RCEP को भारत ने इसलिए कहा 'ना', नहीं किया अपने हितों से समझौता     

बिजनेस
Updated Nov 05, 2019 | 08:53 IST

Regional Comprehensive Economic Partnership (RCEP) : भारत ने आरसेप में शामिल होने से इंकार कर दिया है। यह कदम उसने अपने हितों को ध्यान में रखते हुए उठाया है।

India said no to RCEP, protected its domestic economy
आरसेप में शामिल नहीं होगा भारत। (तस्वीर-MEA) 

मुख्य बातें

  • आरसेप में शामिल होने से भारत ने किया है इंकार, समझौते को बताया 'असंतुलित'
  • पीएम मोदी ने कहा कि इस करार में भारतीय हितों की सुरक्षा का ध्यान नहीं रखा गया है
  • आशंका है कि इस करार के बाद भारत का घरेलू उत्पादन क्षेत्र बुरी तरह से प्रभावित होता

नई दिल्ली : दुनिया के ताकतवर कारोबारी ब्लॉक के रूप में उभर रहे क्षेत्रीय व्यापक आर्थिक भागीदारी (आरसेप) समझौते पर हस्ताक्षर करने से भारत ने इंकार कर दिया है। विशेषज्ञों का मानना है कि आरसेप का मौजूदा स्वरूप भारतीय घरेलू अर्थव्यवस्था के लिए अनुकूल नहीं है और आरसेप के इस मौजूदा स्वरूप के साथ भारत यदि आगे बढ़ता है तो उसके उत्पादन क्षेत्र पर प्रतिकूल असर पड़ेगा। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने आरसेप में शामिल न होने की वजह बताई है। उन्होंने कहा है कि यह समझौता वर्तमान वैश्विक हालातों एवं परिदृश्य के परिप्रेक्ष्य में भारतीय हितों की सुरक्षा सुनिश्चित नहीं करता। भारत के इस रुख के बाद आरसेप में शामिल अन्य 15 देश इस समझौते के साथ आगे बढ़ सकते हैं।  

चीन एक विशाल कारोबारी देश है जिसका विकास दुनिया के उत्पादन क्षेत्र को आच्छादित करके हुई है। भारत को आशंका है कि इस करार के बाद चीन से आयातित होने वाले इलेक्ट्रानिक्स एवं इंजीनियरिंग के सामानों में वृद्धि होगी और यह वृद्धि भारतीय उत्पादन क्षेत्र को नुकसान पहुंचा सकती है। इसलिए भारतीय वार्ताकारों ने यह एक अनुचित स्पर्धा से घरेलू उत्पादनकर्ताओं को बचाने के लिए कदम उठाए हैं।

दरअसल, इस समझौते से भारत के अलग होने के पीछे चीन के साथ बढ़ता उसका कारोबार घाटा भी है। चीन के साथ भारत का व्यापार घाटा 50 अरब डॉलर से ज्यादा का हो गया है और आरसेप का मौजूदा स्वरूप कहीं न कहीं इस व्यापार घाटे की खाई को और चौड़ा करता।

क्या है आरसेप
आरसेप एक कारोबारी समझौता है जिसमें भारत सहित 16 देश शामिल हैं। इसमें आसियान के 10 देश-ब्रुनेई, कम्बोडिया, इंडोनेशिया, लाओस, मलेशिया, म्यांमार, फिलिपींस, सिंगापुर, थाइलैंड, वियतनाम और इस गुट के साथ मुक्त व्यापार समझौता (एफटीए) रखने वाले भारत, चीन, ऑस्ट्रेलिया, कोरिया, जापान और न्यूजीलैंड शामिल हैं। इस समझौते का उद्देश्य 16 देशों में फैले हुए एक 'एकीकृत बाजार' का निर्माण करना है। इसका मतलब है कि इन 16 देशों की वस्तुएं एवं सेवाएं बाधारहित इस पूरे क्षेत्र में आसानी से उपलब्ध होंगी। इस समझौते को अब तक का सबसे बड़ा क्षेत्रीय कारोबारी समझौता बताया जा रहा है। इसमें शामिल देशों में दुनिया की करीब आधी आबादी रहती है। 

