Bihar Election 2025: बिहार विधानसभा चुनाव के पहले चरण की वोटिंग गुरुवार को हुई। 18 जिलों की 121 सीटों पर उतरे 1314 उम्मीदवारों की किस्मत ईवीएम (EVM) में कैद हो चुकी है। बिहार के वोटर्स की जबरदस्त उत्साह ने 75 साल का रिकॉर्ड तोड़ दिया ।
चुनाव आयोग के मुताबिक, बिहार में पहले चरण में अब तक का सबसे अधिक 64.66% वोटर टर्नआउट रहा। बेगूसराय में 70 प्रतिशत तो समस्तीपुर और मधेपुरा में 67 प्रतिशत वोटिंग हुई। सबसे बड़ी बात है कि पुरुषों की तुलना में महिलाओं ने अधिक वोटिंग की है। इससे पहले साल 2020 के विधानसभा चुनाव में इन्हीं 121 सीटों पर 57.29% वोट पड़े थे। यानी, पिछली बार से लगभग 7 फीसदी वोटिंग ज्यादा हुई है। बिहार के इतिहास में किसी भी चुनाव में इतनी वोटिंग नहीं हुई थी।
खास बात यह है कि इस वोटिंग प्रतिशत से दोनों पक्ष यानी NDA और महागठबंधन खुश हैं। बीजेपी अध्यक्ष जेपी नड्डा का कहना है कि बढ़ी हुई वोटिंग 'एंटी-इंकंबेंसी' नहीं, बल्कि 'प्रो-इनकंबेंसी' है। वहीं, महागठबंधन का दावा है कि जनता बदलाव चाहती है, इसलिए बढ़-चढ़कर वोट कर रही है। वहीं, महागठबंधन की नेताओं को उम्मीद है कि इस बार लोग बदलाव के लिए वोट कर रहे हैं।
भारत के चुनाव में आम तौर पर अधिक वोटिंग का मतलब एंटी इंकम्बेंसी होता है, लेकिन हर बार इस बार नहीं होता। कई बार अधिक मतदान का मतलब (प्रो इंकम्बेंसी) भी रहती है। मतलब साफ है कि पहले फेज की वोटिंग प्रतिशत को देखकर यह अंदाजा लगाना कि किसके पक्ष में अधिक वोटिंग हुई है यह कहना जल्दबाजी होगी।
आइए पहले बिहार के वोटिंग ट्रेंड्स की बात कर लें। राज्य में जब कभी 60 प्रतिशत से ज्यादा वोटिंग होती है, तो राष्ट्रीय जनता दल (RJD) को फायदा हुआ है। वहीं, जब कभी 60 प्रतिशत से ज्यादा वोटिंग हुई है तो उसका फायदा जदयू या यूं कहें कि NDA को हुआ है।
साल 1990 में जब लालू यादव पहली बार मुख्यमंत्री बने थे, तब बिहार में 62.04 प्रतिशत वोटिंग हुई थी। यह पहला मौका था जब बिहार में 60 फीसदी से ज्यादा वोटिंग हुई थी। वहीं, 1995 में 61.79% वोट पड़े थे और 2000 में 62.57% वोटिंग हुई थी।
वहीं, साल 2005 में सिर्फ 46.5 प्रतिशत वोटिंग हुई थी और नीतीश कुमार की सरकार बन गई थी। 2010 में 52.73%, 2015 में 56.91% और 2020 में 57.29% वोटिंग हुई थी। गौरतलब है कि नीतीश कुमार के कार्यकाल में सबसे ज्यादा वोटिंग 57.29 प्रतिशत हुई थी।
ये आंकड़े बताते हैं कि अगर वोट प्रतिशत में इजाफा होता है तो यह जरूरी नहीं कि लोगों ने सरकार बदलने के लिए ही वोटिंग की है।
हालांकि, सवाल है कि आखिर बिहार में वोटर टर्नआउट का रिकॉर्ड कैसे टूट गया? दरअसल, इसके पीछे मुख्य चार फैक्टर हैं।
चुनाव आयोग ने इस साल जून महीने में SIR यानी (विशेष संक्षिप्त पुनरीक्षण) कार्य की शुरुआत की थी। इस कार्य से पहले 7 करोड़ 89 लाख मतदाता थे। इसके पुनरीक्षण कार्य के बाद कुल 65 लाख मतदाताओं के नाम कटे थे। 7 करोड़ 41 लाख, 92357 मतदाताओं की फाइनल सूची जारी की गई।
