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Iran-Israel War: रेड सी से होर्मुज स्ट्रेट मार्ग पर संकट: शिपमेंट ठप, बीमा-फ्रेट महंगा, समझें भारत पर क्या होगा असर?

Iran-Israel War News: ईरान के सुप्रीम लीडर अयातुल्ला अली खामेनेई की मौत के बाद US-इजराइल और ईरान के बीच जारी युद्ध और विकराल रूप ले सकता है। इसका असर पूरी दुनिया पर होने की आशंका है। कच्चे तेल की सप्लाई प्रभावित होने से कीमत तेजी से बढ़ेगी।

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ईरान-इजराइल जंग
Updated Mar 1, 2026, 13:15 IST

US-इजराइल हमले में ईरान के सुप्रीम लीडर अयातुल्ला अली खामेनेई की 86 साल की उम्र में रविवार (1 मार्च) को मौत हो गई। इसकी पुष्टि ईरान ने भी की है। माना जा रहा है कि खामेनेई की मौत के बाद अब ईरान, इजराइल-अमेरिका पर हमले तेज करेगा। इससे यह युद्ध और विकराल रूप ले सकता है। इस महायुद्ध के जद में पूरा मिडिल ईस्ट आ चुका है। दुनिया का प्रमुख समुद्री आयात-निर्यात मार्ग रेड सी (लाल सागर) होर्मुज स्ट्रेट भी चपेट में है। ईरान ने होर्मुज स्ट्रेट (होर्मुज जलडमरूमध्य) को बंद करने का ऐलान किया है। बता दें कि यह समुद्री मार्ग सऊदी अरब, ईरान, इराक और संयुक्त अरब अमीरात जैसे प्रमुख खाड़ी देशों को ओमान की खाड़ी और अरब सागर से जोड़ता है। वैश्विक तेल आपूर्ति का बड़ा हिस्सा इसी रास्ते से होकर गुजरता है। इसलिए इसके बंद होने का असर पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था पर पड़ सकता है। भारत भी अछूता नहीं रहेगा क्योंकि भारत भी अपनी तेल की जरूरत को पूरा करने के लिए इस मार्ग से 50% कच्चे तेल और 54% एलएनजी (LNG) का आयात करता है।

क्या है होर्मुज स्ट्रेट?

होर्मुज जलडमरूमध्य लगभग 161 किलोमीटर लंबा समुद्री जलमार्ग है। इसके सबसे संकरे हिस्से में चौड़ाई महज 33 किलोमीटर है। यही वजह है कि यह दुनिया के सबसे संवेदनशील समुद्री मार्गों में गिना जाता है। वैश्विक समुद्री तेल व्यापार का करीब 27 प्रतिशत हिस्सा इसी रास्ते से होकर गुजरता है, जबकि दुनिया के कुल तेल उत्पादन का लगभग 20.5 प्रतिशत इस मार्ग से ट्रांसपोर्ट किया जाता है। औसतन हर दिन करीब 2 करोड़ (20 मिलियन) बैरल कच्चा तेल हॉर्मुज से होकर निकलता है। इसके अलावा वैश्विक एलएनजी (तरलीकृत प्राकृतिक गैस) व्यापार का लगभग 22 प्रतिशत हिस्सा भी इसी मार्ग पर निर्भर है। सऊदी अरब, ईरान, संयुक्त अरब अमीरात (UAE), कुवैत और इराक जैसे प्रमुख तेल उत्पादक देश अपने निर्यात का बड़ा भाग इसी जलडमरूमध्य के जरिए दुनिया तक पहुंचाते हैं।

भारत क्यों टेंशन में...?

अगर ईरान, इजराइल और अमेरिका युद्ध लंबा चलता है और होर्मुज स्ट्रेट बंद हो जाता है तो भारत पर इसका सीधा असर होगा। रेड सी और बाब-अल-मंडेब स्ट्रेट (होर्मुज स्ट्रेट) भारत के व्यापार के लिए एक प्रमुख शिपिंग रास्ता है। इराक और सऊदी अरब जैसे देशों से भारत का लगभग 65 प्रतिशत कच्चा तेल का आयात स्वेज कैनाल से होकर गुजरता है। अरब सागर, लाल सागर और स्वेज कैनाल से होकर जाने वाला रास्ता अफ्रीका के केप ऑफ गुड होप रास्ते से छोटा और तेज है, जिससे यह ज्यादातर शिपिंग कंपनियों के लिए पसंदीदा ऑप्शन बन गया है। अगर यह युद्ध और बड़ा रूप लेता है तो समुद्री जहाज को स्वेज कैनाल से बचकर लंबे केप रूट से जा सकते हैं, जिससे टाइम में 14-20 दिन और बढ़ सकते हैं और माल ढुलाई और इंश्योरेंस का खर्च काफी बढ़ सकता है। 2023 के आखिर में रेड सी संकट, जो यमन के तट के पास ईरान के सपोर्ट वाले हूतियों के कार्गो जहाजों पर हमलों की वजह से शुरू हुआ था, ने ग्लोबल सप्लाई चेन में रुकावट डाली थी। स्वेज कैनाल रूट ग्लोबल कंटेनर ट्रेड का लगभग 30 प्रतिशत है। अगर जहाजों को केप ऑफ गुड होप के रास्ते अफ्रीका का चक्कर लगाने के लिए मजबूर किया जाता है, तो शिपिंग का खर्च बढ़ सकता है और कंसाइनमेंट को यूरोप और US पहुंचने में ज्यादा समय लग सकता है।

