबंधित पदार्थ, हथियार या विस्फोटक संबंधित पुलिस स्टेशन के कब्जे में ले ली जाती है। आरोपी के खिलाफ एक पुख्ता मामला बनाने के लिए इसे फोरेंसिक विश्लेषण के लिए भेजना जरूरी है। अधिकारियों ने बताया कि बरामद सामग्री को स्टोर रूम में रखने से पहले उसकी सूची बनाना अनिवार्य है। जब्त किए गए नमूनों के बैग को संबंधित पुलिस थाने में मजिस्ट्रेट की मौजूदगी में सील और मुहर लगाने के बाद ही स्टोर किया जाना जरूरी है।

हर थाने में एक मालखाना

अधिकारियों के अनुसार, फोरेंसिक विश्लेषण के लिए नमूने लेने के बाद, संबंधित थाने का यह फैसला होता है कि उन्हें परिसर में सुरक्षित रखा जाए या अदालत के कब्जे में सौंप दिया जाए। एक अधिकारी ने कहा, हर थाने में एक मालखाना (भंडार कक्ष) होता है जहां जब्त सामग्री रखी जाती है। अगर जब्त सामग्री थाने के मालखाने में रखने के लिए बहुत खतरनाक मानी जाती है, तो संबंधित अधिकारी उसे अदालत के मालखाने में भेज सकता है। उन्होंने कहा कि प्रक्रिया के अनुसार, अत्यधिक विस्फोटक पदार्थों की फोरेंसिक जांच 24 घंटे के भीतर हो जानी चाहिए।

सामग्री नष्ट करने से पहले अदालत से अनुमति जरूरी

किसी भी बरामद सामग्री को नष्ट करने से पहले पुलिस को अदालत से अनुमति लेनी होती है। एक अन्य अधिकारी ने कहा, पुलिस अपने आप कोई कार्रवाई नहीं कर सकती, लेकिन यहां हमें एक सक्रिय अधिकारी की जरूरत होती है, जो अदालत जाकर उन सामग्रियों को नष्ट करने की अनुमति लेता है जो सुरक्षित नहीं हैं। आमतौर पर, अदालतें मना नहीं करतीं। नौगाम पुलिस स्टेशन में मौजूद विस्फोटक सामग्री के मामले में अधिकारी ने कहा कि संबंधित अधिकारी इसे नष्ट करने के लिए अदालत का रुख नहीं कर सकते थे, क्योंकि इसे अभी फोरेंसिक विश्लेषण के लिए भेजा जाना बाकी था।

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अमित कुमार मंडल
अमित कुमार मंडल Author

अमित मंडल टाइम्स नाउ नवभारत डिजिटल में न्यूज डेस्क पर Assistant Editor के रूप में काम कर रहे हैं। प्रिंट, टीवी और डिजिटल—तीनों माध्यमों में कुल मिलाकर... और देखें

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