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Explainer: क्यों भाग रहे विदेशी निवेशक, क्या है रामदेव अग्रवाल का नुस्खा जिससे FII भारत में डाल देंगे डेरा

Indian Share Market Analysis: बीते कुछ हफ्तों के डाटा में साफ नजर आया कि FII जब नेट सेलर बने, तो निफ्टी-सेंसेक्स की चाल भी कमजोर हुई और कई हैवीवेट स्टॉक्स में प्रॉफिट बुकिंग बढ़ गई। इसी बीच मोतीलाल ओसवाल के चेयरमैन रामदेव अग्रवाल ने एक सीधा फॉर्मूला दिया है जिससे FII भारत में दोबारा “डेरा” डाल देंगे। इस एक्सप्लेनर में समझिए कि FII आखिर क्यों बेच रहे हैं, इनफ्लो-आउटफ्लो का ताजा ट्रेंड क्या कहता है और बाजार की गिरावट से इसका कनेक्शन कैसे बनता है।

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कैसे रुकेगा FII का आउटफ्लो (इमेज क्रेडिट, ओपन एआई)

Why FII Selling (बिकवाली क्यों कर रहे FII): भारतीय शेयर बाजार में FII की लगातार बिकवाली ने एक बार फिर बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है। जब घरेलू इकोनॉमी ठीक-ठाक चल रही है, तब भी विदेशी निवेशक क्यों निकल रहे हैं? Motilal Oswal Group के चेयरमैन रामदेव अग्रवाल का तर्क सीधा है कि यह मामला वैल्यूएशन बनाम अर्निंग्स का है। यानी भारत अगर बाकी उभरते बाजारों (Emerging Markets) की तुलना में महंगा दिख रहा है, तो ग्लोबल स्मार्ट मनी स्वाभाविक रूप से सस्ती जगहों की तरफ शिफ्ट होगी। इसी फ्रेमवर्क में अगर आप FII इनफ्लो-आउटफ्लो का डाटा और बाजार की चाल जोड़कर देखें, तो एक पैटर्न साफ दिखता है, जब FII नेट सेलर होते हैं, बाजार पर ओवरऑल दबाव बढ़ता है।

FII क्यों बेच रहे?

रामदेव अग्रवाल का कोर पॉइंट यही है कि भारत का प्राइस टू अर्निंग P/E कई बार इमर्जिंग मार्केट्स के औसत से ऊपर चला जाता है। उनके मुताबिक अगर भारतीय बाजार का PE 25 पर हो और बाकी उभरते बाजारों का PE 15 के आसपास, तो पैसा “वैल्यू” की तरफ बहता है। इस तुलना में भारत की लिक्विडिटी और बड़े स्टॉक्स की ट्रेडेबिलिटी एक और वजह है। क्योंकि, ग्लोबल फंड मैनेजर भारत में आसानी से बेचकर दूसरे उभरते बाजारों में फंड री-अलोकेट कर सकते हैं। दूसरा फैक्टर है US का स्ट्रॉन्ग ट्रेंड। जब US एसेट्स में ग्रोथ और सेफ्टी दोनों का कॉम्बिनेशन दिखता है, तो भारत और चीन जैसे उभरते बाजारों का अलोकेशन कटता है।

डाटा क्या कहता है?

अगर बड़े ट्रेंड से शुरू करें, तो 2025 के एंड में कई रिपोर्ट्स ने बताया कि FII/ FPI का आउटफ्लो रिकॉर्ड स्तर पर रहा। ET Now की एक रिपोर्ट के मुताबिक 2025 में FII की नेट सेलिंग करीब ₹1.66 लाख करोड़ तक पहुंच गई। यानी “भारत महंगा है” वाला नैरेटिव सिर्फ थ्योरी नहीं, कैपिटल फ्लो में भी दिखा। अब 2026 की शुरुआत के हाई-फ्रीक्वेंसी डाटा पर आएं, तो NSE के FII-DII कैश सेग्मेंट डाटा के मुताबिक जनवरी 2026 में (मंथ-टू-डेट) FII का नेट फ्लो ₹-15,425।22 करोड़ रहा, जबकि DII ₹+23,742।34 करोड़ रहा, यानी एक तरफ विदेशी पैसा निकल रहा है, दूसरी तरफ घरेलू संस्थागत निवेशक (DII) बाजार को “कुशन” दे रहे हैं। यह कुशन नहीं होगा, तो गिरावट और तेज हो सकती है।

FII की सेलिंग से क्यों गिरता बाजार?

