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सिर पर पैर रख भाग रहे FII, इस साल 1.80 लाख करोड़ निकाले, क्यों बाजार के लिए खतरे की घंटी?

भारतीय शेयर बाजार से विदेशी निवेशक लगातार पैसा निकाल रहे हैं। इस साल 1.80 लाख रुपये की निकासी हुई है। आखिर क्यों FII भारतीय बाजार छोड़ रहे हैं और कैसे यह भारतीय बाजार के लिए खतरे की घंटी है?

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भारतीय बाजार से लगातार भाग रहे विदेशी निवेशक
Authored by: Yateendra Lawaniya
Updated Apr 14, 2026, 13:04 IST

FII outflow : भारतीय शेयर बाजार में विदेशी निवेशकों की बिकवाली अब एक अस्थायी झटका नहीं, बल्कि बड़ा ट्रेंड बन चुकी है। 2026 में अब तक FII/FPI करीब $20.1 अरब निकाल चुके हैं, जबकि वित्त वर्ष 2026 में यह बिकवाली रिकॉर्ड $19.69 अरब तक पहुंच गई थी। महंगा कच्चा तेल, कमजोर रुपया और मुनाफे पर दबाव इस निकासी को और तेज कर रहे हैं।

$20 अरब के पार पहुंचा दबाव

अगर 2026 को कैलेंडर ईयर के रूप में देखें, तो तस्वीर बेहद साफ है। NSDL और CDSL के आंकड़ों के मुताबिक मार्च 2026 में विदेशी निवेशकों ने भारतीय इक्विटी में $13.6 अरब की निकासी की, जबकि अप्रैल में अब तक करीब $6.5 अरब और निकल चुका है। दोनों को जोड़ दें तो कुल आउटफ्लो लगभग $20.1 अरब यानी करीब 1.80 लाख करोड़ रुपये बैठता है। यह आंकड़ा दिखाता है कि विदेशी पूंजी की वापसी अब एक लंबे और तेज करेक्शन में बदल चुकी है।

वित्त वर्ष 2026 भी रहा रिकॉर्ड कमजोर

वित्त वर्ष 2026 के अंत तक विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों ने भारतीय शेयरों से रिकॉर्ड $19.69 अरब निकाल लिए थे। यह पिछले कई वर्षों की सबसे बड़ी सालाना बिकवाली रही और इसी ने निफ्टी को छह साल में अपने सबसे कमजोर वित्तीय वर्ष की ओर धकेल दिया।

सालनेट फ्लो ($ अरब)नेट फ्लो (₹ करोड़)स्थिति
2021+3.5+25,752मजबूत इनफ्लो
2022-17.0-1,21,439भारी आउटफ्लो
2023+21.0+1,71,106रिकॉर्ड इनफ्लो
2024+0.25+2,026लगभग फ्लैट
2025-18.0-1,49,000 (लगभग)तेज आउटफ्लो
2026*-20.1-1,67,000 (लगभग)रिकॉर्ड आउटफ्लो

कच्चा तेल बना सबसे बड़ा ट्रिगर

बिकवाली के पीछे सबसे बड़ा कारण कच्चे तेल की तेजी है। ईरान और यूएस युद्ध की वजह से कच्चे तेल का दाम पिछले 40 दिन से 90 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर बना हुआ है। आज भी क्रूड का दाम 90 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर है। अर्थशास्त्रियों के मुताबिक 60 डॉलर प्रति बैरल से महंगा क्रूड भारतीय इकोनॉमी के लिहाज से ठीक नहीं है। भारत जैसे आयात-निर्भर देश के लिए यह चालू खाते के घाटे, महंगाई और ग्रोथ तीनों पर दबाव बढ़ाता है।

रुपया टूटने से और बिगड़ा हिसाब

तेल महंगा होने के साथ रुपये पर भी दबाव बढ़ा। 13 अप्रैल को रुपया 0.7% गिरकर 93.3750 प्रति डॉलर पर रहा। पिछले तीन महीने से रुपया लगातार 90 प्रति डॉलर से ऊपर बना हुआ है। इससे डॉलर में निवेश करने वाले विदेशी निवेशकों के रिटर्न पर सीधा असर पड़ता है, क्योंकि शेयरों के नुकसान के साथ करेंसी नुकसान भी जुड़ जाता है।

बाजार का भरोसा क्यों डगमगाया

अप्रैल के दौरान विदेशी निकासी और रुपये की कमजोरी ने बाजार सेंटीमेंट को और कमजोर किया है। इसी बीच RBI को रुपये को संभालने के लिए दखल देना पड़ा और मार्च-अप्रैल में बैंकों के जरिए अरबों डॉलर के आर्बिट्राज फ्लो को लेकर भी जांच शुरू हुई। यह सब मिलकर विदेशी पूंजी के लिए भारत को कम आकर्षक बना रहा है।

FII का जाना क्यों है खतरे की घंटी

जब विदेशी संस्थागत निवेशक भारतीय बाजार से पैसा निकालते हैं, तो यह सिर्फ एक ट्रेडिंग ट्रेंड नहीं होता, बल्कि बाजार के भरोसे पर सवाल बन जाता है। लगातार बिकवाली से लिक्विडिटी घटती है, बड़े स्टॉक्स पर दबाव बढ़ता है और इंडेक्स की चाल कमजोर पड़ जाती है। यही वजह है कि FII आउटफ्लो को बाजार सबसे पहले जोखिम संकेतक की तरह देखता है।

वैल्यूएशन पर चोट

FII निकलते हैं तो बाजार का भावनात्मक सहारा भी कमजोर होता है। विदेशी पैसा अक्सर लार्जकैप और हैवीवेट शेयरों में सबसे ज्यादा असर डालता है, इसलिए उनकी बिकवाली से वैल्यूएशन नीचे आने लगते हैं। रिपोर्ट में भी साफ कहा गया है कि भारत की कीमतें अब “फेयर” स्तर पर आ गई हैं, लेकिन यह अपने आप में खरीदारी का मजबूत संकेत नहीं है।

रुपये और महंगाई पर दबाव

FII के जाने का असर सिर्फ शेयरों तक सीमित नहीं रहता। डॉलर आउटफ्लो बढ़ने से रुपया कमजोर पड़ सकता है, और कमजोर रुपया आयात महंगा बनाता है। ऊपर से ब्रेंट क्रूड जैसे कारक जोड़ दें तो महंगाई, चालू खाते का घाटा और RBI की नीति पर दबाव तीनों बढ़ जाते हैं। यही मैक्रो डर विदेशी निवेशकों को और सतर्क बनाता है।

कमाई की कहानी भी कमजोर पड़ती है

अगर कंपनियों की कमाई उम्मीद के मुताबिक नहीं बढ़ी, तो बाजार के लिए री-रेटिंग मुश्किल हो जाती है। रिपोर्ट के मुताबिक युद्ध, सप्लाई चेन बाधा और ऊंचे इनपुट कॉस्ट की वजह से मैन्युफैक्चरिंग और FMCG सेक्टर की मार्जिन पर असर पड़ सकता है। इसलिए FII का निकलना सिर्फ कैश की निकासी नहीं, बल्कि आने वाली कमाई पर अविश्वास का संकेत भी माना जाता है।

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