Crude Oil History: अमेरिका, इजरायल और ईरान के बीच जारी युद्ध के खत्म होने की उम्मीद धूमिल होती जा रही है। अमेरिकी पायलट को रेस्क्यू करने के बाद अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान पर विनाशक हमले करने की चेतावनी दी है। ट्रंप ने ईरान को 4 घंटे में नेस्तनाबूद करने की धमकी दी है। इससे पूरी दुनिया सहमी हुई है। इसका असर शेयर बाजार से लेकर क्रूड की कीमतों पर साफ दिखाई दे रहा है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में ब्रेंट क्रूड की कीमतें 115 डॉलर प्रति बैरल के पार पहुंच गई है। क्रूड के दाम में उछाल से दुनियाभर में महंगाई बढ़ने और मंदी का खतरा पैदा हो गया है। हालांकि, यह पहली बार नहीं हुआ कि कच्चा तेल में उछाल आया है। इतिहास के पन्ने पर नजर डालें तो आपको पता चलेगा कि इससे पहले भी क्रूड ऑयल की कीमतें रिकॉर्ड हाई पर पहुंची थी। फिर धड़ाम भी हुई! आइए क्रूड के चौंकाने वाले इतिहास के पन्ने खंगालते हैं।
1800-1869: कच्चे तेल उद्योग की शुरुआत
आधुनिक तेल उद्योग की शुरुआत 1837 में बाकू से मानी जा सकती है, जहां तेल को पैराफिन (जिसे लैंप और हीटिंग तेल के रूप में इस्तेमाल किया जाता था) में बदलने के लिए पहली कमर्शियल तेल रिफाइनरी स्थापित की गई थी। इसके बाद 1846 में पहला आधुनिक तेल का कुआं खोदा गया, जिसकी गहराई 21 मीटर थी। उस समय, बाकू में मौजूद सिर्फ एक तेल क्षेत्र से दुनिया के 90% से ज्यादा तेल का उत्पादन होता था, जिसका ज्यादातर हिस्सा फसरस (अब ईरान) को भेजा जाता था।
इसके तुरंत बाद, बोब्रका, पोलैंड (1854), बुखारेस्ट, रोमानिया (1857), ओंटारियो, कनाडा (1858) और पेंसिल्वेनिया, USA (1859) में भी कमर्शियल तेल के कुएं खोदे गए, जिससे इनमें से कई क्षेत्रों में 'काला सोना' (तेल) पाने की होड़ मच गई। पेंसिल्वेनिया इस दौड़ में सबसे आगे रहा और कुछ ही सालों के अंदर वह दुनिया के लगभग आधे तेल का उत्पादन करने लगा। इसके बाद तेल की कीमतें तेजी से बढ़ीं। 1861 में लगभग 0.49 डॉलर प्रति बैरल से बढ़कर 1865 में 6.59 डॉलर प्रति बैरल हो गईं।
1870-1913: मॉडर्न तेल उद्योग का जन्म
1870 में, जॉन डी. रॉकफेलर ने ओहियो में स्टैंडर्ड ऑयल कंपनी की स्थापना की। यह कंपनी जल्द ही एक प्रमुख खिलाड़ी के रूप में उभरी, जिसने कीमतों को नीचे गिराया और अपने प्रतिस्पर्धियों को खरीद लिया। स्टैंडर्ड ऑयल का पूरे देश में विस्तार हुआ और इसने चीन सहित विदेशों के बाजारों में भी निर्यात शुरू कर दिया। यह इतनी सफल रही कि 1890 तक, अमेरिका में परिष्कृत तेल के लगभग 90% हिस्से पर इसका नियंत्रण हो गया था।
1973- योम किप्पुर युद्ध: 11 डॉलर पर पहुंचा था कच्चा तेल
1973 के योम किप्पुर युद्ध के दौरान, इजरायल को पश्चिमी देशों के समर्थन के कारण, OPEC देशों ने तेल व्यापार पर पूरी तरह से रोक लगा दी। इसके चलते तेल की कीमतें 3 डॉलर प्रति बैरल से बढ़कर 11 डॉलर प्रति बैरल हो गईं - जो लगभग 266 प्रतिशत की वृद्धि थी। कुछ समय तक कच्चे तेल की कीमत 17 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गईं थी।
1991- खाड़ी युद्ध: 36 डॉलर के पार कच्चा तेल
खाड़ी युद्ध के दौरान तेल की कीमतों में भारी उछाल आया, क्योंकि इराक द्वारा कुवैत पर किए गए आक्रमण से ऊर्जा आपूर्ति बाधित हो गई थी। कीमतें 17 डॉलर प्रति बैरल से बढ़कर 36 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गईं थी। हालांकि, यह स्थिति उतनी गंभीर नहीं थी और इसका समय भी कम रहा। जैसे ही अमेरिका के नेतृत्व वाले गठबंधन ने ऊर्जा आपूर्ति को सुरक्षित किया, कीमतें सामान्य स्तर पर लौट आईं।
2008- वैश्विक मंदी: 147 डॉलर पर पहुंचा था क्रूड
