Iran-Israel War Impact On India: वित्त मंत्रालय की फरवरी 2026 की आर्थिक समीक्षा रिपोर्ट के मुताबिक, वैश्विक आर्थिक अस्थिरता और सुरक्षित निवेश की ओर बढ़ती पूंजी प्रवाह से रुपये पर अतिरिक्त दबाव पड़ सकता है। रिपोर्ट में उल्लेख है कि ईरान पर अमेरिका और इजरायल के हमलों के बाद होर्मुज जलडमरूमध्य में जहाजों की आवाजाही बाधित हो गई है। यह जलमार्ग वैश्विक तेल आपूर्ति का करीब 20 प्रतिशत संभालता है और अगर क्षेत्रीय ऊर्जा अवसंरचना को नुकसान पहुंचे, तो इसका लॉन्गटर्म असर वैश्विक ऊर्जा भू-राजनीति पर पड़ सकता है। वित्त मंत्रालय की रिपोर्ट और विशेषज्ञों का कहना है कि भारत की अर्थव्यवस्था मजबूत बनी हुई है, लेकिन वैश्विक तेल और गैस संकट का असर आम जनता तक सीधे पहुंच रहा है। पेट्रोल, डीजल, एलपीजी और आयातित वस्तुओं की बढ़ती कीमतें घरेलू खर्च को प्रभावित कर रही हैं। अगर पश्चिम एशिया का संकट लंबा खिंचता है, तो इसका असर मुद्रास्फीति, चालू खाते और रुपये की विनिमय दर पर भी पड़ेगा। आम जनता के लिए यह समय आर्थिक योजना और बजट में सतर्कता का है।
तेल और गैस की कीमतों में उछाल
इस संघर्ष के कारण अंतरराष्ट्रीय तेल मानक ब्रेंट क्रूड की कीमत करीब 9 प्रतिशत बढ़कर 80 डॉलर प्रति बैरल के करीब पहुंच गई है। वहीं, एलएनजी (तरलीकृत प्राकृतिक गैस) की कीमतें भी करीब 50 प्रतिशत तक बढ़ चुकी हैं। भारत कच्चे तेल का बड़ा आयातक होने के बावजूद पर्याप्त विदेशी मुद्रा भंडार, कम चालू खाते का घाटा और नियंत्रित महंगाई दर के कारण बढ़ती वैश्विक कीमतों के प्रभाव को आंशिक रूप से संतुलित कर सकता है। हालांकि वित्त मंत्रालय ने चेतावनी दी है कि अगर यह संकट लंबे समय तक जारी रहा, तो रुपये की विनिमय दर, चालू खाते का घाटा और महंगाई दर पर प्रतिकूल असर पड़ सकता है। खासकर एलएनजी और कच्चे तेल पर निर्भर उर्वरक और पेट्रोरसायन जैसे उद्योग इस संकट से प्रभावित हो सकते हैं।
आम जनता पर असर: पेट्रोल, डीजल और एलपीजी
ईरान और अमेरिका-इजरायल के बीच चल रहे युद्ध का असर सिर्फ मध्यपूर्व तक सीमित नहीं रहा। इसका असर सीधे भारतीय आम नागरिक की जेब पर पड़ने लगा है। सबसे पहले इसका असर पेट्रोल, डीजल और एलपीजी जैसी जरूरी वस्तुओं की कीमतों में देखा गया है। कच्चा तेल महंगा होने के कारण ट्रांसपोर्टेशन की लागत बढ़ गई है। इसका मतलब है कि ट्रक और अन्य वाहन जो सामान लाते हैं, उन्हें ज्यादा खर्च करना पड़ रहा है। जब ट्रांसपोर्ट महंगा होगा, तो इसके असर से रोजमर्रा की जरूरतों की कीमतें बढ़ जाएंगी। सबसे पहले एलपीजी की कीमतों में बढ़ोतरी देखने को मिली है। अब महीने में गैस सिलेंडर का उपयोग करने वाले परिवारों को ज्यादा पैसे खर्च करने पड़ेंगे। इससे खाना बनाना महंगा हो गया है और घर का बजट प्रभावित होगा। इसके अलावा सब्जियों, दालों और अन्य खाने-पीने की जरूरी चीजों की कीमतों में भी बढ़ोतरी हो सकती है। यह स्थिति उन परिवारों के लिए और कठिन है जिनकी आय सीमित है।
