मखाना उत्पादन
बिहार चुनाव के बीच सुपरफूड मखाना चर्चा में है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने बिहार के मखाना उद्योग को वैश्विक पटल पर लाने और किसानों की आय बढ़ाने का मखाना बोर्ड समेत कई ऐलान किए हैं। अब सवाल उठता है कि क्या बिहार का व्हाइट गोल्ड 'मखाना', राज्य के विकास और आर्थिक समृद्धि का रास्ता बन सकता है? कृषि विशेषज्ञों का कहना है कि यह आसानी से संभव है। हालांकि, इसके लिए सरकारी योजनाओं का सही तरीके से कार्यान्वयन और किसानों की भागीदारी सुनिश्चित करना जरूरी है। अगर ऐसा किया गया तो मखाना न केवल बिहार की पहचान बनेगा, बल्कि राज्य की आर्थिक समृद्धि में भी बड़ा योगदान देगा। बिहार के तरक्की के लिए अब समय आ गया है जब मखाना को एक वैश्विक ब्रांड के रूप में स्थापित किया जाए, जिससे बिहार की अर्थव्यवस्था को नई दिशा मिले।
बिहार राज्य भारत के मखाना उत्पादन में लगभग 90% योगदान देता है। भारत में उगाया जाने वाला अधिकांश मखाना बिहार से आता है, जहां उत्पादन उत्तरी और पूर्वी बिहार के नौ जिलों - दरभंगा, मधुबनी, पूर्णिया, कटिहार, सहरसा, सुपौल, अररिया, किशनगंज और सीतामढ़ी में केंद्रित है, जो तथाकथित मिथिलांचल क्षेत्र में आते हैं। इनमें से, पहले चार जिले बिहार के मखाना उत्पादन में 80% योगदान देते हैं। भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद के 2020 के एक शोधपत्र में कहा गया है, बिहार में लगभग 15,000 हेक्टेयर में मखाना उगाया जाता है, जिससे लगभग 10,000 टन पॉप्ड मखाना का उत्पादन होता है।
मखाना, कांटेदार जल लिली या गोरगन पौधे (यूरियाल फेरॉक्स) का सूखा हुआ खाद्य बीज है, जो दक्षिण और पूर्वी एशिया के मीठे पानी के तालाबों में उगने वाली एक प्रजाति है। यह पौधा अपने बैंगनी और सफेद फूलों और विशाल, गोल और कांटेदार पत्तियों के लिए जाना जाता है- जो अक्सर एक मीटर से भी ज़्यादा चौड़ी होती हैं। मखाना सदियों से, अक्सर पूजा—पाठ में खाया जाता रहा है, लेकिन हाल ही में इसके पोषण संबंधी लाभों के कारण इसे "सुपरफूड" के रूप में लोकप्रियता मिली है। विशेषज्ञों का कहना है कि मखाना पोषक तत्वों से भरपूर और कम वसा वाला होता है, जो इसे एक आदर्श "हेल्दी ब्रेकफॉस्ट" बनाता है।
बाजार अनुसंधान फर्म स्फेरिकल इनसाइट्स के अनुसार, वैश्विक मखाना बाजार का मूल्य 2023 में 43.56 मिलियन डॉलर था और 2033 तक इसके 100 मिलियन डॉलर के आंकड़े को छूने की उम्मीद है। यह बिहार जैसे राज्य के लिए बड़ा अवसर है। मखान उत्पादन को बढ़ाकर और उसे सही तरीके से प्रोसेसिंग कर बिहार वैश्विक मार्केट पर कब्जा कर सकता है। इससे राज्य की आय में बड़ी बढ़ोतरी हो सकती है, जिससे किसानों को रोजगार मिलेगा और आर्थिक खुशहाली आएगी।
