प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जब से दिल्ली की सत्ता संभाली है, तब से देश में 'लोकल फॉर वोकल' और 'स्वदेशी उत्पादों' को बढ़ावा देने पर सरकार का जोर है। सरकार लगातार देसी कंपनियों को प्रेरित कर रही है कि वे 'मेक इन इंडिया' के तहत बेहतरीन प्रोडक्ट्स बनाएं और उन्हें देश से लेकर विदेशी बाजारों तक पहुंचाएं। इसके लिए सरकार PLI स्कीम के तहत आर्थिक मदद दे रही है।
लेकिन क्या आप जानते हैं कि करीब 100 साल पहले, मेक इन इंडिया का दांव खेलकर एक विदेशी कंपनी ने बाजार पर राज किया था? आपको जानकर शायद आश्चर्य होगा कि जब महात्मा गांधी अंग्रेजों के खिलाफ आजादी के लिए 'स्वदेशी आंदोलन' चला रहे थे, ठीक उसी समय एक स्वीडन की कंपनी ने भारत में माचिस की डिब्बी पर गांधी की तस्वीर और भारत माता की छवि लगाकर बंपर कमाई की थी। कंपनी का नाम था विमको (WIMCO) था, जो माचिस बनाती थी। आइए इतिहास के पन्ने से इस दिलचस्प कहानी से आपको रूबरू कराते हैं।
'मेक इन इंडिया' का दांव बना गेम चेंजर
हम आज बात कर रहे हैं स्वीडन की माचिस बनाने वाली कंपनी विमको की। आजादी के आंदोलन से जब 1920 से 1930 तक महात्मा गांधी ने 'स्वदेशी आंदोलन' और 'असहयोग आंदोलन' का बिगुल फूंक दिया था। विदेशी सामानों का बहिष्कार करना हर भारतीय का नैतिक कर्तव्य बन चुका था। स्वदेशी सिर्फ एक शब्द नहीं, बल्कि एक मौन युद्ध बन गया था। यह वह दौर था जब भारत में ब्रिटिश सरकार की टैरिफ पॉलिसी (टैक्स नियमों) और स्वदेशी आंदोलन के चलते विदेशी सामानों के आयात पर दबाव बढ़ने लगा था, जिससे बाहर से माचिस लाकर बेचना अब आसान नहीं रह गया था। तब स्वीडिश कंपनी STAB ने एक बड़ा गेम चेंजर कदम उठाया। कंपनी ने स्वीडन से माचिस निर्यात करने के बजाय सीधे भारत की धरती पर ही माचिस का उत्पादन शुरू कर दिया।
भारत में सफल होने के लिए विमको ने स्थानीय सामाजिक और आर्थिक ढांचे में खुद को पूरी तरह ढाल लिया था। उदाहरण के लिए, 1929 में मद्रास की फैक्ट्री में काम करने वाले 805 कर्मचारियों में से केवल 10 यूरोपीय थे, बाकी सब भारतीय थे। कंपनी ने अपनी फैक्ट्रियों के आसपास मजदूरों के लिए बाकायदा कॉलोनियां बसाईं, जहां उनके रहने के लिए घर, राशन की दुकानें, डॉक्टरों की व्यवस्था और बच्चों के लिए स्कूल खोले गए।
भारत माता की छवि ने बदली तस्वीर
इस पूरी कहानी का सबसे दिलचस्प और हैरान करने वाला पहलू था विमको की मार्केटिंग रणनीति। यह वह दौर था जब महात्मा गांधी का स्वदेशी आंदोलन अपने चरम पर था और देशवासी विदेशी सामानों का पूरी तरह बहिष्कार कर रहे थे। विमको अच्छी तरह जानती थी कि अगर भारतीय उपभोक्ताओं को यह भनक भी लग गई कि विमको एक विदेशी (स्वीडिश) कंपनी है, तो उसका पूरा बिजनेस ठप हो जाएगा। इस खतरे से निपटने के लिए कंपनी ने भारतीयों के राष्ट्रवाद और जज्बातों को ही अपना सबसे बड़ा हथियार बना लिया। उन्होंने माचिस की डिब्बियों पर ऐसी तस्वीरें छापना शुरू किया जो सीधे भारतीय नागरिकों के दिलों को छूती थीं। कंपनी ने माचिक की डिब्बी पर गांधी की तस्वीर, भारत माता की छवि या 'वंदे मातरम' लगाकर, भारतीय लोगों की सोच बदल दी। वह इसमें जबरदस्त सफल हुई।
स्वदेशी आंदोलन का इतिहास (AI image)
अपनी रणनीति से WIMCO ने किया एकछत्र राज
विमको ने अपनी मार्केटिंग स्ट्रैटजी से न सिर्फ भारत बल्कि दुनिया के कई देशों पर राज किया। 1917 में शुरू हुई इस कंपनी ने 1930 तक आते-आते दुनिया के 33 देशों में माचिस फैक्ट्रियों की मालिक बन बैठी और ग्लोबल माचिस उत्पादन के करीब 60 फीसदी हिस्से पर इसका सीधा नियंत्रण हो गया। इस माचिस कंपनी को बुलंदियों पर पहुंचाने में भारत की भूमिका सबसे अहम थी। प्रथम विश्व युद्ध से पहले तक माचिस बाजार में स्वीडिश और जापानी निर्माता अलग-अलग देशों के बाजारों में व्यापार करते थे। लेकिन भारत वह मुख्य बाजार बना, जहां इन दोनों वैश्विक दिग्गजों के बीच सीधी और कांटे की टक्कर हुई। इस लड़ाई में विमको की जीत हुई। कंपनी ने भारतीय बाजार के एक बहुत बड़े हिस्से पर अपना कब्जा जमा लिया।
विमको और भारत माता की तस्वीर का यह इतिहास हमें मार्केटिंग और राजनीति के अंतर्संबंधों का एक अनूठा पाठ पढ़ाता है। यह दिखाता है कि कंपनियां किस तरह आम लोगों की जनभावनाओं, संस्कृति और राजनीतिक माहौल को भांपकर खुद को उसके सांचे में ढाल लेती हैं।
