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Budget Explained : सरकार कमाती कहां से है और खर्च कहां करती है? जानें हर 1 रुपये का पूरा हिसाब

Union Budget 2026-27 से पहले सबसे बड़ा सवाल यही है कि सरकार के पास पैसा आता कहां से है और वह खर्च किन मदों पर करती है। Budget सिर्फ घोषणाओं का दस्तावेज नहीं, बल्कि देश की आर्थिक दिशा और सरकार की प्राथमिकताओं का रोडमैप भी होता है। बजट में अपना फायदा नुकसान समझने के हिसाब से यह समझना बेहद जरूरी है कि सरकार के पास पैसा कहां से और कैसे आता है? इसके अलावा सरकार इस पैसे को कहां और कैसे खर्च करती है? इस एक्सप्लेनर में समझें सरकार की इनकम और खर्च का पूरा हिसाब।

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Budget Explained : सरकार कमाती कहां से है और खर्च कहां करती है? जानें हर 1 रुपये का पूरा हिसाब

Union Budget 2026-27 को लेकर देश की नजरें 1 फरवरी पर टिकी हैं। वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण रविवार को बजट पेश करेंगी। यह उनका लगातार 9वां बजट होगा और नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली NDA 3.0 सरकार का तीसरा फुल बजट। बजट से पहले 29 जनवरी को इकोनॉमिक सर्वे संसद के दोनों सदनों में पेश किया जाएगा, जिसे चीफ इकोनॉमिक एडवाइजर वी अनंत नागेश्वरन प्रस्तुत करेंगे।

हर साल बजट के दिन सबसे बड़ा सवाल यही होता है कि सरकार के पास पैसा आता कहां से है और वह खर्च किन मदों पर करती है? इसे आसान भाषा में समझें तो बजट सरकार का सालभर का “फाइनेंशियल प्लान” है, जिसमें राजस्व यानी कमाई और एक्सपेंडिचर यानी खर्च की पूरी तस्वीर सामने रखी जाती है। बजट की यह तस्वीर न केवल टैक्सपेयर्स और निवेशकों के लिए अहम होती है, बल्कि उद्योग जगत, राज्यों और आम जनता के लिए भी यह संकेत देती है कि आने वाले साल में सरकार की प्राथमिकताएं क्या रहेंगी।

कमाई का सबसे बड़ा सोर्स क्या है?

सरकार की कमाई को बजट में बजट रिसीट्स (Budget Receipts) या प्राप्तियां कहा जाता है। इसमें टैक्स से होने वाली आय के साथ-साथ नॉन-टैक्स इनकम और उधारी जैसी चीजें भी शामिल होती हैं। दिलचस्प बात यह है कि सरकार के “हर 1 रुपये” की कमाई में सबसे बड़ा हिस्सा टैक्स नहीं, बल्कि कर्ज और देनदारियों से आता है।

कहां से कितना पैसा आता है?

1. उधारी और कर्ज : सरकार की कुल आय का सबसे बड़ा हिस्सा 24% उधारी से आता है। इसका मतलब यह है कि सरकार अपने खर्च और योजनाओं को चलाने के लिए टैक्स के अलावा बाजार से कर्ज लेती है। यह हिस्सा बताता है कि सरकार की जरूरतें इतनी बड़ी हैं कि केवल टैक्स रेवेन्यू से पूरा बजट चलाना संभव नहीं होता।

2. आयकर : सरकार को इसके कुल बजट का 22% रेवेन्यू इनकम टैक्स से मिलता है। यह टैक्स सीधे सैलरीड क्लास और व्यक्तिगत आय पर आधारित होता है। बीते वर्षों में टैक्स बेस बढ़ने और डिजिटल ट्रैकिंग मजबूत होने से इनकम टैक्स कलेक्शन लगातार सरकार के लिए मजबूत स्तंभ बनता गया है।

3. GST : गुड्स एंड सर्विसेज टैक्स यानी GST से सरकार को 18% हिस्सा मिलता है। GST की खासियत यह है कि यह कंजम्पशन-बेस्ड टैक्स है, यानी जब देश में खपत बढ़ती है, तो GST कलेक्शन भी बढ़ता है। इसलिए GST को अर्थव्यवस्था की “डिमांड” का भी एक इंडिकेटर माना जाता है।

4. कॉरपोरेशन टैक्स : कॉरपोरेट टैक्स से सरकार को 17% हिस्सा मिलता है। यह कंपनियों के मुनाफे पर लगाया जाने वाला टैक्स है। कॉरपोरेट टैक्स का हिस्सा बताता है कि उद्योगों की कमाई और प्रॉफिटेबिलिटी सरकार के रेवेन्यू को कितना सपोर्ट कर रही है।

5. कस्टम्स एंड एक्सइज ड्यूटीज : कस्टम और एक्साइज ड्यूटी से सरकार को 9% हिस्सा मिलता है। इसमें इंपोर्ट पर लगने वाली ड्यूटी और कुछ खास प्रोडक्ट्स पर एक्साइज जैसे टैक्स शामिल होते हैं। वैश्विक व्यापार और कच्चे तेल जैसी कमोडिटीज के दाम भी इस हिस्से पर असर डालते हैं।

