Iran War and Impact of fertiliser Price: ईरान और अमेरिका के बीच तनाव एक बार फिर चरम पर पहुंच गया है। ईरान ने पाकिस्तान में होने वाली वार्ता में शामिल होने से इनकार कर दिया है। वहीं अमेरिका ने ईरान के एक जहाज को अपने कब्जे में ले लिया है। ऐसे हालात में आने वाले दिनों में टकराव और बढ़कर गंभीर रूप ले सकता है। ईरान ने पहले ही होर्मूज जलडमरूमध्य को बंद करने का ऐलान कर चुका है। इस रूट के बाधित होने से भारत को तेल और गैस की सप्लाई में दिक्कतें झेलनी पड़ रही हैं। लेकिन असर यहीं तक सीमित नहीं है।
कतर और सऊदी अरब से भारत आने वाली अमोनिया की सप्लाई बुरी तरह प्रभावित हुई है, जो यूरिया उत्पादन के लिए बेहद जरूरी कच्चा माल है। दूसरी ओर, अंतरराष्ट्रीय बाजार में खाद की कीमतें पिछले दो महीनों में लगभग दोगुनी हो चुकी हैं। ऐसे में सवाल यह है कि इस संकट का भारत की खेती और अर्थव्यवस्था पर क्या असर पड़ेगा? खासतौर पर जून से शुरू होने वाले खरीफ सीजन के लिए पर्याप्त खाद की उपलब्धता और खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करना देश के लिए बड़ी चुनौती बन सकता है।
दोगुनी कीमत पर हो रही खरीदारी
इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक, ईरान युद्ध के चलते भारत को अब विदेशों से खाद लगभग दोगुनी कीमत पर खरीदनी पड़ रही है। 4 अप्रैल को इंडियन पोटाश लिमिटेड (IPL) ने 2.5 मिलियन टन यूरिया (urea prices India) आयात के लिए टेंडर जारी किया, जो 15 अप्रैल को खुला। इसमें 5.9 मिलियन टन से अधिक के ऑफर मिले। सबसे कम बोली पश्चिमी तट के लिए 935 डॉलर प्रति टन और पूर्वी तट के लिए 959 डॉलर प्रति टन रही।
अगर इसे 18 फरवरी को राष्ट्रीय केमिकल्स एंड फर्टिलाइजर्स (RCF) के टेंडर से तुलना करें, तो उस समय कीमतें काफी कम थीं। तब करीब 3.1 मिलियन टन के लिए बोलियां आई थीं और 1.3 मिलियन टन तक की सप्लाई 508 से 512 डॉलर प्रति टन के भाव पर तय हुई थी। यानी महज दो महीनों में कीमतें लगभग दोगुनी हो गई हैं। इसकी बड़ी वजह अमेरिका-इजरायल बनाम ईरान संघर्ष और 28 फरवरी से अहम समुद्री मार्ग स्ट्रेट ऑफ होर्मुज के बंद होने से सप्लाई में आई बाधाएं हैं।
यह असर सिर्फ यूरिया तक सीमित नहीं है। गुजरात स्टेट फर्टिलाइजर्स एंड केमिकल्स द्वारा हाल में आयात किए गए DAP की कीमत (DAP prices India) करीब 865 डॉलर प्रति टन पहुंच गई है, जो युद्ध से पहले 720 डॉलर और पिछले साल इसी समय 680 डॉलर थी। अभी इसकी अनुमानित कीमत 925 डॉलर प्रति टन तक पहुंचने की आशंका है।
फर्टिलाइजर प्रोडक्ट भी महंगे हुए
यही बात उन प्रोडक्ट पर भी लागू है जिनका इस्तेमाल फर्टिलाइजर बनाने में होता है। ईरान युद्ध से पहले भारत में आयात होने वाले सल्फर की कीमतें 550 डॉलर प्रति टन थीं, और अप्रैल 2025 में तो ये और भी कम होकर 300 डॉलर हो गई थीं। आज, यह 900 डॉलर प्रति टन से कम कीमत पर उपलब्ध नहीं है। इसी तरह, अमोनिया की कीमत भी 850-900 डॉलर प्रति टन है, जो एक साल पहले के औसत 435 डॉलर से काफी ज्यादा है।
खाड़ी देशों पर थी निर्भरता
भारत हर साल 39-40 मिलियन टन यूरिया की खपत करता है, जिसमें से 30-31 mt का उत्पादन देश में ही होता है और बाकी 9-10 mt आयात किया जाता है। खाड़ी सहयोग परिषद (Gulf Cooperation Council) के देश ओमान, कतर, सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात (UAE) और बहरीन युद्ध से पहले भारत के यूरिया आयात का लगभग 40% हिस्सा थे। यूरिया के देश में ही उत्पादन के लिए इस्तेमाल होने वाले कच्चे माल लिक्विफाइड नेचुरल गैस (LNG) — के आयात का 60% से ज्यादा हिस्सा कतर, UAE और ओमान से आता था।
भार में आम तौर पर हर महीने लगभग 2.5 mt यूरिया बनता है। ईरान युद्ध के चलते मार्च में, LNG सप्लाई बाधित होने से 1.5 mt ही यूरिया बन पाया। बना पाए। इस महीने भी, यह 1.7-1.8 mt ही रहेगा।
Iran war effect
भारत इस चुनौती से कैसे पार पाएगा?
ईरान के हमलों के बाद QatarEnergy और सऊदी अरब की Maaden की अमोनिया फैसिलिटीज बंद हो गई हैं, जिसकी वजह से भारत को इंडोनेशिया और मलेशिया से सप्लाई लेनी पड़ रही है। इससे लागत बढ़ी है लेकिन सप्लाई आ रही है। इससे भारत को अपनी जरूरत पूरा करने में मदद मिलेगी। इसके अलावा बायोस्टिमुलेंट्स एक बड़ा समाधान बनकर उभरा है। बायोस्टिमुलेंट्स (Biostimulants) ऐसे उत्पाद होते हैं जो सीधे खाद (fertiliser) की तरह पोषक तत्व नहीं देते, बल्कि पौधों की ग्रोथ और पोषक तत्वों के उपयोग को बेहतर बनाते हैं। अगर किसान बायोस्टिमुलेंट्स का उपयोग करते हैं, तो वे 20-25% कम रासायनिक खाद में भी उतनी ही या उससे ज्यादा पैदावार ले सकते हैं।
इसके अलावा यूरिया (जिसमें 46% नाइट्रोजन होता है) को लेकर उत्तर प्रदेश के एक प्रमुख निर्माता ने सुझाव दिया है कि सरकार कंपनियों को उर्वरकों पर सूक्ष्म पोषक तत्वों जैसे जिंक, लोहा, तांबा, बोरॉन, मैंगनीज और मोलिब्डेनम की कोटिंग करने की अनुमति दे। साथ ही, इन ‘फोर्टिफाइड’ उर्वरकों को अधिकतम खुदरा मूल्य (MRP) नियंत्रण से बाहर रखा जाए। उनका कहना है कि अगर यूरिया या DAP पर सूक्ष्म और द्वितीयक पोषक तत्व (सल्फर, कैल्शियम, मैग्नीशियम) की कोटिंग की जाए, तो इससे फसल की पैदावार बढ़ सकती है। ऐसे में किसान थोड़ी ज्यादा कीमत देने को भी तैयार होंगे। अभी कई किसान अलग से जिंक सल्फेट खरीदकर इस्तेमाल करते हैं, लेकिन कोटेड उर्वरक मिलने पर यह खर्च बच सकता है।
