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हॉर्मुज का दबदबा क्यों कायम? अगर 302 Km रेल लाइन से बदल सकता है तेल का खेल तो फिर कहां फंसा पेंच

हॉर्मुज स्ट्रेट बंद होने से भारत समेत दुनिया के अधिकांश देश कच्चे तेल और गैस को लेकर परेशानी का सामना कर रहे हैं। ऐसे में क्या हॉर्मुज स्ट्रेट का विकल्प रेलवे बन सकता है? आइए इस सवाल का जवाब देते हैं।

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हॉर्मुज जलडमरूमध्य विवाद
Authored by: Alok Kumr
Updated Apr 1, 2026, 13:15 IST

अमेरिका-इजरायल और ईरान के बीच जारी युद्ध 1 महीने से अधिक समय से चल रहा है। युद्ध खत्म होने की उम्मीद जल्द दिखाई नहीं दे रही है। अमेरिका ने भले अपने रुख में नरमी लाई है लेकिन ईरान मानने को तैयार नहीं है। मिडिल ईस्ट में जारी इस युद्ध से पूरी दुनिया प्रभावित है क्योंकि ईरान ने सबसे प्रमुख तेल रूट स्ट्रेट ऑफ होर्मुज को बंद रखा है। मध्य-पूर्व से निकलने वाला कच्चा तेल इसी रास्ते से होकर एशिया, यूरोप और अमेरिका तक पहुंचता है। अमेरिका समेत खाड़ी के देश लाख कोशिशों के बावजूद यह रूट खुल नहीं पा रहा है। इससे दुनियाभर में कच्चे तेल और गैस की कीमत रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गई है। इसके अलावा तमाम जरूरी सामान के दाम भी बढ़ गए हैं।

इस संकट के बीच एक बड़ा सवाल खड़ा होता है, जब खाड़ी देशों के पास संसाधनों और धन की कोई कमी नहीं, तो फिर ऐसा क्यों है कि एक रेल रूट अब तक हॉर्मुज स्ट्रेट का दबदबा खत्म नहीं कर पाया? खासकर तब, जब यूएई और ओमान के बीच बनने वाला महत्वाकांक्षी सीमा-पार ‘हफीत रेल’ प्रोजेक्ट अपने अंतिम चरण में पहुंच रहा है। अबू धाबी को ओमान के सोहर बंदरगाह से जोड़ने वाला करीब 238 किलोमीटर लंबा यह नेटवर्क आधे से ज्यादा तैयार हो चुका है और क्षेत्र में माल व यात्री परिवहन की तस्वीर बदलने की क्षमता रखता है। आइए समझते हैं कि इसमें कहां फंसा पेंच और क्यों कोई रेल रूट, हॉर्मुज स्ट्रेट का विकल्प नहीं बन सकता है।

हॉर्मुज स्ट्रेट क्या है?

हॉर्मुज स्ट्रेट एक बेहद अहम समुद्री मार्ग है, जो उत्तर में ईरान और दक्षिण में ओमान व यूएई के बीच स्थित है। यह पर्शियन गल्फ को ओमान की खाड़ी और अरब सागर से जोड़ता है। यानी खाड़ी देशों के लिए खुले समुद्र तक जाने का यह एकमात्र रास्ता है। अपने सबसे संकरे हिस्से में यह करीब 35 मील चौड़ा है, लेकिन जहाजों के आने-जाने के लिए असली शिपिंग लेन इससे भी काफी पतली है- दोनों दिशाओं में सिर्फ 2-2 मील चौड़ी, जिसके बीच 2 मील का बफर जोन होता है। फिर भी, यह इतना गहरा और चौड़ा है कि दुनिया के सबसे बड़े तेल टैंकर आसानी से गुजर सकते हैं। यही वजह है कि यह दुनिया के सबसे व्यस्त तेल मार्गों में शामिल है। दुनिया के कुल तेल व्यापार का करीब 20% इसी रास्ते से गुजरता है। इसी कारण हॉर्मुज स्ट्रेट को सिर्फ एक समुद्री रास्ता नहीं, बल्कि वैश्विक ऊर्जा सप्लाई का “गेटवे” माना जाता है।

क्यों आसान नहीं 302 किमी रेल लाइन का विकल्प?