6. नॉट टैक्स रिसीट्स : नॉन-टैक्स रिसीट्स भी 9% का योगदान देती हैं। इसमें सरकारी कंपनियों से मिलने वाला डिविडेंड, फीस, चार्जेज, ब्याज, लाइसेंस फीस और अन्य रसीदें शामिल होती हैं।

7. नॉन-डेट कैपिटल रिसीट्स : सबसे कम हिस्सा 1% नॉन-डेब्ट कैपिटल रिसीट्स का है। इसमें मुख्य रूप से एसेट मोनेटाइजेशन या डिसइन्वेस्टमेंट जैसे सोर्स आते हैं, लेकिन कुल बजट के मुकाबले इनका योगदान सीमित रहता है।

Budget Income

बजट इनकम

Budget Expenditure: सरकार खर्च कहां करती है?

सरकार के खर्च को Budget Expenditure कहा जाता है। इसमें विकास योजनाएं, इंफ्रास्ट्रक्चर, डिफेंस, सब्सिडी, राज्यों को ट्रांसफर और ब्याज भुगतान जैसे बड़े मद शामिल होते हैं। “हर 1 रुपये” के खर्च में सबसे बड़ा हिस्सा राज्यों को मिलने वाले टैक्स शेयर में जाता है।

कहां पर कितना खर्च करती है सरकार?

1. टैक्स में राज्यों के हिस्से का भुगतान : सरकार के कुल खर्च का सबसे बड़ा हिस्सा 22% राज्यों को टैक्स और ड्यूटी में हिस्सेदारी के रूप में जाता है। यह हिस्सा बताता है कि केंद्र सरकार की कमाई का बड़ा भाग राज्यों के साथ शेयर किया जाता है, ताकि वे अपने स्तर पर विकास योजनाएं और प्रशासनिक जरूरतें पूरी कर सकें।

2. ब्याज भुगतान : दूसरा सबसे बड़ा खर्च 20% ब्याज भुगतान है। यानी सरकार ने जो पुराने कर्ज लिए हैं, उन पर ब्याज चुकाना बजट का बड़ा हिस्सा खा जाता है। यह एक तरह से “अनिवार्य खर्च” है, जिसे सरकार चाहकर भी कम नहीं कर सकती। यही वजह है कि ब्याज भुगतान को फिस्कल मैनेजमेंट का सबसे बड़ा चैलेंज माना जाता है।

3. केंद्रीय योजनाएं : केंद्र सरकार की योजनाओं पर 16% खर्च होता है, जिसमें डिफेंस और बड़ी सब्सिडी शामिल नहीं हैं। इसमें ऐसे प्रोग्राम आते हैं जो सीधे केंद्र सरकार के नियंत्रण में चलते हैं और जिनका लक्ष्य विकास, इंफ्रास्ट्रक्चर और वेलफेयर होता है।

4. अन्य खर्च : अन्य खर्चों में 8% हिस्सा जाता है। यह एक व्यापक कैटेगरी है, जिसमें कई तरह के प्रशासनिक और विविध मद शामिल होते हैं।

5. वित्त आयोग : फाइनेंस कमीशन से जुड़े प्रावधानों पर भी 8% खर्च होता है। यह राज्यों को संसाधन ट्रांसफर की व्यवस्था को मजबूत करता है और फेडरल फाइनेंस का अहम हिस्सा है।

6. रक्षा: रक्षा पर 8% खर्च होता है। डिफेंस बजट केवल हथियारों की खरीद तक सीमित नहीं होता, बल्कि इसमें सैन्य आधुनिकीकरण, ऑपरेशनल जरूरतें और सुरक्षा रणनीति से जुड़े खर्च शामिल रहते हैं।

7. केंद्र प्रायोजित योजनाएं : केंद्र प्रायोजित योजनाओं पर 8% खर्च होता है। ये योजनाएं केंद्र और राज्य दोनों की साझेदारी से चलती हैं और अक्सर इनका फोकस ग्रामीण विकास, स्वास्थ्य, शिक्षा और सामाजिक कल्याण पर होता है।

8. सब्सिडी खर्च : बड़ी सब्सिडी पर 6% खर्च होता है। सब्सिडी सरकार के लिए एक जरूरी सामाजिक सुरक्षा कवच है, लेकिन इसका संतुलन भी जरूरी होता है ताकि फिस्कल दबाव न बढ़े।

9. पेंशन : पेंशन पर 4% खर्च होता है। यह भी सरकार का एक फिक्स्ड खर्च है, जो कर्मचारियों और रिटायर्ड वर्कफोर्स से जुड़ा होता है।

Budget Expenditure

बजट खर्च

बजट सत्र और बाजार की बड़ी तैयारी

बजट सत्र 28 जनवरी से शुरू होगा। राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू 28 जनवरी को संसद के संयुक्त सत्र को संबोधित करेंगी। 29 जनवरी को इकोनॉमिक सर्वे पेश किया जाएगा और 1 फरवरी को आम बजट आएगा। खास बात यह है कि NSE ने ट्रेडिंग मेंबर्स को सूचित किया है कि बजट वाले दिन रविवार होने के बावजूद शेयर बाजार में रेगुलर टाइमिंग के मुताबिक ट्रेडिंग सेशन आयोजित होगा।

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