2008 की वैश्विक मंदी के कारण 2008 में कच्चे तेल की कीमत में आग लगी थी। बता दें कि 2008 की मंदी वित्तीय बाजार के सबसे गंभीर संकटों में से एक था जो US हाउसिंग बबल और सट्टेबाजी वाली ट्रेडिंग की वजह से पैदा हुआ था। 2008 में, US हाउसिंग मार्केट में तेज़ी के बाद अचानक भारी गिरावट आ गई। 2011 की 'फाइनेंशियल क्राइसिस इन्क्वायरी कमीशन' की रिपोर्ट के अनुसार, बड़े पैमाने पर नियमों में ढील, कम ब्याज दरें और कर्ज देने के ढीले-ढाले मानकों की वजह से बैंकों ने ऐसे लोगों और व्यवसायों को भी मॉर्गेज देना शुरू कर दिया, जिनमें क्रेडिट रिस्क बहुत ज्यादा था। मुनाफ़े के लिए तेजी से की गई खरीद-बिक्री ने कीमतों में एक कृत्रिम और अचानक उछाल पैदा कर दिया। इस सट्टेबाज़ी वाले निवेश की वजह से कमोडिटी मार्केट में जबरदस्त तेजी आई, और तेल की कीमतें बढ़कर 147 डॉलर प्रति बैरल (Higest Oil Price) तक पहुंच गईं। हालांकि, बाद में 70 प्रतिशत से भी ज़्यादा की भारी गिरावट आई और वे लगभग 40 डॉलर प्रति बैरल के स्तर पर आ गईं।
2022- रूस का यूक्रेन पर हमला: 139 डॉलर के पार कच्चा तेल
2022 में, यूक्रेन पर रूस के हमले के बाद कीमतों में तेजी से उछाल आया। ब्रेंट क्रूड 139.13 डॉलर प्रति बैरल और WTI क्रूड 130.50 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गया, जो पिछले चार दशकों में सबसे ज्यादा था। यह उछाल इसलिए आया था कि रूस दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा तेल उत्पादक और दूसरा सबसे बड़ा कच्चे तेल का निर्यातक था। दुनिया को डर था कि अगर रूसी तेल बाजार से बाहर हुआ, तो उसकी भरपाई कोई नहीं कर पाएगा। वहीं, काला सागर (Black Sea) में युद्ध के कारण टैंकरों की आवाजाही बंद हो गई और बीमा की कीमतें बढ़ गईं। इसके चलते दुनिया भर की रिफाइनरियों ने डर के मारे स्टॉक जमा करना शुरू कर दिया, जिससे मांग अचानक बढ़ गई।
2026- अमेरिका का ईरान पर हमला: 115 डॉलर के पार कच्चा तेल
2026 में ईरान पर अमेरिका और इजरायल के संयुक्त सैन्य ऑपरेशन, उसके बाद हुई जवाबी कार्रवाई और स्ट्रेट ऑफ होर्मुज के बंद होने से कच्चे तेल की कीमत में जबरदस्त तेजी है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चा तेल 115 डॉलर के पार पहुंंच गया है। अमेरिका-इजरायल हमले से पहले ब्रेंट क्रूड 70 डॉलर के निचले स्तर पर ट्रेड कर रहा था।
पानी से कब सस्ता हुआ था कच्चा तेल?
COVID-19 महामारी और उसके बाद लगे लॉकडाउन ने तेल की कीमतों को ऐतिहासिक रूप से निचले स्तर पर पहुंचा दिया। अप्रैल 2020 में, WTI फ्यूचर्स नेगेटिव जोन में चले गए थे, यानी -37.63 डॉलर प्रति बैरल। जैसे-जैसे अर्थव्यवस्था खुली, कीमतें फिर से बढ़ीं। कच्चे तेल की कीमत में यह ऐतिहासित गिरावट कोरोना और लॉकडाउन के कारण हुआ था। कोविड-19 के कारण पूरी दुनिया में प्लेन, ट्रेन और गाड़ियां खड़ी थीं। तेल की मांग अचानक 'जीरो' के करीब पहुंच गई। वहीं, तेल का उत्पादन (Production) जारी था, लेकिन उसे रखने के लिए दुनिया भर के टैंक (Storage Tanks) फुल हो चुके थे। कुओं को बंद करना महंगा और तकनीकी रूप से कठिन था। 20 अप्रैल को मई महीने के लिए तेल के 'फ्यूचर कॉन्ट्रैक्ट्स' की आखिरी तारीख थी। ट्रेडर्स के पास तेल रखने की जगह नहीं थी, इसलिए उन्होंने घाटे में (माइनस में) सौदे बेचना शुरू कर दिया ताकि उन्हें तेल की फिजिकल डिलीवरी न लेनी पड़े।
Crude Oil Price History
सात बहनों का उदय
आज जिन कई बड़ी पेट्रोलियम कंपनियों को हम पहचानते हैं, उनकी शुरुआत भी अगले दशक में हुई कुछ घटनाओं से जुड़ी है:
Gulf Oil और Texaco की स्थापना 1901 में हुई थी, जब टेक्सास के Spindletop में तेल की खोज हुई थी।
Royal Dutch और Shell का 1907 में विलय हो गया और उन्होंने मिलकर Royal Dutch/Shell बनाई; इसका मकसद अमेरिकी कंपनियों से मिल रही कड़ी कीमत प्रतियोगिता के बावजूद बाज़ार में अपनी जगह बनाए रखना था।
Anglo-Persian Oil Company (जो अब BP है) की स्थापना 1908 में हुई थी, जब ईरान में तेल की खोज हुई थी।
Chevron, Exxon और Mobil (जो अब Exxon Mobil हैं) की स्थापना 1911 में हुई थी, जब अमेरिका के सुप्रीम कोर्ट ने Standard Oil को एंटीट्रस्ट कानूनों के उल्लंघन के आरोप में कई हिस्सों में बांट दिया था।
ये अंतरराष्ट्रीय तेल कंपनियां (IOCs) – BP, Chevron, Exxon, Gulf Oil, Mobil, Royal Dutch/Shell और Texaco – आगे चलकर ‘सात बहनें’ (Seven Sisters) के नाम से मशहूर हुईं। 1970 के दशक की शुरुआत में, जब वे अपने चरम पर थीं, तो दुनिया के 85% तेल भंडारों पर उन्हीं का नियंत्रण था।
