हम 100 प्रतिशत* भारतीय लोग ‘दैनिक ठगी’ के शिकार हैं !

बिजनेस
Updated Aug 09, 2019 | 11:59 IST | अश्विनी कुमार

किसी सेलिब्रिटी की ‘सिफारिश’ पर सामान या सेवा खरीदने वालों के लिए अच्छी खबर है। अगर वह सामान/सेवा दावे के अनुसार नहीं निकला, तो आप उक्त सेलिब्रिटी को जेल की हवा खिला सकते हैं। ऐसा नया कानून कहता है।

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भ्रामक विज्ञापन करना पड़ेगा सेलिब्रिटीज को भारी  |  तस्वीर साभार: BCCL

मुख्य बातें

  • इस कानून से ठगी पर लगाम लगेगी।
  • इसके तहत सेलिब्रिटी 2 से 5 साल तक के लिए जेल जा सकते हैं।
  • भ्रमित विज्ञापन के कारण सेलिब्रिटी पर 10 से 50 लाख तक का जुर्माना हो सकता है।

न जाने एक खास साबुन की कितनी टिकिया घिस डाली, गोरे तो हुए नहीं! गोरे होने की क्रीम भी लगाई। वह भी बेअसर! बच्चों की लंबाई बढ़ाने के फूड सप्लीमेंट पिला-पिलाकर थक गए। ग्रोथ में कोई चमत्कार तो हुआ नहीं। उस वाले खास तेल से सिर पर अब तक तो बाल लहलहा जाने थे। हालत ये है कि लेंस से ढूंढने पर भी मिल नहीं रहे। बिल्डर ने घर बुक कराते वक्त समय पर फ्लैट देने और तमाम सुविधाओं का जिक्र किया था। यहां तो घर तक नहीं मिले। गाड़ी ली थी। न माइलेज का दावा सही निकला, न फीचर्स दावे के मुताबिक हैं। विज्ञापनों में जिन हीरो/हिरोइन/क्रिकेटर्स का थोपड़ा देख कर भरोसा पाला था, वे तो अब कई दूसरे प्रोडक्ट ‘बेचते हुए’ टीवी पर दिखते हैं। उन पर किया हमारा भरोसा गया भाड़ में!

बड़ी हसरतों के साथ आप आए दिन कोई ऐसी चीजें/सेवाएं जरूर खरीदते होंगे, जिनमें किए गए दावे कभी पूरे ही नहीं हुए। बेशक उन चीजों और सेवाओं के साथ किसी बड़े सिलिब्रिटी का भरोसा जोड़ा गया हो। सपने दिखाए गए हों। याद कीजिए। दो-तीन दिन या अगले वीक एंड पर फुर्सत के पलों में याद कीजिएगा। एक नहीं, कई ऐसी ठगी आपको याद आएगी। यानी अगर हम कहें कि इस देश की 100 फीसदी आबादी ठगी की शिकार है, तो गलत नहीं होगा। *अगर आप नहीं हैं, तो सौभाग्यशाली अपवाद हैं।

...तो सेलिब्रिटी जाएंगे जेल !

सरकार कहती है कि अब ऐसी ठगी पर लगाम लगेगी। खासतौर से किसी सेलिब्रिटी को आगे कर उपभोक्ताओं को मूर्ख बनाना आसान नहीं रह जाएगा। कानून संसद ने बना दिया है। पक्ष के साथ विपक्ष की पार्टियों ने ध्वनिमत से उपभोक्ताओं के हितों की चिंता की है। अब विज्ञापन से भ्रम फैलाने वालों की खैर नहीं। सेलिब्रिटी 2 से 5 साल तक के लिए जेल जा सकते हैं। 10 से 50 लाख तक का जुर्माना उन पर हो सकता है। सुनने में पहल अच्छी लगती है। उपभोक्ताओं के हक में लगती है। लेकिन इसके बाद भी उपभोक्ताओं के हित क्या सुरक्षित और संरक्षित रह पाएंगे?

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कोई सेलिब्रिटी कैसे तय करेगा?

वेस्टइंडीज रवाना होने के ठीक पहले विराट कोहली कोई विज्ञापन शूट कर रहे थे। मीडिया में उनकी तस्वीरों के साथ जो रिपोर्ट आई, उससे यही लगा कि कोहली अपने बेहद व्यस्त समय में से कुछ घंटे निकालकर इस काम के लिए आए थे। अब कानून सख्त हो गया है, तो क्या कोहली आईंदा कोई विज्ञापन शूट करने से पहले उस प्रोडक्ट की पूरी छानबीन करेंगे? उसके कंपोजीशन की जांच करेंगे? फिर किए जा रहे दावों के पैमाने पर उसे परखेंगे? इसके बाद तय करेंगे कि उन्हें वह विज्ञापन करना है या नहीं?

