Times Now Navbharat
live-tv
Premium

Explained: गहरा समंदर, विशाल जहाज और पाइपलाइनों का जाल, ऐसे चलता है दुनिया में तेल-गैस का कारोबार

ईरान संकट और होर्मुज रूट बंद होने दुनियाभर में कच्चे तेल और गैस की किल्लत है। हालात यह है कि एक जहाज किसी देश के बंदरगाह पर पहुंचने पर सुर्खियां बटोर रही है। अमेरिका और ईरान के बीच जारी युद्ध जल्द थमता दिख नहीं रहा है। यानी हालात में फौरी सुधार की उम्मीद नहीं है। खैर, क्या आपको पता है कि दुनिया में तेल का इतना विशाल कारोबार कैसे होता है? इसकी खरीद-बिक्री कैसे होती है? जहाज से रिफाइनरी पहुंचने तक का पूरा प्रोसेस क्या होता है? तेल और गैस की कीमत कैसे तय होती है? आइए दुनिया के इस सबसे बड़े बिजनेस की परत-दर-परत जानकारी आपको देते हैं।

Image
तेल और गैस उद्योग कैसे काम करता है,
Authored by: Alok Kumr
Updated Apr 3, 2026, 13:09 IST

बता दें कि कच्चे तेल (क्रूड ऑयल) और गैस की खरीद बिक्री सरकारी कंपनियां (जैसे IOCL, BPCL) या निजी कंपनियां ग्लोबल मार्केट से करती हैं। ये सौदे दुनियाभर के कई देशों से तेल कंपनियां करती हैं। कुछ सौदे लंबे समय के लिए होते हैं और कुछ 'स्पॉट' (Spot) यानी उसी समय के बाजार भाव पर किए जाते हैं। तेल की कीमतें घटती-बढ़ती रहती हैं, इसलिए इसमें बड़ा जोखिम होता है। यह पूरा काम कड़े सरकारी नियमों के अंदर होता है। पाइपलाइन में कितना तेल जाएगा और उसे कैसे स्टोर किया जाएगा, इसके लिए कई फीस और कानून होते हैं। अधिकांश तेल की खरीद डॉलर में होती है। तेल की कीमत Brent (ग्लोबल) या WTI (अमेरिकी) स्टैंडर्ड के आधार पर तय होती है। Dubai/Oman, खाड़ी देशों का तेल, जिससे भारत जैसे एशियाई देशों के लिए रेट तय होते हैं। तेल का रेट रोजना बदलते रहते हैं। हालांकि, कई कंपनियां लंबे समय के लिए कंट्रैक्ट करती है तो एक तय भाव पर तेल की डील होती है।

लोडिंग और समुद्री यात्रा

किसी देश से तेल या गैस की खरीद के बाद तेल और गैस को विशाल टैंकरों में भरा जाता है। ये जहाज इतने बड़े होते हैं कि इनमें 20 लाख बैरल तक तेल आ सकता है। इसके बाद ये अलग-अलग रूट जैसे होर्मुज, स्वेज या मलक्का जैसे समुद्री रास्तों से 15 से 1 महीने तक का सफर कर भारत पहुंचते है। जब जहाज भारतीय तट (जैसे जामनगर, मुंद्रा या विशाखापत्तनम) पर पहुंचता है, तो उसे सीधे किनारे पर नहीं लाया जा सकता क्योंकि ये बहुत गहरे होते हैं। इसके लिए समुद्र के बीचों-बीच एक बड़ा 'फ्लोटिंग स्टेशन' होता है। जहाज वहां खड़ा होता है और पाइपलाइन के जरिए तेल खाली किया जाता है। यहां से तेल जमीन पर बने विशाल टैंकों में स्टोर किया जाता है। समुद्र तट से अगर रिफाइनरी दूर है (जैसे मथुरा या पानीपत रिफाइनरी), तो तेल को जमीन के नीचे बिछी सैकड़ों किलोमीटर लंबी पाइपलाइनों के जरिए भेजा जाता है। इसे 'पंपिंग स्टेशन्स' के जरिए धक्का देकर आगे बढ़ाया जाता है।

रिफाइनरी में तेल कैसे प्रोसेस होता है?

