ईरान संकट के बीच गैस प्रोडक्शन में आत्मनिर्भर बनने के लिए भारत सरकार ने बड़ा कदम उठाया है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता में बुधवार को केंद्रीय मंत्रिमंडल ने 37,500 करोड़ रुपये के बजट के साथ कोयला/लिग्नाइट गैसीकरण परियोजनाओं को मंजूरी दी है। कोल गैसीफिकेशन' एक ऐसी तकनीक है जिससे कोयले को 'सिनगैस' (Syngas) में बदला जाता है। इस गैस का उपयोग यूरिया (खाद), मेथनॉल और अन्य जरूरी रसायनों को बनाने में किया जा सकता है, जिन्हें अभी हम विदेशों से महंगे दामों पर खरीदते हैं। इस स्कीम का लक्ष्य गैस प्रोडक्शन की दुनिया में आत्मनिर्भर बनना है।
इस स्कीम का उद्देश्य 2030 तक 100 मिलियन टन कोयले के गैसीकरण के राष्ट्रीय लक्ष्य को हासिल करना, देश की ऊर्जा सुरक्षा को मजबूत करना और LNG, यूरिया, अमोनिया तथा मेथनॉल जैसे अहम उत्पादों के आयात पर निर्भरता घटाना है। वर्तमान में भारत अपनी जरूरत का 50% से ज्यादा LNG, करीब 20% यूरिया, लगभग पूरा अमोनिया और 80-90% मेथनॉल विदेशों से आयात करता है। आइए समझते हैं कि क्या है यह स्कीम और कैसे गैस उत्पादन में भारत की विदेशी निर्भरता होगी खत्म?
क्या है कोल गैसीकरण प्रोजेक्ट?
कोल गैसीकरण एक ऐसी प्रक्रिया है जिसमें कोयले को सीधे जलाया नहीं जाता, बल्कि इसे ऑक्सीजन और भाप के साथ नियंत्रित परिस्थितियों में गर्म किया जाता है। इससे एक गैस निकलती है जिसे 'सिनगैस' (Syngas) कहते हैं। इस सिनगैस का उपयोग अमोनिया, हाइड्रोजन, मेथनॉल और नेचुरल गैस बनाने में किया जा सकता है। चीन इस तकनीक का ग्लोबल लीडर है। वह अपने 90% अमोनिया (खाद बनाने के लिए जरूरी) का उत्पादन कोयले को गैस बनाकर करता है। चीन सालाना 80 MMTPA गैस का उत्पादन कर रहा है। भारत, फिलहाल यूरिया और खाद बनाने के लिए महंगी आयातित 'नेचुरल गैस'पर निर्भर हैं। अगर भारत अपने घरेलू कोयले से गैस बनाता है, तो खाद की कीमतें कम होंगी और विदेशी मुद्रा की बचत होगी।
योजना की 5 बड़ी बातें
- बजट और लक्ष्य: सरकार 37,500 करोड़ रुपये खर्च करेगी ताकि 2030 तक 100 मिलियन टन कोयले का गैस में रूपांतरण किया जा सके।
- भारी निवेश: इस योजना से देश में 2.5 से 3 लाख करोड़ रुपये का निवेश आने की उम्मीद है।
- रोजगार के अवसर: कोयला समृद्ध राज्यों में लगभग 50,000 नई नौकरियां (प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष) पैदा होंगी।
- लंबे समय की गारंटी: कंपनियों को भरोसा देने के लिए कोयला लिंकेज की अवधि बढ़ाकर 30 साल कर दी गई है।
- आर्थिक मदद: सरकार कंपनियों को उनकी मशीनरी और प्लांट की लागत का 20% तक वित्तीय प्रोत्साहन (Incentive) देगी।
ईरान संकट का व्यापक असर पड़ा
ईरान युद्ध और स्ट्रेट ऑफ होर्मुज बंद होने से भारत में तेल और गैस की आपूर्ति बुरी तरह से प्रभावित हुई है। होर्मुज बंद होने का असर तेल से अधिक गैस की सप्लाई पर पड़ा है, क्योंकि इसी रूट से भारत अपनी जरूरत का करीब 80% गैस की आपूर्ति करता है। इस संकट के बाद अब भारत सरकार ने दूसरे सेक्टर की तरह भी गैस प्रोडक्शन में आत्मनिर्भर बनने की फैसला किया है। इस स्कीम के तहत देश में कोयले से गैस प्रोडक्शन किया जाएगा।
6,300 करोड़ के रेवन्यू की उम्मीद
