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Silver Rate Explained: कौन तय करता है चांदी का रेट, लंदन से न्यूयॉर्क तक कैसे चलता है सिल्वर का ग्लोबल खेल?

Silver Rate भारत में 2.50 लाख रुपये प्रति किलो को छू चुका है। वहीं, अंतरराष्ट्रीय बाजार में भाव 80 डॉलर प्रति आउंस से ज्यादा के ऑल टाइम हाई तक पहुंच गया है। सवाल यह नहीं है कि भाव कितना है। सवाल यह है कि आखिर, लंदन से न्यूयॉर्क और शंघाई से दिल्ली तक चांदी का भाव तय कौन करता है? क्या सरकार तय करती है, ज्वैलर्स तय करते हैं या फिर कोई इंटरनेशनल एजेंसी बैठकर रोज रेट घोषित करती है? जानें पूरी दुनिया में कैसे काम करता है सिल्वर ट्रेड?

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लंदन से दिल्ली तक कैसे तय होता है भाव। (इमेज क्रेडिट, कैन्वा)

Silver Price Mechanism: जब भारत में Silver Rate रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गया है। लगातार बढ़ते दाम के बीच सबसे पहला सवाल यही उठता है कि आखिर यह कीमत तय कौन करता है? क्या भारत सरकार चांदी का रेट तय करती है, क्या ज्वैलर्स अपनी मर्जी से दाम बढ़ा देते हैं, या फिर किसी अंतरराष्ट्रीय संस्था की ओर से रोज कीमत घोषित की जाती है? हकीकत यह है कि चांदी का रेट किसी एक देश, संस्था या व्यक्ति के हाथ में नहीं होता। यह एक पूरी तरह ग्लोबल सिस्टम है, जो 24 घंटे चलता है और दुनिया के अलग-अलग बाजारों से निकलकर एक कीमत बनाता है।

कैसे तय होता है “ग्लोबल रेट”?

सबसे पहले यह समझना जरूरी है कि चांदी का जो रेट टीवी या वेबसाइट पर दिखता है, वह असल में एक रेफरेंस प्राइस होता है। यही कीमत पूरी दुनिया में चांदी के सौदों का आधार बनती है। भारत, चीन, अमेरिका या यूरोप सहित दुनिया में हर जगह चांदी के दाम इसी इंटरनेशनल कीमत से निकलते हैं। फर्क सिर्फ टैक्स, इंपोर्ट ड्यूटी और करेंसी का होता है।

फिजिकल सिल्वर का कारोबार

पूरी दुनिया में Physical Silver का सबसे बड़ा और सबसे अहम केंद्र लंदन माना जाता है। यहां चांदी का कारोबार किसी स्टॉक एक्सचेंज पर नहीं होता, बल्कि ओवर-द-काउंटर सिस्टम के जरिए होता है। इसका मतलब है कि बड़े बैंक, बुलियन डीलर और इंडस्ट्रियल खरीदार आपस में सीधे सौदे करते हैं। लंदन के वॉल्ट्स में हजारों टन चांदी सुरक्षित रखी जाती है। यही चांदी ETF, इंडस्ट्री और बड़े निवेशकों की जरूरतें पूरी करती है। अगर लंदन में चांदी की मांग बढ़ती है या सप्लाई घटती है, तो इसका असर सीधे पूरी दुनिया में दिखता है। इसीलिए लंदन को चांदी के फिजिकल मार्केट की रीढ़ माना जाता है।

फ्यूचर्स मार्केट से आती है डिमांड

अगर लंदन फिजिकल बेस है, तो रोज कीमत ऊपर-नीचे क्यों होती है, इसका जवाब फ्यूचर्स मार्केट देता है। न्यूयॉर्क और शंघाई के फ्यूचर्स एक्सचेंज दुनिया में चांदी की कीमतों की दिशा तय करने में सबसे अहम भूमिका निभाते हैं। फ्यूचर्स कॉन्ट्रैक्ट में निवेशक भविष्य की किसी तारीख पर तय कीमत पर चांदी खरीदने या बेचने का सौदा करते हैं। यहां खास बात यह है कि ज्यादातर सौदों में असली चांदी की डिलीवरी नहीं होती। निवेशक भाव के हिसाब से पोजिशन बनाते हैं और एक्सपायरी से पहले सौदा काट लेते हैं। यही वजह है कि फ्यूचर्स मार्केट में ट्रेड होने वाली चांदी की मात्रा, असल दुनिया में मौजूद चांदी से कई गुना ज्यादा होती है। लेकिन, इसी ट्रेडिंग से बाजार को संकेत मिलता है कि आने वाले समय में मांग और सप्लाई को लेकर निवेशक क्या सोच रहे हैं।