  • तेल का आना: सबसे पहले कच्चा तेल पाइप या जहाजों के जरिए रिफाइनरी पहुंचता है।
  • गरम करना: तेल को भट्टी में उबाला जाता है। भाप बनकर हल्का तेल (गैस, पेट्रोल) ऊपर और भारी तेल (डीजल) नीचे रह जाता है।
  • तोड़ना: भारी तेल को मशीन में तोड़कर कीमती पेट्रोल और डीजल में बदला जाता है।
  • सफाई: तेल से गंदगी और सल्फर को निकालकर उसे साफ किया जाता है।
  • मिलावट: अंत में, मार्केट की मांग के हिसाब से इसमें जरूरी चीजें मिलाई जाती हैं और फिर इसे टैंकों में भरकर बाजार भेजा जाता है।

घरों तक गैस कैसे पहुंचता है?

गैस का सफर कच्चे तेल से थोड़ा अलग और अधिक तकनीकी होता है, क्योंकि गैस को संभालना और ट्रांसपोर्ट करना चुनौतीपूर्ण है। सबसे पहले समुद्र के नीचे या जमीन के भीतर से कच्चा गैस निकाला जाता है। कुएं से निकली गैस में पानी, रेत और अशुद्धियां होती हैं। इन्हें 'प्रोसेसिंग प्लांट' में अलग किया जाता है ताकि शुद्ध मीथेन बचे। इसके बाद इस गै को दो तरीके से ट्रांसपोर्ट किया जाता है। पहला, अगर दूरी कम है, तो गैस को सीधे बड़े पाइपों के जरिए भेजा जाता है। वहीं, अगर गैस विदेश से आ रही है, तो उसे -162°C तक ठंडा करके तरल (Liquid) बनाया जाता है। इसे LNG (Liquefied Natural Gas) कहते हैं। तरल बनने पर यह 600 गुना कम जगह घेरती है, जिससे इसे विशाल जहाजों में भरकर लाया जाता है।

री-गैसीफिकेशन का प्रोसेस

जब LNG का जहाज भारत के टर्मिनल (जैसे दाहेज या कोच्चि) पर पहुंचता है, तो तरल गैस को फिर से गर्म करके गैस के रूप में बदला जाता है। इसे 'री-गैसीफिकेशन' कहते हैं। अब इस गैस को देश भर में बिछी विशाल पाइपलाइनों (जैसे गेल की HVJ पाइपलाइन) में डाल दिया जाता है। इसके बाद रिफिलिंग कर सिलेंडर में गैस भरा जाता है। प्राकृतिक गैस की अपनी कोई गंध नहीं होती। सुरक्षा के लिए इसी स्टेज पर इसमें 'मरकैप्टन' (Mercaptan) नाम का रसायन मिलाया जाता है, ताकि लीक होने पर सड़ी हुई गंध आए और खतरा टल सके।

CNG (गाड़ियों के लिए): गैस को बहुत हाई प्रेशर पर कंप्रेस करके स्टेशनों तक भेजा जाता है।

PNG (घरों के लिए): प्रेशर कम करके छोटी पाइपलाइनों के जरिए सीधे आपकी रसोई के चूल्हे तक पहुंचाया जाता है।

सुरक्षा के कड़े इंतजाम

पेट्रोलियम उत्पाद ज्वलनशील होते हैं, इसलिए पूरी वितरण श्रृंखला में सुरक्षा सर्वोपरि होती है। इसलिए तेल—गैस निकालने से लेकर पेट्रोल पंप तक पहुंचाने में कड़े सुरक्षा मानदंड का पालन किया जाता है।

तकनीकी सुरक्षा: वेंट्स (Vents): टैंकों में दबाव को नियंत्रित करने के लिए सुरक्षा वाल्व लगाए जाते हैं।