FII की बिकवाली और बाजार की कमजोरी का लिंक सिर्फ “सेंटिमेंट” से नहीं है, इसमें तीन ठोस चैनल काम करते हैं।

लिक्विडिटी शॉक: FII बड़े टिकट से ट्रेड करते हैं। जब वे कैश मार्केट में लगातार नेट सेलर होते हैं, तो डिमांड-सप्लाई का बैलेंस बिगड़ता है। शॉर्ट टर्म में प्राइस डिस्कवरी “डाउनसाइड” पर शिफ्ट हो जाती है। FII कैश फ्लो के डेली डाटा से पता चलता है कि 12 जनवरी, 2026 को FII ने कैश सेगमेंट में ₹3,638.40 करोड़ की नेट सेलिंग की है। इस असर पूरे बाजार पर देखने को मिला है।

इंडेक्स हैवीवेट्स पर प्रेशर: FII का बड़ा हिस्सा इंडेक्स हैवीवेट स्टॉक्स में होता है—बैंकिंग, IT, ऑयल एंड गैस जैसी थीम्स। जब वे बेचते हैं, तो इंडेक्स पर सीधा असर पड़ता है। Reuters की एक रिपोर्ट में 13 जनवरी 2026 को बाजार के मूव में IT और Reliance जैसे हैवीवेट्स की कमजोरी का जिक्र है, जिससे Nifty और Sensex दबाव में दिखे।

रिस्क-ऑफ फीडबैक लूप: FII की बिकवाली अक्सर रुपये की चाल, क्रूड प्राइस, ग्लोबल यील्ड और रिस्क-ऑफ सेंटिमेंट से जुड़ जाती है। फिर टेक्निकल ब्रेकडाउन और स्टॉप-लॉस ट्रिगर होकर गिरावट को बढ़ा देते हैं।

जब FII नेट सेलर, तो बाजार भी कमजोर

पिछले हफ्ते के मूव्स को केस स्टडी की तरह देखें, तो भारतीय बाजार में पिछले हफ्ते तेज बिकवाली दिखी, जिसमें Sensex करीब 2.55% और Nifty 2.45% गिरकर क्रमश: 83,576 और 25,683 के आसपास बंद हुआ। इसी बैकड्रॉप में जनवरी 2026 की शुरुआत में FII का मंथ-टू-डेट नेट सेलिंग ₹15,000 करोड़ से ज्यादा दिख रहा है। जाहरि है कि यह “one-to-one” वजह नहीं है। कई बार बाजार ग्लोबल क्यूज, कमोडिटी, रिजल्ट्स या पॉलिसी फैक्टर्स से भी गिरता है। लेकिन जब FII लगातार नेट सेलर हों, तो वे गिरावट को “फ्यूल” देते हैं, क्योंकि लिक्विडिटी और हैवीवेट प्रेशर एक साथ काम करता है।

क्या है रामदेव अग्रवाल का नुस्खा?

ET Now से बातचीत के दौरान रामदेव अग्रवाल ने इसके लिए दो लाइन का इलाज बताया है। वे कहते हैं, ''या तो वैल्यूएशन ठंडा हो, या अर्निंग्स तेज हो''। उनका लॉजिक यह है कि अगर अगले 12 महीनों में अर्निंग्स ग्रोथ मजबूत होती है, तो मौजूदा हाई PE अपने आप “डाइजेस्ट” हो जाएगा। यानी मार्केट को बहुत नीचे आए बिना भी PE 18–19 जैसे रेंज में आ सकता है, अगर अर्निंग्स 20% जैसे ग्रोथ दिखा दें। तब भारत का “महंगा” टैग कमजोर होगा और FII की री-एंट्री का केस बनेगा। इसीलिए वे अर्निंग्स को “कुल्हाड़ी” मानते हैं, मोमेंटम को नहीं। 2025 में रिकॉर्ड FII आउटफ्लो और 2026 की शुरुआत में भी नेट सेलिंग का डाटा दिखाता है कि विदेशी निवेशक फिलहाल वैल्यूएशन और ग्लोबल अलोकेशन के आधार पर सतर्क हैं। इसके साथ ही

बाजार की चाल बताती है कि जब FII नेट सेलर बनते हैं, तो लिक्विडिटी शॉक, हैवीवेट प्रेशर और रिस्क-ऑफ सेंटिमेंट मिलकर इंडेक्स को भी दबाते हैं। राहत की बड़ी शर्त वही है, जो रामदेव अग्रवाल कह रहे हैं, अर्निंग्स ग्रोथ का पिकअप या वैल्यूएशन का नॉर्मलाइजेशन।

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