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Explained: दुनिया में सबसे तेज GDP ग्रोथ, विशाल बाजार, क्या अब विदेशी निवेशक भारतीय बाजार पर होंगे बुलिश?

FII खरीदारी से लार्ज-कैप सबसे बड़े लाभार्थी बनकर उभरेंगे। आने वाले दिनों में भारतीय शेयर बााजर की रैली की पूरी उम्मीद है। हालांकि जो लार्ज-कैप उचित वैल्यूएशन पर हैं, उनमें FII इनफ्लो की मदद से बेहतर प्रदर्शन करने की क्षमता है। बैंकिंग लीडर्स, नॉन-बैंकिंग फाइनेंशियल और टेलीकॉम, कैपिटल गुड्स और IT में अन्य ब्लूचिप जैसी लार्ज-कैप में FII पसंदीदा शेयरों में तेजी आएगी।

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विदेशी निवेशक कब वापसी करेंगे?

भारत दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती हुई बड़ी अर्थव्यवस्था है, जिसका सालाना GDP 2021 से 2024 के दौरान औसतन 8.2% बढ़ा है। इस कैलेंडर वर्ष में भी ग्रोथ की गति बनी हुई है। नेशनल स्टैटिस्टिक्स ऑफिस के अनुसार, भारतीय अर्थव्यवस्था ने जनवरी-मार्च और अप्रैल-जून 2025 तिमाहियों में क्रमशः 7.4% और 7.8% की सालाना GDP ग्रोथ दर्ज की। इतना ही नहीं, भारत दुनिया में तेजी से बढ़ता उपभोक्ता बाजार है। जल्द ही भारत दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा उपभोक्ता बाजार बन सकता है। हालांकि, यह शानदार ग्रोथ रेट और विशाल बाजार भी विदेशी निवेशकों को अपनी ओर आकर्षित नहीं कर पा रहा है। पिछले दो साल में विदेशी निवेशकों ने भारतीय बाजार में बड़ी बिकवाली की है। क्या अब वो भारतीय बाजार की ओर रुख करेंगे? आइए समझने की कोशिश करते हैं।

FPI ने पिछले 5 में से 4 साल बिकवाली की

आपको बता दें कि विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों (FPI) ने पिछले 5 में से 4 साल भारतीय बाजार से पैसा निकाले हैं। FPI ने पिछले पांच वित्तीय वर्षों (अप्रैल-मार्च) 2021-22 के दौरान, केवल एक साल (2023-24) में भारतीय इक्विटी बाजारों में 25.3 अरब डॉलर का नेट FPI इनफ्लो हुआ। बाकी सभी सालों में, FPIs ने जितना निवेश किया, उससे ज्यादा पैसा निकाल लिया, जिसके परिणामस्वरूप 2021-22 में $18.5 बिलियन, 2022-23 में 5.1 अरब डॉलर, 2024-25 में $14.6 बिलियन और 2025-26 में (5 सितंबर तक) 2.9 अरब डॉलर का नेट आउटफ्लो हुआ।

तेज GDP ग्रोथ के बावजूद क्यों नदारद रहे निवेशक?

जब किसी देश की अर्थव्यवस्था तेजी से बढ़ती है तो, वह आमतौर पर विदेशी निवेशकों को आकर्षित करती है जो उस ग्रोथ के फायदों में हिस्सा लेना चाहते हैं। लेकिन आंकड़ों से पता चलता है कि 2024-25 में भारत में नेट कैपिटल फ्लो सिर्फ 18.3 अरब डॉलर रहा– जिसमें विदेशी निवेश, कमर्शियल उधार, बाहरी मदद और नॉन-रेजिडेंट इंडियन डिपॉजिट शामिल हैं जो 2008-09 के ग्लोबल फाइनेंशियल संकट वाले साल के 7.8 अरब डॉलर के बाद सबसे कम है और 2007-08 के ऑल-टाइम हाई 107.9 अरब डॉलरन से बहुत कम है। यह ट्रेंड मौजूदा फाइनेंशियल ईयर में भी जारी रहा, अप्रैल-जून 2025 के दौरान कैपिटल इनफ्लो अप्रैल-जून 2024 की तुलना में 40% से ज्यादा गिर गया। वह भी तब जब लेटेस्ट तिमाही में उम्मीद से ज़्यादा 7.8% की GDP ग्रोथ रही।

