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Explainer: कैसे काम करता है IPO GMP, क्या ग्रे मार्केट प्रीमियम के पीछे है कोई सीक्रेट फॉर्मूला?

शेयर बाजार में भले ही ग्रे मार्केट प्रीमियम (GMP) का कोई आधिकारिक दर्जा नहीं है। लेकिन IPO में पैसा लगाने वाले ज्यादातर निवेशक इसे नजरअंदाज नहीं करते। सवाल यही है कि IPO GMP आखिर काम कैसे करता है। क्या इसके पीछे कोई तय फॉर्मूला होता है या यह सिर्फ निवेशकों और बाजार के सेंटिमेंट के बीच अटकलबाजी का कोई खेल है?

GMP

आईपीओ जीएमपी (फोटो क्रेडिट, कैन्वा/ओपन एआई)

IPO यानी Initial Public Offering शेयर बाजार की दुनिया में यह वह मौका होता है, जब कोई प्राइवेट कंपनी पहली बार आम निवेशकों के लिए अपने शेयर बेचती है। इसे आम भाषा में कंपनी का प्राइवेट से पब्लिक होना कहा जाता है। IPO निवेशकों के लिए कम समय में लिस्टिंग गेन कमाई का एक बड़ा जरिया माना जाता है। इसी उम्मीद के बीच एक शब्द तेजी से चर्चा में आता है, IPO GMP यानी ग्रे मार्केट प्रीमियम। शेयर बाजार में भले ही GMP का आधिकारिक तौर पर कोई दर्जा नहीं है।लेकिन IPO में पैसा लगाने वाले ज्यादातर निवेशक इसे नजरअंदाज नहीं करते। सवाल यही है कि IPO GMP आखिर काम कैसे करता है। क्या इसके पीछे कोई तय फॉर्मूला होता है या यह सिर्फ अटकलबाजी का खेल है।

IPO Grey Market क्या होता है?

IPO Grey Market एक अनऑफिशियल यानी बाजार है। यह शेयर बाजार से बाहर काम करता है। इसके लिए न किसी एक्सचेंज की जरूरत होती है और न सेबी की मंजूरी की दरकार पड़ती है। इस बाजार में IPO के शेयर या IPO एप्लिकेशन की खरीद-बिक्री लिस्टिंग से पहले ही शुरू हो जाती है। Grey Market में होने वाले सौदे पूरी तरह आपसी भरोसे पर आधारित होते है। यहां कोई कानूनी सुरक्षा नहीं होती। इसके बावजूद हर बड़े IPO के समय Grey Market एक्टिव हो जाता है और यहीं से Grey Market Premium यानी GMP निकलकर सामने आता है।

IPO GMP क्या होता है?

GMP का मतलब उस अतिरिक्त रकम से है, जो कोई निवेशक IPO के इश्यू प्राइस के ऊपर देने को तैयार होता है। मान लीजिए किसी IPO का इश्यू प्राइस ₹100 है और Grey Market में उसका GMP ₹40 चल रहा है। इसका सीधा मतलब यह है कि बाजार के कुछ निवेशक मान रहे है कि शेयर की लिस्टिंग करीब ₹140 के आसपास हो सकती है। इसके साथ ही यह इस बात का संकेत भी होता है कि निवेशक इस शेयर को 140 रुपये तक के भाव पर खरीदने को तैयार हैं। यही वजह है कि GMP को लिस्टिंग प्राइस का एक अनऑफिशियल संकेतक माना जाता है। हालांकि यह न तो कोई गारंटी है और न ही इसका सही होना जरूरी है।

ग्रे मार्केट में शेयरों की खरीद-बिक्री कैसे होती है?

Grey Market में IPO से जुड़े सौदे मुख्य रूप से दो तरह से होते है। पहला, एप्लिकेशन सेल यानी प्री-अलॉटमेंट डील, इसमें निवेशक अपना IPO एप्लिकेशन अलॉटमेंट से पहले ही बेच देता है। इसके लिए खरीदार एक तय प्रीमियम देता है और यह दांव लगाता है कि उस एप्लिकेशन में शेयर अलॉट हो जाएंगे। अगर अलॉटमेंट नहीं होता है, तो सौदा रद्द हो जाता है या शर्तों के हिसाब से सेटलमेंट हो जाता है। इसके अलावा, दूसरा तरीका शेयर सेल यानी पोस्ट-अलॉटमेंट, लेकिन प्री-लिस्टिंग डील का है। इसमें निवेशक को IPO के शेयर अलॉट हो चुके होते है। लिस्टिंग से पहले ही वह इन्हें Grey Market में तय प्रीमियम पर बेच देता है। असल में शेयर ट्रांसफर लिस्टिंग के बाद होता है, लेकिन डील पहले ही फिक्स कर ली जाती है। इन दोनों ही मामलों में बिचौलिये यानी अनऑफिशियल ब्रोकर्स की अहम भूमिका होती है। वही खरीदार और विक्रेता को मिलाते है और बदले में कमीशन लेते है।

IPO GMP किन फैक्टर्स से तय होता है?

