भारत की राष्ट्रीय सुरक्षा को लेकर जब भी चर्चा होती है तो सबसे पहले पाकिस्तान से लगने वाली अंतरराष्ट्रीय सीमा,आतंकवादी घुसपैठ या सीमा पार से ड्रोन के जरिए हथियार भेजे जाने की घटनाएं सामने आती हैं। लेकिन अब सुरक्षा एजेंसियों के लिए खतरे की तस्वीर तेजी से बदल रही है। समुद्र,जो व्यापार और आर्थिक गतिविधियों का प्रमुख माध्यम है,अब सुरक्षा एजेंसियों के लिए नई चुनौती बनता जा रहा है। गृह मंत्रालय (MHA) को भेजी गई सुरक्षा एजेंसियों की एक संयुक्त आकलन रिपोर्ट और नारकोटिक्स कंट्रोल ब्यूरो (NCB) की वार्षिक रिपोर्ट 2025 ने कुछ ऐसी जानकारी सामने रखी है, जिससे सुरक्षा एजेंसियों के कान खड़े हो गए हैं।
इस रिपोर्ट के अनुसार पाकिस्तान से संचालित दक्षिण एशियाई हथियार तस्करी नेटवर्क अब केवल पंजाब और राजस्थान की जमीनी सीमा तक सीमित नहीं है, बल्कि समुद्री रास्तों का भी तेजी से इस्तेमाल कर रहा है। सुरक्षा एजेंसियों का मानना है कि तस्कर मछली पकड़ने वाली छोटी नौकाओं और स्थानीय तटीय जहाजों का उपयोग कर ऐसे रास्ते अपना रहे हैं, जिन्हें सामान्य समुद्री निगरानी प्रणाली से पकड़ना आसान नहीं होता।
क्यों बदल रहा है तस्करी का तरीका?
हथियार तस्कर नेटवर्क हमेशा उसी रास्ते का चुनाव करते हैं जहां पकड़े जाने की संभावना कम हो। पिछले कुछ वर्षों में पंजाब और राजस्थान की सीमा पर निगरानी काफी मजबूत हुई है। सीमा सुरक्षा बल (BSF), ड्रोन रोधी तकनीक, इलेक्ट्रॉनिक फेंसिंग और खुफिया निगरानी के कारण जमीन के रास्ते तस्करी पहले की तुलना में कठिन हुई है।
ऐसे में तस्करों ने समुद्री मार्ग को प्राथमिकता देना शुरू कर दिया। समुद्र का विशाल क्षेत्र, हजारों मछली पकड़ने वाली नौकाओं की नियमित आवाजाही और कई छोटे तटीय ठिकानों की मौजूदगी इस काम को आसान बना देती है। रिपोर्ट के अनुसार तस्कर अक्सर ऐसी छोटी नावों का इस्तेमाल करते हैं जो रडार या सामान्य समुद्री निगरानी प्रणाली की पकड़ में आसानी से नहीं आतीं। कई मामलों में समुद्र के बीच एक नाव से दूसरी नाव में सामान स्थानांतरित किया जाता है,जिससे असली स्रोत का पता लगाना और मुश्किल हो जाता है।
भारत क्यों बन गया वैश्विक तस्करी नेटवर्क का केंद्र?
रिपोर्ट का सबसे महत्वपूर्ण निष्कर्ष यह है कि भारत केवल लक्ष्य देश नहीं है बल्कि दुनिया के सबसे बड़े ड्रग और हथियार तस्करी नेटवर्क के बीच स्थित एक रणनीतिक भूभाग भी है। दरअसल, भारत के पश्चिम में गोल्डन क्रिसेंट है जबकि पूर्व में गोल्डन ट्राएंगल। इन दोनों क्षेत्रों को दुनिया के सबसे बड़े अवैध मादक पदार्थ उत्पादन केंद्र माना जाता है। इनके बीच स्थित होने के कारण भारत कई अंतरराष्ट्रीय तस्करी मार्गों के संपर्क में आ जाता है।
क्या है गोल्डन क्रिसेंट?
