इथियोपिया में 12 हजार साल बाद फटा ज्वालामुखी। तस्वीर-AP
Hayli Gubbivolcanic eruption : इथियोपिया के हेली गुब्बी ज्वालामुखी में हुआ विस्फोट का असर भारत सहित दुनिया के कई देशों में देखा गया है। इसका सबसे ज्यादा असर विमान सेवाओं पर हुआ है। विमानन कंपनियों ने अपनी उड़ान सेवाएं उन मार्गों पर स्थगित कर दी हैं जिस वायु क्षेत्र में राख का गुबार है। ज्वालामुखी फटने के बाद राख का यह भारी गुबार सोमवार दोपहर बाद भारतीय क्षेत्र में प्रवेश कर गया। समझा जाता है कि यह गुबार मंगलवार शाम तक चीन को पार कर जाएगा। लाल सागर तट के समीप इथियोपिया के उत्तरपूर्वी हिस्से में स्थित इस ज्वालामुखी को सुषुप्त माना जा रहा था क्योंकि करीब 12 हजार साल से यह शांत पड़ा था लेकिन रविवार को यह अचानक से जाग्रत हो गया और भीषण विस्फोट के साथ यह भारी मात्रा में राख छोड़ने लगा।
ज्वालामुखी का यह गुबार अपनी ऊंचाई के लिए भी चर्चा में है। आसमान में यह इस ऊंचाई तक पहुंचा है जहां तक यात्री विमान जाने से परहेज करते हैं। यह राख और गुबार विमानों के लिए खतरा बने हुए हैं। इनसे आसमान में दृश्यता काफी कम हो गई है। यही नहीं वायुमंडल में मौजूद SO2 जैसी गहरीली गैस मौजूद है जिसके शरीर में जाने पर खतरा हो सकता है। इस बीच भारतीय मौसम विभाग ने कहा कि हालात मंगलवार शाम से सामान्य की तरफ लौटने लगेंगे।
इथियोपिया के उत्तरपूर्वी हिस्से में स्थित यह हेली गुब्बी ज्वालामुखी रविवार को अचानक से फटा। रिपोर्टों में कहा गया है कि इस ज्वालामुखी में विस्फोट 12 हजार साल के बाद हुआ। खास बात यह है कि विस्फोट के बाद जैसा कि आम तौर पर ज्वालामुखी विस्फोटों के बाद होता है, इसमें से गर्म लावा या मैग्मा नहीं निकला। विस्फोट के बाद ज्वालामुखी से बड़ी मात्रा में गैस और धुएं का गुबार निकलना शुरू हुआ। विस्फोट में पत्थर के छोटे टुकड़े, शीशा और अन्य तत्व निकले। एक्सपर्ट्स का मानना है ज्वालामुखी से निकल भारी तत्व तो आस-पास नीचे गिर गए होंगे लेकिन बहुत ही छोटे कण और सल्फर डाइऑक्साइड अथवा कार्बन डाइऑक्साइड जैसी गैसे वायुमंडल में बहुत ऊंचाई तक पहुंच गई होंगी।
ये छोटे कण और गैस जमीन से 15 से 40 किलोमीटर के बीच वातावरण में मौजूद रह सकती हैं। दरअसल, ज्वालामुखी जब फटता है तो अपने साथ गर्म आग, लावा और राख छोड़ता है। ये सारी चीजें अपने आस-पास के वातावरण को गर्म कर देती हैं। गर्म होने से हवा और हल्के हो जाती है और वह अपने साथ छोटे कणों एवं गैसों को लेकर ऊपर की तरफ जाने लगती है। एक बार ऊंचाई पर पहुंचने पर, जहां हवा प्रवाह काफी तेज होता है। ये कण और हवाएं हवा की दिशा में बहने लगते हैं। इथियोपिया ज्वालामुखी विस्फोट के बाद यही हुआ है। ज्वालामुखी में जब विस्फोट हुआ तो उस क्षेत्र में हवा का प्रवाह पश्चिम की तरफ भारतीय क्षेत्र गुजरात एवं राजस्थान की ओर था। फिर इसका प्रवाह दिल्ली और उत्तर प्रदेश की तरफ था। इसके बाद यह इसके दक्षिणपश्चिम से उत्तरपूर्व की तरफ बढ़ने की उम्मीद है। हवा का प्रवाह यदि ऐसा ही बना रहता है तो उम्मीद है कि राख का यह गुबार मंगलवार शाम तक पूरी तरह चीन में दाखिल हो जाएगा।
विस्फोट के बाद ज्वालामखी से निकलने वाली (पत्थर, नुकीले तत्व, गैस, गुबार,) चीजें मनुष्य को नुकसान पहुंचाने की क्षमता रखती हैं। लेकिन इथियोपिया ज्वालामुखी से निकलने वाली राख काफी ऊंचाई पर है, इसलिए इससे मनुष्य को खतरा नहीं है लेकिन इस गुबार एवं राख से विमानों को नुकसान पहुंचने का खतरा है। लंबी दूरी वाले अंतरराष्ट्रीय विमान सामान्य रूप से सतह से 10 से 14 किलोमीटर की ऊंचाई पर उड़ान भरते हैं और इसी ऊंचाई पर ज्वालामुखी से निकली राख भी उड़ती रहती है। धुएं का गुबार दृश्यता को बाधित कर सकता है और