Times Now Navbharat
live-tv
Premium

Explainer: क्या हिल रहा है डॉलर का ताज? वेनेजुएला को लेकर अमेरिकी बौखलाहट की असली वजह समझें

अमेरिका ने वेनेजुएला पर हमले के पीछे नार्को टेररिज्म को आधिकारिक कारण बताया है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने वेनेजुएला के राष्ट्रपति निकोलस मादुरो को अमेरिका के खिलाफ 'नार्को टेररिज्म कैंपेन' का 'सरगना' करार दिया और ऑपरेशन 'एब्सोल्यूट रिजॉल्व' यानी आखिरी समाधान के तहत मादुरो को उनकी पत्नी सहित अगवा कर लिया।

Image
Photo : Times Now Digital
डॉलर से दूरी पड़ी मादुरो पर भारी

Us strikes on Venezuela: अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने 2025 खत्म होने से ठीक पहले 28 दिसंबर को कहा, ''अब अमेरिका ही असली संयुक्त राष्ट्र है।" ट्रंप के इस बयान को उनकी पहचान के स्थायी तत्व 'बड़बोलेपन' से जोड़कर दुनिया ने नजरअंदाज कर दिया। लेकिन, 3 जनवरी, 2026 को अमेरिका ने कुछ ऐसा किया, जो कुछ दशक पहले वह संयुक्त राष्ट्र की ढाल के पीछे से करता, यह था वेनेजुएला के राष्ट्रपति निकोलस मादुरो को उनके महल से 'अगवा' करना।

अमेरिका ने अंतरराष्ट्रीय नियमों के परे जाकर की इस कार्रवाई को न्यायोचित ठहराते हुए आधिकारिक तौर पर कहा, ''निकोलस मादुरो अमेरिका के खिलाफ नार्को-टेररिज्म का अभियान चलाए हुए थे।'' इसके साथ ही अमेरिका के विदेश विभाग ने कहा, "वेनेजुएला की तरफ से पोषित गैंग और अवैध व हथियारबंद घुसपैठिये अमेरिका में अपराध फैला रहे थे।" वहीं, वेनेजुएला ने अमेरिका की इस कार्रवाई को अंतरराष्ट्रीय नियमों का उल्लंघन बताते हुए कहा कि उनके राष्ट्रपति को अगवा कर लिया गया है।

अमेरिका के अंदर और बाहर से दुनियाभर में इस कार्रवाई पर सवाल उठाए जा रहे हैं। इसके साथ ही यह भी कहा जा रहा है कि ड्रग्स नहीं, बल्कि डॉलर के हिलते ताज को संभालने के लिए अमेरिका ने मादुरो को निशाना बनाया है। जानें, वेनेजुएला को लेकर अमेरिकी बौखलाहट की असली वजह क्या है?

क्या है असली वजह?

अमेरिका की तरफ से आधिकारिक तौर पर ड्रग्स, गैंग और अवैध घुसपैठ की स्क्रिप्ट दुनिया को बेची, लेकिन दुनिया इसे पचा पाती उससे पहले ही अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप सामने आए और कहा, "जब तक हालात स्थिर नहीं हो जाते हैं, अमेरिका ही वेनेजुएला को चलाएगा।" इसके साथ ही ट्रंप ने वह सच भी उगल दिया, जिसे पूरी दुनिया जानना चाहती थी। ट्रंप ने कहा, "अमेरिकी कंपनियां वेनेजुएला के क्रूड रिजर्व का इस्तेमाल करेंगी और इसे दूसरे देशों को बेचा जाएगा।" जाहिर तौर पर ट्रंप का यह बयान असली वजह बता देता है। लेकिन, सब इतना सीधा, सरल और आसान नहीं है।

क्यों उठाया ऐसा कदम?

अमेरिका के पास खुद के अथाह तेल भंडार हैं। इसके अलावा पश्चिमी एशिया हो, चाहे अफ्रीका या दक्षिणी अमेरिका, दुनिया का शायद ही कोई ऐसा कोना होगा, जहां ऑयल और गैस निकलता है और किसी न किसी रूप में अमेरिकी तेल कंपनियां मौजूद नहीं हैं। इसके अलावा वेनेजुएला का क्रूड रिफाइनिंग के लिहाज से काफी भारी है, जबकि अमेरिकी शेल ऑयल की रिफाइनिंग काफी आसान है। ऐसे में यह सवाल उठता है कि आखिर अमेरिका को यह कदम क्यों उठाना पड़ा?

क्या वाकई लोकतंत्र की है लड़ाई?