गोल्डन क्रिसेंट में अफगानिस्तान,पाकिस्तान और ईरान शामिल हैं। यह क्षेत्र दशकों से दुनिया में अवैध अफीम उत्पादन का सबसे बड़ा केंद्र रहा है। रिपोर्ट के अनुसार अफगानिस्तान में अफीम उत्पादन पर प्रतिबंध लागू होने से पहले लगभग 13,200 टन अफीम का भंडार तैयार किया गया था। यही भंडार आज भी अंतरराष्ट्रीय तस्करी नेटवर्क को आपूर्ति दे रहा है। इस क्षेत्र से हेरोइन पाकिस्तान पहुंचती है और वहां से अलग-अलग रास्तों के जरिए भारत सहित कई देशों में भेजी जाती है।
गोल्डन ट्रायंगल से भारत को क्या खतरा?
भारत के पूर्वोत्तर में स्थित गोल्डन ट्रायंगल में म्यांमार,लाओस और थाईलैंड आते हैं। रिपोर्ट के अनुसार,अब यह इलाका केवल अफीम उत्पादन तक सीमित नहीं है। यहां बड़े पैमाने पर मेथामफेटामाइन जैसे सिंथेटिक ड्रग्स का निर्माण भी हो रहा है। भारत के लिए सबसे बड़ी चुनौती मणिपुर कॉरिडोर को बताया गया है। राष्ट्रीय राजमार्ग-102 इसी क्षेत्र से गुजरता है और इसे हेरोइन तथा मेथामफेटामाइन की तस्करी का प्रमुख प्रवेश द्वार माना गया है।
गुजरात और महाराष्ट्र ही क्यों?
भारत का पश्चिमी समुद्री तट पाकिस्तान के सबसे करीब माना जाता है। गुजरात के कच्छ क्षेत्र से लेकर महाराष्ट्र के कई तटीय हिस्सों तक समुद्री गतिविधियां काफी अधिक हैं। गुजरात में बड़ी संख्या में मछुआरे समुद्र में जाते हैं। इसी तरह महाराष्ट्र के कई छोटे बंदरगाहों और तटीय इलाकों में भी रोजाना हजारों नौकाएं चलती हैं। इस सामान्य गतिविधि के बीच तस्कर अपनी मौजूदगी छिपाने की कोशिश करते हैं।
रिपोर्ट में कहा गया है कि तस्कर वैध समुद्री गतिविधियों का सहारा लेकर अवैध हथियारों और अन्य प्रतिबंधित सामान को भारत तक पहुंचाने की कोशिश करते हैं। यही वजह है कि अब तटरक्षक बल,नौसेना और अन्य सुरक्षा एजेंसियां इस पूरे समुद्री क्षेत्र को अधिक संवेदनशील मान रही हैं।
ड्रग्स,हथियार और हवाला नेटवर्क का सिंडीकेट कर रहा एक साथ काम
NCB की रिपोर्ट में बताया गया है कि आज ड्रग्स,हथियार और हवाला नेटवर्क आपस में जुड़े हुए हैं। कई अंतरराष्ट्रीय अपराध सिंडिकेट पहले ड्रग्स की तस्करी करते हैं,फिर उसी कमाई का इस्तेमाल हथियार खरीदने या अन्य अवैध गतिविधियों में करते हैं। कई मामलों में एक ही समुद्री मार्ग से कभी नशीले पदार्थ भेजे जाते हैं और कभी हथियार। यही वजह है कि अब ड्रग्स विरोधी एजेंसियां और राष्ट्रीय सुरक्षा एजेंसियां मिलकर काम कर रही हैं।
तस्करी के रास्ते हमेशा बदलते रहते हैं
रिपोर्ट में साफ किया गया है कि सिंडिकेट ड्रग्स और हथियारों की तस्करी के लिए कोई एक स्थायी रास्ता नहीं अपनाते। जैसे ही किसी सीमा पर सुरक्षा बढ़ती है तो तस्कर नया रास्ता खोज लेते हैं। रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि मादक पदार्थों की तस्करी के मार्ग न तो स्थायी होते हैं और न ही पूर्वानुमानित। कानून प्रवर्तन का दबाव बढ़ने पर ये भौगोलिक रूप से स्थान बदल लेते हैं, भू-राजनीतिक घटनाओं के अनुसार नए मार्ग अपनाते हैं और वैध व्यापारिक ढांचे का दुरुपयोग करते हैं। दुनिया के प्रमुख मादक पदार्थ उत्पादक क्षेत्रों के बीच स्थित होने के कारण रिपोर्ट में कहा गया है कि भारत हर प्रमुख तस्करी मार्ग के चौराहे पर स्थित है।