विमानों के उड़ान परिचालन में हस्तक्षेप कर सकता है। इसके बेहद सूक्ष्म कण इंजन के अंदर प्रवेश कर सकते हैं और भीतर पिघल सकते हैं, जिससे संचालन संबंधी खराबियां उत्पन्न होने की संभावना रहती है। यात्रियों द्वारा बाहर की हवा को सांस में लेने का जोखिम बहुत अधिक नहीं होता, क्योंकि हवाई जहाजों में मजबूत फिल्ट्रेशन सिस्टम लगा होता है। लेकिन ये फिल्टर और सेंसर भी इन सूक्ष्म कणों से जाम हो सकते हैं, जिससे उनकी कार्यक्षमता कम हो सकती है। इसके अलावा, कुछ हानिकारक गैसों के फिल्टर से बच निकलने की संभावना हमेशा रहती है।
मुख्य खतरा हवाई जहाज के इंजनों और अन्य मशीनरी को होता है, और इसी कारण एयरलाइंस उन क्षेत्रों से बचती हैं जहां ज्वालामुखीय गुबार फैल रहा हो। दुनिया भर में ज्वालामुखी विस्फोटों की निगरानी करने और संभावित जोखिमों की चेतावनी जारी करने के लिए एक अंतरराष्ट्रीय नेटवर्क मौजूद है। ये चेतावनियां रीयल टाइम में नागरिक उड्डयन प्राधिकरणों को भेजी जाती हैं, जिनके आधार पर हवाई यातायात को नियंत्रित किया जाता है।
ज्वालामुखीय गुबार की गति एक अल्पकालिक घटना होती है। इसके प्रभाव आमतौर पर अगले कुछ दिनों में पूरी तरह समाप्त हो जाते हैं। समय के साथ, गुबार में मौजूद सूक्ष्म कण फैलकर ऐसे स्तर पर पहुंच जाते हैं जहां वे चिंता का विषय नहीं रहते। बादल और बारिश इन कणों को बड़ी मात्रा में धो देते हैं, जिससे उनके प्रभाव काफी कम हो जाते हैं। गुबार में मौजूद गैसें, जैसे सल्फर डाइऑक्साइड या कार्बन डाइऑक्साइड, अधिक समय तक बनी रह सकती हैं, लेकिन ये गैसें पहले से ही वातावरण में पाई जाती हैं। गुबार में इन गैसों की मात्रा इतनी अधिक नहीं होती कि वातावरण में उनकी मौजूदा सांद्रता पर कोई उल्लेखनीय असर डाल सके।
मौसम विशेषज्ञों का कहना है कि इसके मार्ग पर नजर रखे जाने के साथ, पूर्वानुमान मॉडल गुजरात, राजस्थान, दिल्ली-एनसीआर, महाराष्ट्र, पंजाब और हरियाणा पर राख का प्रभाव पड़ सकता है। इंडियामेटस्काई वेदर के अनुसार, यह राख का बादल बाद में हिमालय और उत्तर प्रदेश के आसपास के तराई क्षेत्र को प्रभावित करेगा। इंडियामेटस्काई वेदर ने बताया कि इस धुएं में राख, सल्फर डाइऑक्साइड और बारीक चट्टान के कण हैं। राख का बादल उत्तर भारत में 100-120 किमी/घंटा की गति से बढ़ रहा है तथा 15,000-25,000 फीट की ऊंचाई पर भी जा सकता है।
इथियोपिया की ज्वालामुखी घटना के बाद मंगलवार को दिल्ली हवाई अड्डे पर कम से कम सात अंतरराष्ट्रीय उड़ानें रद्द कर दी गईं और 10 से ज्यादा विदेशी उड़ानें विलंबित रहीं। एअर इंडिया ने सोमवार से अब तक 13 उड़ानें रद्द कीं। एक अधिकारी ने बताया कि ज्वालामुखी के राख के गुबार के कारण दिल्ली हवाई अड्डे पर आने व जाने सहित सात अंतरराष्ट्रीय उड़ानें रद्द कर दी गईं और 12 अंतरराष्ट्रीय उड़ानें विलंबित रहीं। राष्ट्रीय राजधानी स्थित इंदिरा गांधी अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डा देश का सबसे बड़ा हवाई अड्डा है, जहां से प्रतिदिन 1,500 से अधिक उड़ानों का संचालन होता है। कोच्चि हवाई अड्डे से सोमवार को रवाना होने वाली दो अंतरराष्ट्रीय उड़ानें इथियोपिया में ज्वालामुखी विस्फोट के कारण रद्द कर दी गईं। ‘कोचीन अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डा लिमिटेड’ के अनुसार, ज्वालामुखी विस्फोट के बाद एहतियातन जेद्दा और दुबई जाने वाली उड़ानें रद्द की गईं। रद्द उड़ानों में ‘इंडिगो’ की 6ई1475 (कोच्चि–दुबई) और ‘अकासा एयर’ की क्यूपी550 (कोच्चि–जेद्दा) शामिल हैं। हवाई अड्डे के अधिकारियों ने बताया कि स्थिति में सुधार होने पर उड़ान सेवाएं पुनः शुरू कर दी जाएंगी।
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