302 किमी रेल लाइन का विचार पहली नजर में हॉर्मुज स्ट्रेट का एक मजबूत विकल्प लगता है, जिसमें यूएई के फुजैरा पोर्ट जो इस स्ट्रेट के बाहर स्थित है को सऊदी अरब या अन्य तेल उत्पादक क्षेत्रों से जोड़ने की योजना शामिल है, ताकि तेल सीधे जमीन के रास्ते बंदरगाह तक पहुंच सके और जहाजों को हॉर्मुज से गुजरने की जरूरत न पड़े, जिससे जियोपॉलिटिकल जोखिम भी कम हो जाए; लेकिन हकीकत इससे कहीं ज्यादा जटिल है, क्योंकि सबसे बड़ी बाधा लागत और आर्थिक व्यवहार्यता की है। रेलवे से तेल ले जाने में अरबों डॉलर खर्च होंगे और रखरखाव भी महंगा होगा, जबकि मौजूदा समुद्री रास्ता काफी सस्ता है। इसके अलावा लॉजिस्टिक्स और क्षमता भी चुनौती है, क्योंकि तेल टैंकर एक बार में लाखों बैरल लेकर जाते हैं, जबकि रेल की क्षमता सीमित होती है और कई चरणों में ट्रांसफर करना पड़ता है, जिससे लागत और समय दोनों बढ़ेंगे।

लागत कई गुना बढ़ जाएगी

सुरक्षा के लिहाज से भी जमीन पर बनी रेल लाइन सही नहीं है। आतंकवादी हमलों या युद्ध में आसानी से इसे निशाना बनाया जा सकता है। एक विशाल कच्चा तेल टैंकर (VLCC) लगभग 20 लाख बैरल तेल ले जा सकता है। इतनी मात्रा में तेल ढोने के लिए कम से कम 100 से 150 लंबी मालगाड़ियों की आवश्यकता होगी। रेल के जरिए इतना बड़ा वॉल्यूम मैनेज करना न केवल जटिल है, बल्कि टैंकरों के मुकाबले 5-7 गुना महंगा पड़ेगा। इतना ही नहीं हॉर्मुज स्ट्रेट से निकलने वाले तेल सप्लाई को रेल रूट से भेजने के लिए हर 5 मिनट में एक ट्रेन 24 घंटे चलाने होगी। इसके लिए सैंकड़ों ट्रेन की जरूरत होगी। यह इतना आसाना नहीं होगा।

Strait of Hormuz.

Strait of Hormuz.

कनेक्टिविटी और भौगोलिक चुनौती भी

302 किमी की लाइन सुनकर छोटी लगती है, लेकिन रेगिस्तानी इलाकों में भारी वजन वाली 'ऑयल टैंकर ट्रेन्स' के लिए ट्रैक बिछाना और उसका रखरखाव करना एक तकनीकी चुनौती है। साथ ही, बंदरगाहों पर तेल को ट्रेन से उतारने और फिर जहाजों में लोड करने में समय और पैसा दोनों ज्यादा खर्च होंगे।

क्या तेल पाइप लाइन विकल्प बन सकता है?

पाइपलाइन से हॉर्मुज स्ट्रेट को पूरी तरह बायपास करना आसान नहीं है, क्योंकि भौगोलिक स्थिति इसकी सबसे बड़ी बाधा है। सऊदी अरब के पास एक पाइपलाइन है जो तेल को रेड सी तक पहुंचाती है। यूएई के पास भी एक पाइपलाइन है जो तेल को हॉर्मुज के बाहर ओमान की खाड़ी तक ले जाती है। लेकिन इनकी क्षमता बेहद सीमित है। सऊदी पाइपलाइन: करीब 30-50 लाख बैरल/दिन और यूएई पाइपलाइन की क्षमता करीब 7 लाख बैरल/दिन है। वहीं, हॉर्मुज स्ट्रेट से रोजाना लगभग 2 करोड़ बैरल तेल गुजरता है। यानी, दोनों पाइपलाइनों की कुल क्षमता भी हॉर्मुज का पूरा विकल्प नहीं बन सकती।

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