इस योजना से सरकार को भी बड़ा राजस्व मिलने का अनुमान है। 75 मिलियन टन गैसीकरण से सालाना लगभग 6,300 करोड़ रुपये का राजस्व मिलने की संभावना जताई गई है। इसके अलावा GST और अन्य टैक्स से भी अतिरिक्त कमाई होगी। सरकार का अनुमान है कि इस योजना से 2.5 लाख करोड़ रुपये से लेकर 3 लाख करोड़ रुपये तक का निवेश आकर्षित हो सकता है। साथ ही कोयला समृद्ध क्षेत्रों में करीब 25 परियोजनाओं के जरिए 50,000 प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रोजगार पैदा होने की उम्मीद है।
भारत में कोयले का विशाल भंडार
भारत के पास कोयले का विशाल भंडार है। दुनिया में भारत, कोयले के भंडार में पांचवें स्थान पर आता है। सरकार ने 2030 तक 100 मिलियन टन कोयला गैसीकरण का लक्ष्य निर्धारित किया है। कोयला राज्य मंत्री सतीश चंद्र दुबे ने हाल ही में बताया था कि कोल गैसीकरण, सरकार की रणनीति का व्यापक हिस्सा है, जिसका उद्देश्य ऊर्जा आत्मनिर्भरता को बढ़ाना और देश के प्रचुर कोयला भंडारों का अधिकतम उपयोग सुनिश्चित करना है। मंत्री ने बताया कि 7 गैसीकरण परियोजनाओं में से दो प्रोजेक्ट जल्द ही देश में शुरू हो जाएंगी।
Coal Gasification
गैस में 'आत्मनिर्भरता' बहुत जरूरी
भारत अपनी कुल गैस का 30% खाद कारखानों को देता है, फिर भी हम चीन से खाद आयात करने को मजबूर हैं। अगर कोयले से गैस बनाने लगे तो हम इस क्षेत्र में आसानी से आत्मनिर्भर बन सकते हैं। बिजली के लिए कोयला जलाना प्रदूषणकारी है, लेकिन उसे गैस (सिनगैस) में बदलना एक स्वच्छ और रणनीतिक विकल्प है। बता दें कि भारत अभी कच्चे तेल के लगभग 83%, प्राकृतिक गैस के 50% और मेथनॉल एवं उर्वरकों के 90% से अधिक आयात पर निर्भर है।
आम आदमी और देश को क्या होगा फायदा होगा?
- सस्ता आयात: वर्तमान में भारत यूरिया, अमोनिया और LNG जैसे उत्पादों के लिए विदेशों पर निर्भर है (लगभग 2.77 लाख करोड़ रुपये का आयात बिल)। अब ये भारत में ही बनेंगे, जिससे विदेशी मुद्रा बचेगी।
- ऊर्जा सुरक्षा: वैश्विक युद्ध या तनाव के कारण जब गैस की कीमतें बढ़ती हैं, तो भारत पर इसका असर कम होगा।
- पर्यावरण के अनुकूल: पारंपरिक तरीके से कोयला जलाने के मुकाबले गैसीकरण प्रक्रिया कम प्रदूषणकारी है।
- किसानों को लाभ: यूरिया और खाद का उत्पादन देश में बढ़ने से किसानों को समय पर और सही दाम पर खाद मिल सकेगी।
ईंधन, रसायन, उर्वरक में होगा इस्तेमाल
कोल गैसीकरण को एक ऐसी क्रांतिकारी तकनीक है जो भारत की विदेशी निर्भरता को जड़ से खत्म कर सकती है। कोयले से बने गैस का इस्तेमाल केवल ईंधन के रूप में ही नहीं, बल्कि स्वच्छ ईंधन, कीमती रसायन, उर्वरक (खाद) और हाइड्रोजन बनाने में भी किया जा सकता है। LNG, यूरिया, अमोनियम नाइट्रेट, अमोनिया, कोकिंग कोयला, मेथनॉल, DME और अन्य प्रमुख प्रतिस्थापनीय उत्पादों के लिए भारत का आयात बिल वित्त वर्ष 2025 में लगभग 2.77 लाख करोड़ रुपये रहा। पश्चिम एशिया में चल रही भू-राजनीतिक स्थिति ने इस आर्थिक संवेदनशीलता को और भी अधिक उजागर कर दिया है।
Coal Gas Schemne.
FAQ:
1. क्या इससे बिजली बिल कम होगा?
जी हां, जब घरेलू स्तर पर गैस का उत्पादन बढ़ेगा, तो ऊर्जा की लागत कम होगी जिसका सीधा असर बिजली की कीमतों पर पड़ सकता है।
2. क्या हमारे पास पर्याप्त कोयला है?
भारत दुनिया के सबसे बड़े कोयला भंडारों में से एक है (~401 अरब टन)। यह योजना उसी भंडार का सही और आधुनिक इस्तेमाल है।
3. क्या यह तकनीक सुरक्षित है?
यह एक स्थापित तकनीक है जिसे 'सतही कोयला गैसीकरण' कहा जाता है। सरकार इसमें स्वदेशी तकनीक को बढ़ावा दे रही है।
4. क्या इससे प्रदूषण पूरी तरह खत्म हो जाएगा?
पूरी तरह नहीं, लेकिन यह कोयला जलाने की पुरानी तकनीक से कहीं ज्यादा 'क्लीन' है।