भारतीय निर्यातकों को लागत बढ़ने की चिंता

भारतीय निर्यातकों ने भाड़े बढ़ने और बढ़ती लागत को लेकर नई चिंता जताई है। PTI की रिपोर्ट के मुताबिक, इंडस्ट्री बॉडीज ने कहा कि इस इलाके में लंबे समय तक अस्थिरता रहने से जरूरी शिपिंग कॉरिडोर में रुकावट आ सकती है, मरीन इंश्योरेंस प्रीमियम बढ़ सकते हैं और ट्रांसपोर्टेशन लागत बढ़ सकती है, जिससे US और यूरोप को होने वाले शिपमेंट पर असर पड़ सकता है। फेडरेशन ऑफ इंडियन एक्सपोर्ट ऑर्गनाइजेशन्स (FIEO) ने कहा कि इस टकराव का असर ग्लोबल लॉजिस्टिक्स चैनलों पर पहले ही पड़ना शुरू हो गया है। अगर डायवर्जन लंबा चलता है, तो शिपमेंट को केप ऑफ गुड होप के रास्ते दोबारा भेजना पड़ सकता है, जिससे यूरोप और यूनाइटेड स्टेट्स के लिए ट्रांजिट टाइम में लगभग 15-20 दिन और बढ़ जाएंगे। 2024 में इजराइल-हमास युद्ध के बाद हुए टेंशन ने रेड सी रूट से शिपमेंट पर बहुत बुरा असर डाला था, जिससे जहाजों को लंबा चक्कर लगाना पड़ा था।

Hormuz Crisis

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कच्चे तेल में लग सकती है आग

भारत पहुंचने वाली लगभग आधी LNG सप्लाई भी होर्मुज रास्ते से होती है। होर्मुज स्ट्रेट को बायपास करने के कम ऑप्शन होने की वजह से, किसी भी रुकावट का ग्लोबल तेल बाज़ारों पर बड़ा असर पड़ेगा। इससे न सिर्फ ग्लोबल क्रूड की कीमतों में तेज़ी आएगी, बल्कि इम्पोर्ट में डाइवर्सिफिकेशन से माल ढुलाई और इंश्योरेंस का खर्च भी बढ़ेगा। एनालिस्ट के मुताबिक, ब्रेंट क्रूड पिछले कुछ दिनों में लगभग 65 डॉलर प्रति बैरल से बढ़कर 72-73 डॉलर हो गया है और अगर जियोपॉलिटिकल टेंशन बनी रही तो यह 95 डॉलर तक पहुंच सकता है। क्रूड की कीमतों में हर $10 प्रति बैरल की बढ़ोतरी से भारत के इम्पोर्ट बिल में हर साल $13-14 बिलियन जुड़ सकते हैं। अनुमान है कि कच्चे तेल में प्रति 1 डॉलर की बढ़ोत्तरी भारत के वार्षिक आयात बिल में $2 बिलियन (करीब ₹16,000 करोड़) का इजाफा करती है। इसका सीधा असर भारत के राजकोषीय घाटे और घरेलू पेट्रोल कीमतों पर पड़ेगा।

यूरोप और अमेरिका पर भी होगा असर

होर्मुज मार्ग का संकट केवल भारत के लिए नहीं है, यूरोप और अमेरिका समेत दुनिया भर के ऊर्जा बाजारों को इसका असर पड़ेगा। कच्चे तेल में दिक्कत और उच्च कीमतें ग्राहकों और उद्योगों के खर्च को बढ़ाएंगी। इन अर्थव्यवस्थाओं में भी मुद्रा दबाव, महंगाई और व्यापार घाटा जैसी चुनौतियों का जोखिम रहेगा।

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