समुद्र में बेहद कठिन है निगरानी
जमीन की सीमा पर बाड़,कैमरे और चौकियां लगाई जा सकती हैं, लेकिन समुद्र में ऐसा करना आसान नहीं होता। समुद्र में हजारों वर्ग किलोमीटर क्षेत्र की निगरानी करनी पड़ती है। छोटी नावें अक्सर कम ऊंचाई पर चलती हैं,कई में तो ट्रैकिंग उपकरण भी नहीं होते और वे सामान्य मछली पकड़ने वाली नौकाओं जैसी दिखाई देती हैं। वहीं, रात के समय समुद्र में इनकी पहचान और भी कठिन हो जाती है। इसी कारण समुद्री सुरक्षा केवल नौसेना की जिम्मेदारी नहीं रह जाती। इसमें भारतीय तटरक्षक बल,समुद्री पुलिस,खुफिया एजेंसियां और स्थानीय मछुआरों की भूमिका भी महत्वपूर्ण हो जाती है।
बंगाल की खाड़ी भी बन रही नई चुनौती
इस रिपोर्ट में बंगाल की खाड़ी के जरिए भी तस्करी की बात कही गई है। रिपोर्ट के मुताबिक,म्यांमार से आने वाले नशीले पदार्थों के लिए तस्कर अब बंगाल की खाड़ी के समुद्री मार्ग का भी उपयोग कर रहे हैं। ऐसे में भारत के दोनों प्रमुख समुद्री क्षेत्र अरब सागर और बंगाल की खाड़ी अब राष्ट्रीय सुरक्षा के दृष्टिकोण से समान रूप से महत्वपूर्ण हो चुके हैं।
दुनिया की राजनीति का असर भी तस्करी पर
NCB रिपोर्ट बताती है कि वैश्विक राजनीतिक घटनाओं का असर भी तस्करी नेटवर्क पर पड़ता है। उदाहरण के तौर पर 2024 में सीरिया के राजनीतिक बदलाव के बाद वहां संचालित कैप्टागॉन ड्रग नेटवर्क प्रभावित हुआ। इसके बाद दूसरे सिंथेटिक ड्रग नेटवर्क नए क्षेत्रों में सक्रिय होने लगे। रिपोर्ट यह भी संकेत देती है कि यदि भविष्य में कैप्टागॉन का उत्पादन लीबिया या मिस्र जैसे देशों में स्थानांतरित होता है तो भूमध्य सागर और लाल सागर के नए समुद्री मार्ग विकसित हो सकते हैं।
तालिबान और अफीम का समीकरण
अफगानिस्तान में तालिबान की वापसी के बाद अफीम उत्पादन को लेकर कई बदलाव हुए हैं। हालांकि उत्पादन पर रोक लगाने की घोषणाएं हुईं,लेकिन रिपोर्ट के अनुसार पहले से मौजूद विशाल भंडार अभी भी अंतरराष्ट्रीय बाजार में पहुंच रहा है।
भारत क्या कर रहा है?
पिछले कुछ वर्षों में भारत ने तटीय सुरक्षा को मजबूत करने के लिए कई कदम उठाए हैं। भारतीय तटरक्षक बल की गश्त बढ़ाई गई है। समुद्री निगरानी के लिए रडार नेटवर्क का विस्तार किया गया है। नौसेना, तटरक्षक बल,राज्य पुलिस और खुफिया एजेंसियों के बीच सूचनाओं के आदान-प्रदान की व्यवस्था बेहतर बनाई गई है।इसके अलावा मछुआरों को भी "आंख और कान" की भूमिका निभाने के लिए जागरूक किया जा रहा है, ताकि किसी संदिग्ध गतिविधि की सूचना तुरंत सुरक्षा एजेंसियों तक पहुंच सके।
समुद्री सुरक्षा बनेगी आगे की चुनौती
विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले वर्षों में समुद्री सुरक्षा भारत की राष्ट्रीय सुरक्षा का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा बनने वाली है। ड्रोन, सैटेलाइट फोन, एन्क्रिप्टेड संचार और छोटे समुद्री वाहनों का उपयोग करने वाले तस्कर लगातार नई तकनीकों का इस्तेमाल कर रहे हैं। ऐसे में केवल पारंपरिक निगरानी पर्याप्त नहीं होगी। कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI)आधारित समुद्री निगरानी, बेहतर रडार कवरेज, तटीय समुदायों की भागीदारी और अंतरराष्ट्रीय सहयोग जैसे उपाय भविष्य में निर्णायक साबित हो सकते हैं।