इसमें कोई दो राय नहीं है कि वोटर लिस्ट के स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन के तहत मतदाताओं की संख्या में कम आई है। वोटर पिछले चुनाव के मुकाबले कम होने से भी मतदान प्रतिशत बढ़ा हुआ दिख सकता है।
हाल ही में देश ने महापर्व छठ मनाया है। लाखों की तादाद में अलग-अलग शहरों से लोग बिहार आए। इस बार प्रवासियों को वोट करने का भी मौका मिल गया, जिसकी वजह से वोटिंग प्रतिशत में जबरदस्त बदलाव देखने को मिला है।
चुनाव से पहले एनडीए और महागठबंधन, दोनों दलों ने युवाओं और रोजगार को अपना प्रमुख हथियार बनाया। एक तरफ जहां तेजस्वी यादव ने ऐलान कर दिया कि अगर उनकी सरकार बनती है तो हर परिवार से एक व्यक्ति को सरकारी नौकरी दी जाएगी। वहीं, एनडीए ने 1 करोड़ सरकारी नौकरी एवं रोजगार के अवसर सृजित करने की घोषणा की है। उम्मीद है कि रोजगार पाने के लिए इस बार बढ़ी तादाद में युवा वोट करेंगे।
बिहार में जब-जब महिलाओं ने बढ़-चढ़कर वोटिंग की है तो उसका फायदा नीतीश कुमार और NDA को मिला है। इस बार भी उम्मीद जताई जा रही है कि नीतीश कुमार के कामकाज और उनके चुनावी वादों से महिलाएं काफी प्रभावित हुई हैं।
माना जा रहा है कि नीतीश सरकार की '10 हजार वाली स्कीम' की वजह से महिला वोटरों में उत्साह है। राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि सरकार ने करीब 1.5 करोड़ महिलाओं के खाते में 10-10 हजार रुपये डाले, जिससे लगभग 4.5 करोड़ वोटरों (प्रति परिवार चार सदस्य मानें) तक इसका सीधा असर पड़ सकता है।
2020 के चुनाव में 167 सीटों पर महिलाओं ने जबरदस्त वोटिंग की थी, जिनमें से 99 सीटों पर एनडीए को जीत हासिल हुई थी। इस बार भी महिला वोटरों की भागीदारी एनडीए के लिए गुड न्यूज है।
इतिहास में झांके तो साल 2005 के बाद नीतीश कुमार ने महिलाओं के लिए कई बड़े फैसले लिए। नीतीश कुमार के शासन में ही पंचायती राज में महिलाओं को 50% आरक्षण दिया गया। इसके बाद नीतीश कुमार ने छात्राओं के लिए साइकिल योजना की शुरुआत की। लड़कियां अपने घरों की चौखट लांघ कर कई किलोमीटर दूर स्कूलों में पढ़ाई करने जाने लगीं।
वहीं, महिला सुरक्षा को लेकर नीतीश कुमार ने कई अहम फैसले लिए। साइकिल योजना, शराबबंदी और महिला सुरक्षा जैसे फैसलों से महिलाओं में भरोसा जीता था। इसके अलावा एनडीए ने अपने संकल्प पत्र में कई ऐसे वादे किए हैं, जिसकी काफी चर्चा हो रही है।
भले ही वोटिंग में महिलाओं की बड़ी भागीदारे से एनडीए के नेता खुश हैं, लेकिन महागठबंधन ने भी कई ऐसी चुनावी वादे किए हैं, जिनसे उन्हें काफी उम्मीदें हैं। महागठबंधन ने अपनी घोषणा पत्र को तेजस्वी प्रण नाम दिया है। इसमें 25 बड़े वादे किए गए हैं।
पहले चरण की वोटिंग के बाद अब 122 सीटों पर 11 नवंबर को मतदान होना है। रिपोर्ट के मुताबिक दूसरे चरण में कुल 1302 उम्मीदवार चुनाव मैदान में हैं। अब बिहार की बिहार की आधी आबादी की है कि वो किसे अपना नेता चुनते हैं। आखिरकार 14 नवंबर को ही इस बात पर मुहर लग सकती है कि इस बार हुई रिकॉर्ड वोटिंग का मतलब एंटी इनकंबेंसी रहा या प्रो इनकंबेंसी।
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