Silver Facts

सिल्वर से जुड़े अहम तथ्य। (इमेज क्रेडिट, ओपन एआई)

ETF कैसे डालते हैं भाव पर असर

Silver ETF ने पिछले कुछ सालों में चांदी के बाजार को पूरी तरह बदल दिया है। ETF निवेशकों के पैसे से फिजिकल चांदी खरीदते हैं और उसे वॉल्ट में स्टोर करते हैं। इसके बदले निवेशकों को शेयर मिलते हैं, जिन्हें वे स्टॉक एक्सचेंज पर खरीद-बेच सकते हैं। जब बाजार में डर या अनिश्चितता बढ़ती है और निवेशक ETF में पैसा डालते हैं, तो फंड मैनेजर को बाजार से नई चांदी खरीदनी पड़ती है। इससे फिजिकल सप्लाई घटती है और कीमतों पर ऊपर की ओर दबाव बनता है। 2025 की तेजी में ETF में आया भारी निवेश चांदी की कीमतों के पीछे एक बड़ी वजह रहा है।

इंडस्ट्रियल डिमांड की क्या भूमिका

चांदी सिर्फ गहनों या निवेश तक सीमित नहीं है। इसका सबसे बड़ा इस्तेमाल इंडस्ट्री में होता है। सोलर पैनल, इलेक्ट्रिक व्हीकल, इलेक्ट्रॉनिक्स, सेमीकंडक्टर और मेडिकल डिवाइस में चांदी की जरूरत होती है। ग्रीन एनर्जी और इलेक्ट्रिक मोबिलिटी के बढ़ते दौर में Silver Industrial Demand लगातार बढ़ रही है। यह मांग फ्यूचर मार्केट की तरह अस्थिर नहीं होती है, बल्कि लंबे समय तक बनी रहती है। यही वजह है कि जब सप्लाई सीमित होती है और इंडस्ट्रियल मांग बढ़ती है, तो कीमतों में मजबूत तेजी देखने को मिलती है।

सप्लाई क्यों तुरंत नहीं बढ़ पाती

Silver Supply को समझना बेहद जरूरी है। चांदी ज्यादातर तांबा, जिंक या लेड की खदानों से साइड प्रोडक्ट के रूप में निकलती है। इसका मतलब है कि Silver Production सिर्फ इसके दाम पर निर्भर नहीं करता। अगर दूसरी धातुओं की खदानों में उत्पादन घटता है, तो चांदी की सप्लाई भी अपने आप कम हो जाती है। यही वजह है कि मांग बढ़ने के बावजूद सप्लाई जल्दी नहीं बढ़ पाती और कीमतों में तेज उछाल आता है।

डॉलर और ब्याज दरें क्या असर डालती हैं

Silver Price डॉलर में तय होती हैं। जब डॉलर कमजोर होता है, तो चांदी दूसरी करेंसी वाले निवेशकों के लिए सस्ती हो जाती है और मांग बढ़ती है। वहीं डॉलर मजबूत होने पर चांदी पर दबाव आता है। इसके अलावा ब्याज दरें भी अहम भूमिका निभाती हैं। कम ब्याज दरों के दौर में बॉन्ड जैसे निवेश कम आकर्षक लगते हैं और सोना-चांदी जैसे एसेट्स की मांग बढ़ जाती है। 2025 में ब्याज दरों में कटौती की उम्मीदों ने चांदी को मजबूती दी है।

भारत में चांदी का भाव कैसे तय होता है

India Silver Rate सीधे इंटरनेशनल कीमत से जुड़ा होता है। इसमें डॉलर-रुपया एक्सचेंज रेट, इंपोर्ट ड्यूटी और टैक्स जोड़कर घरेलू कीमत बनती है। MCX पर ट्रेड होने वाले फ्यूचर्स कॉन्ट्रैक्ट इसी ग्लोबल सिस्टम को फॉलो करते हैं, हालांकि स्थानीय मांग और सप्लाई से थोड़ा बहुत फर्क आ सकता है।

पूरी मशीनरी तय करती है भाव

इस तरह Silver Price न तो कोई सरकार तय करती है और न ही कोई एक बाजार। यह एक ऐसी ग्लोबल मशीनरी का नतीजा होता है, जिसमें लंदन की फिजिकल चांदी, न्यूयॉर्क और शंघाई की ट्रेडिंग, ETF की खरीद, इंडस्ट्रियल डिमांड, डॉलर और ब्याज दर सब मिलकर कीमत तय करते हैं।

यही वजह है कि चांदी आज सिर्फ एक धातु नहीं, बल्कि पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था और भविष्य की तकनीक से जुड़ा हुआ एसेट बन चुकी है।

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