आपको जानकर आश्चर्य होगा कि बिहार मखाना का सबसे बड़ा उत्पादक राज्य है लेकिन निर्यातक नहीं है। दरअसल, भारत में सबसे बड़े मखाना निर्यातक पंजाब और असम हैं। असम तो अपना मखाना उगाता भी नहीं है। इससे अंदाजा लगाया जा सकता है कि बिहार का मखाना उद्योग अभी किस हालात में है।
बिहार के किसान अपने सभी मखाने कच्चे माल के रूप में राज्य के बाहर स्थित खाद्य प्रसंस्करण इकाइयों (एफपीयू) को सस्ते दामों पर बेचने को अभी मजबूर हैं। बिहार का बाजार अच्छी तरह से विकसित और संगठित नहीं है, इसलिए बिचौलियों की एक लंबी श्रृंखला है, जिसके कारण मखाने की खेती करने वाले किसानों को बाजार में मखाने की तुलना में बहुत कम दाम मिलते हैं। इस प्रकार, न तो किसान, और न ही राज्य - राजस्व के मामले में - वह कमा पाते हैं जो वे वास्तव में कमा सकते हैं।
मखाना के बेहतर बीज अपनाने के लिए किसानों में और अधिक जागरूकता पैदा करने की जरूरत है। इसी दिशा में 100 करोड़ रुपये के शुरुआती बजट के साथ नए मखाना बोर्ड की भूमिका आती है। केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने फरवरी में अपने बजट भाषण में कहा था कि मखाना बोर्ड का उद्देश्य "मखाना के उत्पादन, प्रसंस्करण, मूल्य संवर्धन और विपणन में सुधार" करना है। उन्होंने आगे कहा था, "बोर्ड मखाना किसानों को सहायता और प्रशिक्षण सहायता प्रदान करेगा, और यह सुनिश्चित करने के लिए भी काम करेगा कि उन्हें सभी संबंधित सरकारी योजनाओं का लाभ मिले।" इसके अलावा बिहार कृषि विश्वविद्यालय, सबौर ने पूर्णिया में 'ऑर्गेनिक मखाना कल्टीवेशन प्रोग्राम' की शुरुआत की है, जिसका उद्देश्य जैविक खेती को बढ़ावा देना और उत्पादकता में वृद्धि करना है।
मखाना उद्योग में कई अवसर हैं, लेकिन कुछ चुनौतियां भी कम नहीं है। मखाना के प्रोसेसिंग में माडर्न टेक्नोलॉजी की कमी के कारण गुणवत्ता में भिन्नता और उत्पादन में कमी हो रही है। मखाना का मार्केटिंग असंगठित होने के कारण किसानों को उचित मूल्य नहीं मिल पा रहा है। इन चुनौतियों से निपटने के लिए सरकारी योजनाओं के तहत प्रशिक्षण, वित्तीय सहायता और बुनियादी ढांचे के विकास की आवश्यकता है। इसके साथ ही मखाना एक जलीय फसल है, जो अनिश्चित मानसून, सूखे और बाढ़ के प्रति अत्यंत संवेदनशील है। बड़े पैमाने पर प्रोसेसिंग के लिए कोल्ड स्टोरेज, पर्याप्त बिजली और बेहतर ट्रांसपोर्ट नेटवर्क की कमी है। अब भी बड़ी संख्या में किसानों को बिचौलियों के चंगुल से पूरी तरह आजादी नहीं मिल पाई है।उत्पादन बढ़ाने, नई किस्में विकसित करने और प्रसंस्करण तकनीकों में और निवेश की आवश्यकता है।
मखाना उद्योग की रीढ़ महिला श्रमिक हैं। मखाने को 'पॉप' करने (भूनने), क्वालिटी चुनने और पैकेजिंग का काम ज्यादातर ग्रामीण महिलाएं करती हैं। इससे उन्हें घर बैठे आमदनी का एक स्रोत मिल रहा है, जिससे न सिर्फ परिवार की आर्थिक स्थिति बेहतर हो रही है, बल्कि उनकी सामाजिक हैसियत में भी सुधार आ रहा है।