Modi at RCEP

'मेरा जमीर इसमें शामिल होने की इजाजत नही ंदेता'
समझा जाता है कि इस समझौते से भारत के पीछे हटने के बाद आरसेप के अन्य 15 देश इस करार के साथ आगे बढ़ेंगे और साल 2020 में आरसेप समझौते पर दस्तखत हो जाएंगे।  पीएम मोदी ने बैंकॉक में कहा कि आरसेप का मौजूदा स्वरूप अपने असली भाव एवं पहले से सहमत सिद्धांतों का प्रदर्शित नहीं करता। उन्होंने कहा, 'जब मैं आरसेप समझौते को सभी भारतीय नागरिकों के हितों की नजर से देखता हूं तो मुझे सकारात्मक जवाब नहीं मिलता है। इसलिए गांधी जी के सिद्धांत और मेरा जमीर आरसेप में शामिल होने की इजाजत नहीं देते।' 

भारतीय बाजार में छा सकते हैं चीन के सस्ते उत्पाद 
भारत को आशंका है कि इस समझौते के बाद देश में आयातित होने वाली वस्तुओं एवं सेवाओं की बाढ़ आ जाएगी लेकिन करार में पर्याप्त सुरक्षा का अभाव है। भारत को डर है कि ऐसी सूरत में चीन के सस्ते उत्पादों से भारतीय बाजार पट जाएगा और घरेलू वस्तुओं के उत्पादन पर नकारात्मक असर होगा। यही नहीं, आरसेप के अन्य देशों ने यह विश्वसनीय भरोसा नहीं दिया है कि वे अपने यहां भारतीय वस्तुओं एवं सेवाओं की ज्यादा पहुंच देंगे। इसके अलावा भारत ने कथित रूप से कई उत्पादों पर टैरिफ में कमी या उसे खत्म किए जाने की भी आशंका जताई है। 

भारतीय उद्योग जगत ने जताई है चिंता
भारतीय उद्योग जगत के कई धड़ों ने आरसेप में भारत के शामिल होने पर चिंता जताई है। भारतीय थिंक टैंक का कहना है कि इस समझौते के बाद आरसेप देशों की सस्ती वस्तुएं एवं सेवाएं उपलब्ध होंगी और इससे देश के घरेलू उत्पादन क्षेत्र को नुकसान पहुंच सकता है। खासतौर से ऑस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड के डेयरी उद्योग से भारत के दुग्ध उत्पादन क्षेत्र को कड़ी स्पर्धा का सामना करना पड़ेगा। इसे देखते हुए सिविल सोसायटी और कारोबार क्षेत्र के विशेषज्ञों ने आरसेप डील से भारत को हासिल होने वाले लाभ पर सवाल खड़े किए हैं।

राजनीतिक दलों ने किया विरोध
इस आरसेप समझौते का विरोध लेफ्ट पार्टियों के अलावा राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के स्वदेशी जागरण मंच और अन्य राजनीतिक दलों ने किया है। इन दलों ने भारत सरकार को इस करार से दूर रहने के लिए आगाह किया है। कांग्रेस नेता जयराम रमेश ने कथित रूप से कहा है कि नोटबंदी और जीएसटी के लागू होने के बाद यह करार भारत के लिए 'आत्मघाती' साबित हो सकता है। 

भारत को राजी करने के हो सकते हैं प्रयास
भारत के इस करार से अलग हो जाने के बाद अन्य 15 देश आरसेप के साथ आगे बढ़ेंगे और हो सकता है कि आने वाले समय में वे भारत को इसके लिए राजी करें। भारत के अपने रुख में बदलाव तभी होगा जब उसकी चिंताओं का समाधान हो। भारत के लिए यह जरूरी भी था कि वह अपनी घरेलू अर्थव्यवस्था को किसी भी कीमत पर बचाए। यह अच्छी बात है कि वैश्विक दबावों के आगे भारत इस बार झुका नहीं और उसने अपने हित की बात रखी। दुनिया को भारत के बाजार की जरूरत है इसलिए यह उम्मीद है कि मौजूदा वैश्विक व्यापार परिदृश्य के अनुरूप आरसेप अपनी करार प्रावधानों में बदलाव करेगा।

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