अब सवाल उठता है कि विदेशी निवेशक भारत की ग्रोथ स्टोरी में हिस्सा क्यों नहीं ले रहे हैं? क्या वे अब देश की आर्थिक संभावनाओं को लेकर पहले से कम आशावादी हैं? मार्केट एक्सपर्ट का कहना है कि इसके पीछे कई वजह है जो नीचे दिए गए हैं।

मूल्यांकन: भारतीय शेयर वैश्विक बाजार की तुलना में अपेक्षाकृत महंगे हैं। इसलिए विदशी निवेशक यहां से पैसा निकालकर दूसरे बाजर में लगा रहे हैं।

रुपये की कमजोरी: डॉलर के मुकाबले रुपये का अवमूल्यन भी इसकी दूसरी वजह है। 2025 के बाद 2026 में रुपया टूटा है। रुपया का टूटना विदेशी निवेशकों को नुकसान पहुंचाता है। इसलिए वो अपना पैसा निकाल रहे हैं।

ट्रेड डील: अमेरिका से अब ट्रेड डील हो गया है। इससे पहले अमेरिकी भारी टैरिफ से भारतीय कंपनियों को नुकसान हो रहा था। इससे भी विदेशी निवेशक अपना पैसा भारतीय बाजार से निकाल रहे थे।

क्या अब विदेशी निवेशक वापस लौटेंगे?

मार्केट एक्सपर्ट और अर्थशास्त्रियों का कहना है कि भारत-अमेरिका व्यापार समझौता के बाद अब विदेशी निवेशक भातरीय बाजार में वापसी करेंगे। ऐसा इसलिए कि अमेरिका के साथ व्यापार समझौता भारत की मध्यम अवधि की वृद्धि और बाहरी स्थिरता के लिए संरचनात्मक रूप से सकारात्मक है। बेहतर बाजार पहुंच और टैरिफ निश्चितता से निर्यात को बढ़ावा मिलने, विनिर्माण निवेश को समर्थन मिलने और प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (FDI) के प्रवाह को मजबूत होने की संभावना है।

share Market

शेयर बाजार

मार्केट एक्सपर्ट का कहना है कि अमेरिकी FII पूंजी का एक बड़ा हिस्सा अब भारतीय बाजार में आएगा। अमेरिका के ट्रेड डील स्थिरता, विकास में तेजी और बेहतर सेक्टोरल संभावनाओं का संकेत देता है, जो मिलकर निवेशकों का विश्वास बढ़ाने का काम करेगा। एक्सपोर्ट-ओरिएंटेड सेक्टर्स में वैल्यूएशन रीरेटिंग होने की संभावना है, जिससे इक्विटी इनफ्लो बढ़ेगा, जबकि मजबूत रुपये का आउटलुक भारतीय डेट को बॉन्ड इन्वेस्टर्स के लिए ज़्यादा आकर्षक बना सकता है। कुल मिलाकर, यह डील जियोपॉलिटिकल और ट्रेड जोखिमों को कम करती है, जो FPI एलोकेशन फैसलों में एक मुख्य फैक्टर है। हालांकि एग्जीक्यूशन जोखिम और ग्लोबल डिमांड की स्थितियां महत्वपूर्ण वेरिएबल बनी रहेंगी, लेकिन इस समझौते को व्यापक रूप से एक स्ट्रक्चरल पॉजिटिव के रूप में देखा जा रहा है जो FPIs को भारत की ग्रोथ स्टोरी से फिर से जोड़ेगा।

FII खरीदारी से लार्ज-कैप सबसे बड़े लाभार्थी बनकर उभरेंगे। आने वाले दिनों में भारतीय शेयर बााजर की रैली की पूरी उम्मीद है। हालांकि जो लार्ज-कैप उचित वैल्यूएशन पर हैं, उनमें FII इनफ्लो की मदद से बेहतर प्रदर्शन करने की क्षमता है। बैंकिंग लीडर्स, नॉन-बैंकिंग फाइनेंशियल और टेलीकॉम, कैपिटल गुड्स और IT में अन्य ब्लूचिप जैसी लार्ज-कैप में FII पसंदीदा शेयरों में तेजी आएगी।

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