Times Now Navbharat Explainer : भारत को “आम का देश” कहा जाए तो गलत नहीं होगा। यहां हर साल करीब 4 करोड़ टन के आसपास आम का उत्पादन (Indian Mango Production)होता है, जो दुनिया में सबसे ज्यादा है। दशहरी, लंगड़ा, चौसा, केसर और अल्फांसो जैसे आम न सिर्फ भारत में बल्कि विदेशों में भी पसंद किए जाते हैं। लेकिन हैरानी की बात यह है कि इतनी बड़ी पैदावार के बावजूद भारत का आम निर्यात (Indian Mango Export) बहुत छोटा है। देश अपने कुल उत्पादन का केवल करीब 1% ही बाहर भेज पाता है। वैश्विक आम निर्यात में भारत की हिस्सेदारी सिर्फ 2-3% के आसपास है। वित्त वर्ष 2024-25 में भारत ने करीब 29,938 मीट्रिक टन ताजा आम निर्यात किया, जिसकी कीमत करीब 56.5 मिलियन डॉलर रही। इसके उलट मेक्सिको और पेरू जैसे देश, जो भारत से कम आम पैदा करते हैं, वैश्विक बाजार में ज्यादा मजबूत स्थिति रखते हैं। इसका बड़ा कारण उनकी बेहतर सप्लाई चेन, कम लॉजिस्टिक्स लागत और मजबूत एक्सपोर्ट नेटवर्क है।
भारत में उत्पादन ज्यादा, लेकिन निर्यात कम क्यों?
भारत में आम की खपत बहुत ज्यादा है। 140 करोड़ की आबादी और आम से जुड़ी गहरी सांस्कृतिक पसंद के कारण अधिकतर उत्पादन देश के भीतर ही खप जाता है। घरों, बाजारों और स्थानीय व्यापार में इसकी भारी मांग रहती है। इसके अलावा, भारत में आम की खेती छोटे किसानों द्वारा होती है और यह उत्पादन बिखरा हुआ है। बड़े पैमाने पर एक जैसी गुणवत्ता और निरंतर सप्लाई बनाए रखना मुश्किल होता है। यही कारण है कि निर्यात के लिए जरूरी स्टैंडर्डाइजेशन भारत में पूरी तरह विकसित नहीं हो पाया है।
| देश | आम उत्पादन (हजार मीट्रिक टन में) | हिस्सेदारी (%) |
|---|---|---|
| भारत | 27,766.26 | 44.52 |
| चीन | 4,242.14 | 6.80 |
| इंडोनेशिया | 4,136.62 | 6.63 |
| मेक्सिको | 2,650.03 | 4.25 |
| ब्राज़ील | 2,395.93 | 3.84 |
| पाकिस्तान | 2,146.17 | 3.44 |
| बांग्लादेश | 2,100.64 | 3.37 |
| मिस्र | 1,863.40 | 2.99 |
| वियतनाम | 1,552.91 | 2.49 |
| थाईलैंड | 1,486.72 | 2.38 |
| कुल उत्पादन | 50,340.82 | 100% |
भारत की ताकत: किस्मों और जीआई टैग का फायदा
भारत में करीब 1000 तरह के आम पाए जाते हैं, हालांकि व्यावसायिक तौर पर कुछ ही किस्में प्रमुख हैं। अल्फांसो (रत्नागिरी और देवगढ़), केसर (गिर), दशहरी (मलीहाबाद), लंगड़ा, चौसा और बंगनापल्ली जैसे आम दुनिया भर में मशहूर हैं। कई किस्मों को जियोग्राफिकल इंडिकेशन (GI) टैग मिला है। इससे यह साबित होता है कि ये आम विशेष क्षेत्र में ही उगाए जाते हैं और उनकी गुणवत्ता अलग होती है। यह भारत के लिए ब्रांडिंग का बड़ा फायदा है, क्योंकि वैश्विक बाजार में ओरिजिन ब्रांडिंग बहुत मायने रखती है।
मैंगो डिप्लोमेसी: भारत की नई रणनीति
हाल के वर्षों में भारत ने आम को एक सॉफ्ट डिप्लोमेसी टूल के रूप में इस्तेमाल करना शुरू किया है। इसे ही अनौपचारिक रूप से मैंगो डिप्लोमेसी कहा जाता है। भारत सरकार और APEDA ने दुबई, अमेरिका, सिंगापुर और जर्मनी जैसे देशों में आम प्रचार कार्यक्रम शुरू किए हैं। इन इवेंट्स में भारतीय आम की विभिन्न किस्मों का स्वाद चखाया जाता है और विदेशी खरीदारों को सीधे भारतीय निर्यातकों से जोड़ा जाता है। अमेरिका में कई बड़े रिटेल स्टोर्स में भारतीय केसर आम की बिक्री शुरू हुई है और कुछ जगहों पर इनकी पहली खेप कुछ ही घंटों में बिक गई। यह दिखाता है कि मांग मौजूद है, बस उसे सही तरीके से बाजार तक पहुंचाने की जरुरत है।
आम उत्पादन में भारत की तूफानी बढ़त
भारतीय आम की अंतरराष्ट्रीय मांग