क्या वाकई अमेरिका को वेनेजुएला में लोकतंत्र और मानवाधिकारों की चिंता है? अगर ऐसा है, तो वह इस मामले में सऊदी अरब के खिलाफ चुप क्यों रहता है? असल में अमेरिका पूरी कोशिश में जुटा है कि यह मामला, ड्रग्स, लोकतंत्र, चुनाव और मानवाधिकारों से जुड़ा दिखता रहे। लेकिन, जब परतें खुलती हैं, तो साफ दिखता है कि यह लड़ाई असल में ड्रग्स, लोकतंत्र या अपराध से जुड़ी नहीं है। बल्कि, तेल के जरिये डॉलर के वर्चस्व से जुड़ी है। वेनेजुएला आज उस बड़े सवाल का केंद्र बन चुका है कि क्या अमेरिकी डॉलर का सिंहासन पहले जैसा अडिग है या उसमें दरारें पड़ने लगी हैं।

हरे पत्ते में बसी अमेरिका की जान

अमेरिका की ताकत को अक्सर उसकी सेना, टेक्नोलॉजी या अर्थव्यवस्था से जोड़ा जाता है, लेकिन इन सबके पीछे जो सबसे मजबूत अदृश्य स्तंभ है, वह हरे रंग की कागज की पत्ती है, जिसे दुनिया डॉलर सिस्टम के नाम से जानती है। यही सिस्टम दशकों से अमेरिकी डॉलर को दुनिया की सबसे ताकतवर मुद्रा बनाए हुए है और इसी वजह से अमेरिका वैश्विक राजनीति में असाधारण दबदबा रखता है।

अमेरिकी राष्ट्रपति विलियम मैकिनले ने 14 मार्च, 1900 कोअमेरिका के गोल्ड स्टैंडर्ड एक्ट को मंजूरी दी। इस कानून के मुताबिक 1 अमेरिकी डॉलर की कीमत 90 फीसदी प्योर 25.8 ग्रेन गोल्ड यानी करीब 1.67 ग्राम गोल्ड तय कर दी। इसके बाद अमेरिका ने पूरी दुनिया को डॉलर के गोल्ड स्टैंडर्ड के आधार पर डॉलर में ट्रेड करने के लिए रिझाया। इस तरह अमेरिका ने दुनिया के बड़े हिस्से को बिना हथियारों के अपना बना लिया।

सता रहा फोर्ट नॉक्स का भूत ?

फोर्ट नॉक्स अमेरिकी सेना का एक बेस है, जहां अमेरिका गोल्ड, सिल्वर जैसी कीमती धातुओं का खजाना जमा करके रखता है। फोर्ट नॉक्स असल में डॉलर के गोल्ड स्टैंडर्ड से जुड़ा है। लेकिन, 1970 का दशक अमेरिका के लिए चुनौतीपूर्ण रहा। वियतनाम युद्ध और बढ़ते घाटे के चलते दुनिया के तमाम देश अमेरिका को उसका डॉलर लौटाकर गोल्ड वापस मांगने लगे। हालात यह हो गए कि फोर्ट नॉक्स का गोल्ड रिजर्व तकरीबन खाली हो गया और इसे भूतहा किला माना जाने लगा। आखिर में अमेरिकी राष्ट्रपति रिचर्ड निक्सन ने 1971 में अमेरिका ने डॉलर को गोल्ड स्टैंडर्ड से अलग कर लिया। इसकी वजह से डॉलर की साख पर सवाल खड़े होने लगे। जब डॉलर दरकने लगा, तो अमेरिका को अपने अस्तित्व पर खतरा महसूस होने लगा और फिर डॉलर को दोबारा मजबूत करने के लिए अमेरिका ने एक रणनीतिक समझौता किया।

Dollar Decline

घट रही डॉलर की साख

पेट्रो डॉलर से बचा अमेरिकी वर्चस्व

1974 में अमेरिका और सऊदी अरब के बीच ऐसा समझौता हुआ, जिसने पूरी दुनिया की दिशा बदल दी। इसके तहत सऊदी अरब ने तेल की कीमत सिर्फ अमेरिकी डॉलर में तय करने पर सहमति दी। बदले में अमेरिका ने सऊदी सुरक्षा, हथियार और राजनीतिक समर्थन की गारंटी दी। धीरे-धीरे यही मॉडल पूरे OPEC देशों में फैल गया और यहीं से पेट्रो डॉलर सिस्टम की नींव पड़ी।

वेनेजुएला क्यों बना निशाना?