अंतरराष्ट्रीय बाजार और आयातित सामान महंगे
कच्चे तेल की बढ़ती कीमतें अंतरराष्ट्रीय बाजार में वस्तुओं की कीमत बढ़ा रही हैं। इसका सीधा असर उन उत्पादों पर होगा जिन्हें भारत को विदेश से आयात करना पड़ता है। इलेक्ट्रॉनिक्स, दवाइयां, फैशन आइटम और अन्य आयातित सामान महंगे हो जाएंगे। इससे घरेलू खर्च में और बढ़ोतरी होगी।
पेट्रोल और डीजल की बढ़ती कीमतों के प्रभाव
पेट्रोल और डीजल की कीमतों में लगातार बढ़ोतरी हो रही है। इसका असर सिर्फ परिवहन पर ही नहीं, बल्कि रोजमर्रा की जिंदगी के हर क्षेत्र में पड़ता है। यात्राएं महंगी हो जाएंगी, ट्रक और बस किराया बढ़ेगा, और बाजार में सामान की कीमतों में भी बढ़ोतरी होगी। आम आदमी की जेब पर यह सबसे ज्यादा असर डालता है क्योंकि रोजमर्रा के खर्च बढ़ जाएंगे।
रुपया कमजोर, विदेश में पढ़ाई महंगी
रुपया लगातार कमजोर हो रहा है। इसका सीधा असर उन परिवारों पर पड़ता है जिनके बच्चे विदेश में पढ़ाई कर रहे हैं या जो विदेश से सामान मंगवा रहे हैं। विदेश में पढ़ाई की लागत बढ़ जाएगी, जिसमें कॉलेज की फीस, हॉस्टल और अन्य खर्च शामिल हैं। यह स्थिति परिवारों के लिए चिंता का विषय बन गई है।
घरेलू बजट पर कुल असर
इन सभी कारणों से घरेलू बजट पर बड़ा दबाव पड़ा है। खाने-पीने से लेकर बच्चों की पढ़ाई और दैनिक आवश्यकताओं तक, हर चीज महंगी हो गई है। परिवारों को अपने खर्चों में कटौती करनी पड़ सकती है। कई लोग पहले से ही आर्थिक रूप से मुश्किल हालात में हैं, और अब यह बढ़ती कीमतें उनकी परेशानियों को और बढ़ा रही हैं।
भारतीय अर्थव्यवस्था की मजबूती
हलांकि वित्त मंत्रालय की फरवरी 2026 की आर्थिक समीक्षा रिपोर्ट में वित्त वर्ष 2025-26 में भारतीय अर्थव्यवस्था की मजबूती को भी रेखांकित किया गया है। अनुमान है कि इस वित्त वर्ष में वास्तविक जीडीपी वृद्धि 7.6 प्रतिशत और रियल ग्रॉस वैल्यू एडेड ग्रोथ 7.7 प्रतिशत रहेगी। जनवरी 2026 में आर्थिक गतिविधियां व्यापक आधार पर मजबूत रहीं, जिसका समर्थन लॉजिस्टिक गतिविधियों, पीएमआई में विस्तार और मजबूत मांग जैसे हाई फ्रीक्वेंसी इंडिकेटर्स से मिला। वैश्विक व्यापार में अनिश्चितता के बावजूद भारत का बाहरी क्षेत्र स्थिर बना हुआ है। अमेरिका और यूरोपीय संघ के साथ व्यापार समझौते और सक्रिय व्यापार कूटनीति से निर्यात गंतव्यों का डायवर्सिफिकेशन हुआ है, जिससे मध्यम अवधि में बाहरी मजबूती बढ़ने की उम्मीद है।