अब तक भारतीय आम की सबसे बड़ी मांग विदेशों में बसे भारतीयों से आती रही है। उन्हें अपने देश का स्वाद और बचपन की यादें फिर से चाहिए होती हैं। लेकिन अब स्थिति बदल रही है। सिंगापुर, कनाडा, दक्षिण कोरिया और अमेरिका जैसे देशों में स्थानीय उपभोक्ता भी प्रीमियम भारतीय आम खरीद रहे हैं। ये ग्राहक गुणवत्ता, स्वाद और एक्सोटिक फ्रूट्स में रुचि रखते हैं। इसका मतलब है कि भारतीय आम अब सिर्फ इमोशनल प्रोडक्ट नहीं रहा, बल्कि एक प्रीमियम ग्लोबल प्रोडक्ट बन सकता है।
सबसे बड़ी समस्या: सप्लाई चेन और लॉजिस्टिक्स
भारत की सबसे बड़ी कमजोरी इसकी सप्लाई चेन है। आम जल्दी खराब होने वाला फल है, इसलिए इसे तेजी से और ठंडे तापमान में भेजना जरूरी होता है। भारत में अभी भी अधिकतर आम एयर कार्गो से भेजे जाते हैं, जो बहुत महंगा पड़ता है। कुछ मामलों में एयर फ्रेट लागत कुल कीमत का 50-60% तक पहुंच जाती है। इसके कारण भारतीय आम विदेशी बाजार में महंगे हो जाते हैं। इसके अलावा कोल्ड स्टोरेज, पैक हाउस और प्रोसेसिंग यूनिट्स की कमी भी बड़ी समस्या है। कई बार निर्यात के दौरान फल खराब हो जाते हैं या उनकी गुणवत्ता गिर जाती है।
भारत: दुनिया का सबसे बड़ा आम उत्पादक, लेकिन छोटा निर्यातक
ट्रीटमेंट और क्वालिटी कंट्रोल की चुनौती
निर्यात के लिए आम को कई तरह की जांच और ट्रीटमेंट से गुजरना पड़ता है, जैसे वाष्प ताप (Vapor Heat Treatment) और विकिरण उपचार (Gamma Irradiation)। भारत में इन सुविधाओं की संख्या सीमित है और ये कुछ ही शहरों में उपलब्ध हैं। इसके अलावा, अलग-अलग देशों के फाइटोसैनिटरी नियम (plant safety standards) बहुत सख्त हैं। अगर एक भी मानक पूरा नहीं हुआ तो पूरा निर्यात रोक दिया जा सकता है। जापान और कुछ अन्य देशों ने हाल ही में भारत से आम के आयात पर अस्थायी रोक या सख्ती दिखाई थी, जिससे यह साफ होता है कि गुणवत्ता नियंत्रण कितना जरूरी है।
जलवायु परिवर्तन और उत्पादन पर खतरा
अब एक नई चुनौती जलवायु परिवर्तन है। हाल के वर्षों में बेमौसम बारिश, गर्मी की लहरें और ठंडे मौसम ने आम की फसल को प्रभावित किया है। विशेषकर अल्फांसो जैसे प्रीमियम आम की पैदावार कई इलाकों में 80% तक गिर गई। इससे न केवल घरेलू बाजार प्रभावित होता है, बल्कि निर्यात भी कम हो जाता है।
प्रोसेस्ड आम: भविष्य का बड़ा मौका
ताजा आम के अलावा प्रोसेस्ड आम उत्पादों में बड़ा अवसर है। आम का पल्प, जूस, प्यूरी, फ्रोजन कट्स और ड्राइड स्लाइस जैसे उत्पाद सालभर बिक सकते हैं। वित्त वर्ष 2024-25 में भारत ने 63,000 टन से ज्यादा आम पल्प का निर्यात किया, जिसकी कीमत ताजे आम से भी ज्यादा रही। इसका मतलब यह है कि प्रोसेसिंग सेक्टर में ज्यादा कमाई की संभावना है। प्रोसेस्ड उत्पादों का फायदा यह भी है कि ये खराब नहीं होते और लंबी दूरी तक आसानी से भेजे जा सकते हैं।
क्या भारत बन सकता है एक्सपोर्ट पावरहाउस?
एक्सपर्ट्स का मानना है कि अगर भारत अपनी सप्लाई चेन मजबूत कर ले, कोल्ड स्टोरेज बढ़ाए और लॉजिस्टिक्स लागत कम करे, तो आने वाले 5-10 वर्षों में आम निर्यात 4 से 5 गुना तक बढ़ सकता है। इसके लिए कुछ जरूरी कदम हैं। आधुनिक कोल्ड चेन नेटवर्क का विकास,,बड़े पैमाने पर पैक हाउस और प्रोसेसिंग यूनिट्स, एयर और सी-फ्रेट लागत कम करना, निर्यात गुणवत्ता मानकों का सख्ती से पालन, किसानों और निर्यातकों के बीच बेहतर तालमेल।
क्षमता पूरी है, जरुरत सिर्फ सिस्टम की है
भारत के पास दुनिया का सबसे बड़ा आम उत्पादन है, अनोखी किस्में हैं और वैश्विक बाजार में बढ़ती मांग भी है। लेकिन निर्यात की कहानी अभी अधूरी है। अगर भारत अपनी बुनियादी ढांचे की समस्याएं हल कर लेता है, तो वह सिर्फ आम उत्पादन में ही नहीं, बल्कि आम निर्यात में भी दुनिया का लीडर बन सकता है। अगले दशक में यह तय करेगा कि भारत का आम सिर्फ देश की थाली तक सीमित रहेगा या दुनिया भर में भारतीय स्वाद का प्रतीक बनेगा।