फ्लोटिंग स्क्रीन्स: गैसोलीन टैंकों के अंदर उड़ने वाले वाष्प को रोकने के लिए चलने वाले कवर लगाए जाते हैं।

डिटेक्टर्स और अलार्म: किसी भी लीक को तुरंत पकड़ने के लिए सेंसर और ऑटोमैटिक शट-ऑफ वाल्व लगे होते हैं।

अग्निशमन प्रणाली: आग बुझाने के लिए फिक्स्ड स्प्रिंकलर और फोम कैनन की व्यवस्था होती है।

Hormuz and  Iran Crisis

Hormuz and Iran Crisis

तेल और गैस को मांपने का क्या है पैमाना?

तेल और गैस को मापने के लिए कुछ खास मेट्रिक्स और नियम अपनाए जाते हैं। E&P (एक्सप्लोरेशन और प्रोडक्शन) कंपनियां कच्चे तेल को बैरल (bbl) में मापती हैं, जहां एक बैरल 42 अमेरिकी गैलन के बराबर होता है। उत्पादन को आमतौर पर प्रति दिन (bbl per day) या प्रति तिमाही के आधार पर बताया जाता है। उद्योग में “M” का मतलब 1,000 और “MM” का मतलब 10 लाख होता है, इसलिए Mbbl का अर्थ 1,000 बैरल और MMbbl का अर्थ 10 लाख बैरल होता है। वहीं, प्राकृतिक गैस को क्यूबिक फीट में मापा जाता है, जिसमें Mmcf (10 लाख क्यूबिक फीट), Bcf (1 अरब क्यूबिक फीट) और Tcf (1 खरब क्यूबिक फीट) जैसे यूनिट्स इस्तेमाल होते हैं।

तेल और गैस कंपनियां अपने भंडार (Reserves) को भी बैरल और क्यूबिक फीट में मापती हैं, जो जमीन के नीचे मौजूद लेकिन अभी तक निकाले नहीं गए संसाधन होते हैं। इन्हें कंपनी की वैल्यू और भविष्य की कमाई का आकलन करने के लिए इस्तेमाल किया जाता है।

कंपनियों का बिजनेस मॉडल क्या होता है?

तेल और गैस उद्योग से जुड़ी कंपनियां, तीन मुख्य हिस्सों अपस्ट्रीम (खोज और उत्पादन), मिडस्ट्रीम (परिवहन और स्टोरेज) और डाउनस्ट्रीम (रिफाइनिंग और वितरण) में काम करती हैं। अपस्ट्रीम में तेल और गैस की खोज, ड्रिलिंग और निकालने का काम होता है, मिडस्ट्रीम में पाइपलाइन, जहाज और स्टोरेज के जरिए इन्हें पहुंचाया जाता है, जबकि डाउनस्ट्रीम में इन्हें पेट्रोल, डीज़ल, गैस और अन्य उत्पादों में बदला जाता है।

तेल और गैस लाखों साल पहले समुद्री जीवों के अवशेषों से बने फॉसिल फ्यूल हैं, जो जमीन के नीचे जमा होते हैं और फिर आधुनिक तकनीकों से निकाले जाते हैं। इस उद्योग में अमेरिका, सऊदी अरब, रूस जैसे देश प्रमुख उत्पादक हैं और OPEC जैसे संगठन कीमतों को प्रभावित करते हैं।

नई तकनीकों जैसे AI, IoT, ड्रोन और डिजिटल ट्विन्स के इस्तेमाल से उत्पादन और रिफाइनिंग ज्यादा स्मार्ट और कुशल हो रही है। वहीं, पर्यावरण को लेकर दबाव बढ़ने के कारण कंपनियां कार्बन उत्सर्जन कम करने, कार्बन कैप्चर, हाइड्रोजन और रिन्यूएबल एनर्जी में निवेश बढ़ा रही हैं।

End of Article