वेनेजुएला के पास दुनिया का सबसे बड़ा सिद्ध तेल भंडार है, लेकिन मौजूदा समय में अमेरिका अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए उस पर निर्भर नहीं है। अमेरिकी रिफाइनरियों ने वैकल्पिक सप्लाई चेन विकसित कर ली है। इसके बावजूद वाशिंगटन की सख्ती बताती है कि मसला कच्चे तेल की सप्लाई से कहीं आगे निकल चुका है। अगर तेल ही वजह होता, तो रणनीति में इतना राजनीतिक और वित्तीय दबाव नहीं दिखता।

डॉलर सिस्टम से टकराव

अमेरिकी प्रतिबंधों ने वेनेजुएला को डॉलर आधारित सिस्टम से लगभग बाहर कर दिया। इसी मजबूरी ने कराकस को वैकल्पिक रास्ते तलाशने पर मजबूर किया। चीन और रूस के साथ गैर-डॉलर ट्रेड, वैकल्पिक भुगतान चैनल और पश्चिमी बैंकिंग सिस्टम से दूरी ये सभी कदम वेनेजुएला को अमेरिका की नजर में खतरनाक बनाते चले गए। समस्या यह नहीं कि वेनेजुएला क्या कर रहा है, बल्कि यह है कि अगर वह बच गया, तो दूसरों के लिए रास्ता खुल सकता है।

चीन और रूस का बढ़ता असर

अमेरिका की चिंता यहीं से गहराती है। चीन युआन में अंतरराष्ट्रीय ट्रेड को बढ़ावा दे रहा है, रूस पहले ही डॉलर निर्भरता कम कर चुका है और BRICS देश वैकल्पिक भुगतान तंत्र पर काम कर रहे हैं। वेनेजुएला इन सभी प्रयासों का एक साझा बिंदु बनता जा रहा है। वाशिंगटन को डर है कि अगर ऐसे मॉडल सफल हुए, तो डॉलर आधारित वैश्विक व्यवस्था को सीधी चुनौती मिलेगी।

प्रतिबंध केवल राजनीति नहीं

अमेरिकी प्रतिबंध सिर्फ किसी सरकार को दंडित करने का जरिया नहीं होते। वे असल में यह संदेश होते हैं कि डॉलर सिस्टम से बाहर जाने की कीमत चुकानी पड़ेगी। जब कोई देश प्रतिबंधों के बावजूद टिकता है, तो यह पूरे तंत्र की विश्वसनीयता पर सवाल खड़ा करता है। वेनेजुएला का मामला इसी वजह से अमेरिका के लिए सिस्टम रिस्क बन गया है।

लैटिन अमेरिका क्यों है टेस्टिंग ग्राउंड

लैटिन अमेरिका ऐतिहासिक रूप से अमेरिका का प्रभाव क्षेत्र रहा है। अगर इसी इलाके में कोई देश डॉलर के दबाव को झेलते हुए टिक जाता है, तो यह अमेरिकी वर्चस्व के लिए खतरनाक संकेत होगा। वेनेजुएला इसलिए सिर्फ एक देश नहीं, बल्कि पूरे क्षेत्र के लिए डोमिनो इफेक्ट का ट्रिगर बन सकता है।

क्या सच में डॉलर का सिंहासन हिल रहा है

फिलहाल डॉलर दुनिया की सबसे मजबूत रिजर्व करेंसी बना हुआ है। लेकिन उसकी निर्विवाद स्थिति अब पहले जैसी नहीं रही। हर नया गैर-डॉलर सौदा, हर वैकल्पिक भुगतान प्रणाली, और हर प्रतिबंध-विरोधी मॉडल उस सिंहासन में एक छोटी दरार जोड़ देता है। अमेरिका इसी शुरुआती चरण को रोकना चाहता है, ताकि चुनौती बड़ी न बन पाए। वेनेजुएला को लेकर अमेरिकी बौखलाहट का कारण ड्रग्स या तेल नहीं है। यह लड़ाई डॉलर के प्रभुत्व को बचाने की है। वेनेजुएला आज एक चेतावनी है कि अगर डॉलर सिस्टम को चुनौती देने वाले प्रयोग सफल हुए, तो वैश्विक शक्ति संतुलन बदल सकता है। यही वजह है कि अमेरिका इस मोर्चे पर कोई ढील देने के मूड में नहीं दिखता।

देश और दुनिया की ताजा ख़बरें (Hindi News) पढ़ें हिंदी में और देखें छोटी बड़ी सभी न्यूज़ Times Now Navbharat Live TV पर। बिज़नेस (Business News) अपडेट और आज का सोने का भाव (Gold Rate Today), आज की चांदी का रेट (Silver Rate Today) की ताजा समाचार के लिए जुड़े रहे Times Now Navbharat से।

End of Article