यूनिस्को वर्ल्ड हेरिटेज साइट में शामिल हैं ये विरासतें
भारत, जो 28 राज्यों और 8 केंद्र शासित प्रदेशों का एक संघ है, अपनी समृद्ध सांस्कृतिक विरासत और ऐतिहासिक महत्व के लिए विश्व भर में प्रसिद्ध है। प्रत्येक राज्य अपनी विशिष्ट संस्कृति और गौरवशाली इतिहास को समेटे हुए है। देश भर में असंख्य प्राचीन इमारतें और स्थल मौजूद हैं जो बीते युगों की कहानियां सुनाते हैं। ऐसे में आपके लिए यह जानना महत्वपूर्ण है कि अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर भारत में स्थित कितनी विरासतों को पहचान मिली है। यूनेस्को (UNESCO) की आधिकारिक वेबसाइट के अनुसार, भारत के कुल 44 स्थल विश्व धरोहर सूची (World Heritage Sites List) में शामिल हैं। इस संख्या में 36 सांस्कृतिक स्थल, 7 प्राकृतिक स्थल और एक मिश्रित स्थल शामिल है। हालांकि, कई लोगों को यह जानकारी नहीं होगी कि इस प्रतिष्ठित सूची में बिहार राज्य के कितने स्थल शामिल हैं। आइए, आज हम आपको बिहार में स्थित यूनेस्को के विश्व धरोहर स्थलों के बारे में बताएं।
बुद्ध की भूमि बिहार
बुद्ध की पावन भूमि के रूप में प्रसिद्ध बिहार, अपनी समृद्ध संस्कृति और ऐतिहासिक विरासत के लिए विख्यात है। इसे केवल 'बुद्ध की धरती' ही नहीं, बल्कि 'गौरव की भूमि', 'ज्ञान की भूमि', और 'मठों की भूमि' जैसे कई नामों से भी जाना जाता है। बिहार का इतिहास बहुत गौरवशाली रहा है, क्योंकि ये वही स्थान है, जहां जैन और बौद्ध धर्मों का उदय हुआ।
इसी महान भूमि पर महान गणितज्ञ आर्यभट्ट, गौतम बुद्ध, भगवान महावीर, और भारत के प्रथम राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद जैसी असाधारण हस्तियों को जन्म हुआ। इसके अलावा, यहीं पर प्रसिद्ध ग्रंथ 'आर्यभटीय' और 'अर्थशास्त्र' की रचना की गई थी। विश्व का सबसे प्रतिष्ठित प्राचीन शिक्षण केंद्र, नालंदा विश्वविद्यालय, भी बिहार में ही स्थित था। यह क्षेत्र ऐतिहासिक रूप से मगध से लेकर विहार और वर्तमान बिहार तक का लंबा सफर तय कर चुका है।
ये भी पढ़ें - नालंदा की विरासत, बुद्ध की धरती, बिहार के गौरवशाली इतिहास की अनकही कहानी, इतिहास के पन्नों से आज तक का सफर
बिहार में यूनेस्कों की दो विश्व धरोहर स्थल हैं। जो इस प्रकार है -
1. महाबोधि मंदिर परिसर
2. नालंदा विश्वविद्यालय
बिहार के बोधगया में स्थित महाबोधि मंदिर परिसर को वर्ष 2002 में यूनेस्को की विश्व धरोहर स्थलों की सूची में शामिल किया गया था। इस पवित्र स्थल की स्थापना तीसरी शताब्दी ईसा पूर्व में महान मौर्य सम्राट अशोक द्वारा की गई थी। यह उन चार पवित्र स्थलों में से एक है जो गौतम बुद्ध के जीवन, विशेषकर उनके ज्ञान प्राप्ति को दर्शाते हैं। यह वही स्थान है, जहां बौद्ध धर्म फला-फूला और बुद्ध का जीवन इसी क्षेत्र में बीता। उन्होंने बोधगया में ज्ञान की प्राप्ति की थी। इस मंदिर को देश में ईंट वास्तुकला का सबसे पुराना और बेहतरीन संरक्षित उदाहरण माना जाता है। परिसर में मुख्य रूप से बोधिवृक्ष (जिसके नीचे बुद्ध ने ज्ञान प्राप्त किया), वज्रासन (ज्ञान प्राप्ति के बाद बुद्ध का ध्यान स्थल), और मृणाल कुंड (बुद्ध के सात सप्ताहों से जुड़ा स्थान) शामिल हैं।
नालंदा विश्वविद्यालय को 2016 में यूनेस्को विश्व धरोहर सूची में नालंदा महाविहार के पुरातात्विक स्थल के रूप में मान्यता मिली। इन पुरातात्विक अवशेषों में तीसरी शताब्दी ईसा पूर्व से तेरहवीं शताब्दी ईस्वी तक सक्रिय रहे एक विशाल मठ और शैक्षणिक संस्थान के साक्ष्य मिलते हैं। यहां स्तूप , मंदिर, विहार (आवासीय और शैक्षणिक भवन) और प्लास्टर, पत्थर और धातु से बनी महत्वपूर्ण कलाकृतियां देखने को मिलती हैं।
नालंदा भारतीय उपमहाद्वीप के सबसे प्राचीन विश्वविद्यालय के रूप में विख्यात है। यह स्थल आठ सौ वर्षों की निर्बाध अवधि तक व्यवस्थित रूप से ज्ञान के प्रसार में सक्रिय रहा। इसका ऐतिहासिक विकास यह सिद्ध करता है कि कैसे बौद्ध धर्म एक धार्मिक मत के रूप में विकसित हुआ और यहां मठवासी एवं शैक्षणिक परंपराओं ने चरम उत्कर्ष प्राप्त किया। नालंदा विश्वविद्यालय को 12वीं शताब्दी के अंत में (लगभग 1193 ईस्वी) तुर्क आक्रमणकारी बख्तियार खिलजी द्वारा नष्ट किया गया। आक्रमण में विश्वविद्यालय में स्थित विशाल लाइब्रेरी को जला दिया गया और भिक्षुओं की हत्या की गई थी। ज्ञान के केंद्र को खत्म करने का पूरा प्रयास किया गया।