IPO GMP का पूरा खेल डिमांड और सप्लाई पर टिका होता है। इसके पीछे कई फैक्टर्स काम करते हैं। सबसे बड़ा फैक्टर होता है IPO के सब्सक्रिप्शन की स्थिति।अगर IPO को रिटेल, HNI और QIB कैटेगरी में जबरदस्त रिस्पॉन्स मिलता है, तो Grey Market में डिमांड बढ़ जाती है और GMP ऊपर चला जाता है। दूसरा अहम फैक्टर है मार्केट सेंटिमेंट। अगर बाजार में तेजी का माहौल है, तो निवेशक ज्यादा रिस्क लेने को तैयार होते है और GMP ऊंचा रहता है।

वहीं, कमजोर बाजार या करेक्शन के दौर में GMP दबाव में आ जाता है। इसके अलावा तीसरा फैक्टर कंपनी की फंडामेंटल क्वालिटी और वैल्यूएशन है। अगर कंपनी का बिजनेस मॉडल मजबूत है, ग्रोथ विजिबिलिटी साफ है और वैल्यूएशन वाजिब लग रहा है, तो GMP सपोर्ट पाता है। इसके अलावा न्यूज फ्लो भी बड़ा रोल निभाता है।कई बार IPO को अच्छी सब्सक्रिप्शन मिलने के बावजूद GMP कम रहता है, क्योंकि कंपनी से जुड़ी कोई निगेटिव खबर या सेक्टर को लेकर चिंता बाजार में बनी रहती है।

क्या IPO GMP निकालने का कोई फॉर्मूला है?

इस सवाल का सीधा और साफ जवाब है, नहीं। IPO GMP के लिए कोई तय फॉर्मूला, गणितीय मॉडल या आधिकारिक तरीका नहीं है। यह पूरी तरह से मार्केट एक्सपेक्टेशन और आपसी सौदेबाजी से निकलता है। Grey Market में खरीदार और विक्रेता अपने सेंटिमेंट के हिसाब से दाम तय करते है। कोई मानता है कि लिस्टिंग जबरदस्त होगी, तो वह ज्यादा प्रीमियम देने को तैयार होता है। कोई रिस्क देखता है, तो कम दाम पर ही सौदा करता है। यही वजह है कि GMP रोज बदलता रहता है और कई बार लिस्टिंग के बिल्कुल पास आकर तेजी से गिर भी जाता है।

IPO Tracker

2025 में आए आईपीओ का हाल (इमेज क्रेडिट ओपन एआई/ डाटा NSE)

फिर निवेशक GMP को क्यों देखते है?

भले ही GMP अनऑफिशियल हो, लेकिन निवेशक इसे पूरी तरह नजरअंदाज भी नहीं करते। GMP से उन्हें यह समझने में मदद मिलती है कि बाजार IPO को लेकर क्या सोच रहा है। यह एक तरह का सेंटिमेंट इंडिकेटर है। लेकिन समझदारी इसी में है कि GMP को सिर्फ एक संकेत माना जाए, फैसला करने का अकेला आधार नहीं।

कई ऐसे IPO रहे हैं, जिनका GMP बहुत ऊंचा था, लेकिन लिस्टिंग फीकी रही। वहीं कई IPO कम या जीरो GMP के बावजूद लंबे समय में मल्टीबैगर साबित हुए हैं।

GMP नहीं IPO को समझने पर दें जोर

IPO वह प्रक्रिया है, जिसके जरिए कोई प्राइवेट कंपनी पहली बार आम निवेशकों से पैसा जुटाती है। इसके बदले कंपनी अपनी हिस्सेदारी शेयर के रूप में बेचती है।

IPO से कंपनी को ग्रोथ के लिए कैपिटल मिलता है, कर्ज चुकाने का मौका मिलता है और शुरुआती निवेशकों को एग्जिट का रास्ता खुलता है। IPO की प्रक्रिया में इन्वेस्टमेंट बैंक, रेगुलेटरी फाइलिंग, प्रॉस्पेक्टस, रोड शो, प्राइस बैंड, बिडिंग और अलॉटमेंट जैसे कई चरण होते है। इसी पूरी प्रक्रिया के दौरान Grey Market एक्टिव हो जाता है और निवेशक GMP के जरिए लिस्टिंग को लेकर अंदाजा लगाने लगते है। इस तरह IPO GMP कोई साइंस नहीं, बल्कि पूरी तरह उम्मीदों का खेल है।

इसके पीछे न तो कोई फॉर्मूला है और न ही कोई रेगुलेटरी सपोर्ट। समझदार निवेशक वही है, जो GMP को सिर्फ एक संकेत माने और IPO में निवेश का फैसला कंपनी की फंडामेंटल ताकत, वैल्यूएशन और अपने रिस्क प्रोफाइल के आधार पर करे। IPO में कमाई का मौका जरूर होता है, लेकिन आंख बंद कर GMP के भरोसे पैसा लगाना हमेशा सही रणनीति नहीं होती।

डिस्क्लेमर: TimesNow Hindi किसी स्टॉक, म्यूचुअल फंड, आईपीओ में निवेश की सलाह नहीं देता है। यहां पर केवल जानकारी दी गई है। निवेश से पहले अपने वित्तीय सलाहकार की राय जरूर लें।

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यतींद्र लवानिया
यतींद्र लवानिया author

प्रिंट और डिजिटल मीडिया में बिजनेस एवं इकोनॉमी कैटेगरी में 10 वर्षों से अधिक का अनुभव। पिछले 7 वर्षों से शेयर बाजार, कॉरपोरेट सेक्टर और आर्थिक नीतियों... और देखें

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