और हां, एक और सबसे बड़ी बात। कोहली इस काम को करेंगे कैसे? उनकी मदद कौन करेगा? जो मदद कर रहा होगा, क्या वह इतना दक्ष होगा कि प्रोडक्ट के दावों और हकीकत की बारीकी से जांच कर पाए? क्या इस काम में कोहली की मदद के लिए कोई सरकारी एजेंसी होगी?

लेकिन ऐसी किसी एजेंसी की अलग से जरूरत ही क्यों सोची जाए? आखिर देश में बिकने वाले हर प्रोडक्ट को बाजार में उतारे जाने से पहले इसकी इजाजत देने के लिए कोई न कोई तो सक्षम एजेंसी होगी? क्यों न उनकी ही इस बात की जिम्मेदारी सुनिश्चित कर दी जाए कि आप दावों और हकीकत का मिलान करेंगे। इसके बाद ही प्रोडक्ट बाजार में उतरने की अनुमति पा सकेगा! सच यह है कि ऐसा है भी। लेकिन तमाम मामलों में या तो लापरवाही होती है, करप्शन का खेल होता है या फिर बड़े-बड़े ब्रांड्स (कंपनियों/उद्योगपतियों) के आगे ऐसी एजेंसियां बड़ी दुर्बल-सी नजर आती हैं।

धोनी और आम्रपाली की कहानी

प्राइवेट बिल्डर आम्रपाली की कहानी हमारे सामने है। ये कहानी दरअसल बेहद दिलचस्प भी है हैरान करने वाली भी। महेंद्र सिंह धोनी के बड़-बड़े होर्डिंग्स और कटआउट लगाकर इसने हजारों लोगों की जेबें साफ कर दीं। अब धोनी खुद अपने-आप को आम्रपाली वालों की ठगी का शिकार बता रहे हैं। हालांकि सुप्रीम कोर्ट की सख्ती के बाद जांच में कुछ ऐसी बातें कही जा रही हैं कि खरीदारों के पैसे धोनी के करीबी की कंपनी में गलत तरीके से ट्रांसफर किए गए। वैसे ये सब जांच का विषय है। जांच से पहले धोनी कतई दोषी नहीं माने जाएंगे। लेकिन जो एक बात तय है, वह यह कि धोनी जैसे बड़े नाम की वजह से भी कई खरीदार जरूर भ्रमित हुए। इस लिहाज से नया कानून शायद धोनी को दोषमुक्त नहीं मानता।

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लेकिन फ्रॉड बैंक वालों की कान कौन पकड़ेगा?

इसी मामले में एक और फ्रॉड जो शीशे की तरह साफ है, वह है बैंकों की मिलीभगत। सुप्रीम कोर्ट ने भी आम्रपाली केस में इस ओर इशारा किया है। दरअसल, आम्रपाली या दूसरे बिल्डरों की धोखाधड़ी में सेलिब्रिटी से भी ज्यादा भरोसा खरीदारों में इस बात को लेकर बनता है कि कोई खास प्रोजेक्ट बैंक से अप्रूव है या नहीं? उस पर लोन हो रहा है या नहीं? अकसर ये तथ्य सौदे के वक्त सबसे प्रमुख हो जाता है। इन धोखेबाज बिल्डरों के मामलों में बैंक दनादन 90 प्रतिशत तक लोन फ्लैट खरीदारों को बांट रहे थे। आकर्षक दरें दे रहे थे। बगैर हिचक के किश्तें जारी कर रहे थे। सवाल है कि किसी प्रोजेक्ट को पास कर देने के बाद होने वाले फ्रॉड से ये बैंक क्यों मुक्त कर दिए जाएं?

दूसरे बड़े देशों में क्या नियम है?

अमेरिका में हाल ही में एक बड़ा सर्वे हुआ। पता किया गया कि किन सामानों या सेवाओं में सबसे ज्यादा शिकायतें आ रही हीं। मालूम पड़ा की ऑटो कंपनियों के खिलाफ वादे पूरे न करने के सबसे ज्यादा मामले हैं। बाकायदा अलग-अलग चीजों में उपभोक्ताओं से हुई वादाखिलाफी की लिस्ट सामने आई। वहां का कानून ऐसे मामलों में फास्ट एक्शन लेता है। लिहाजा लोग शिकायतें लेकर भी जाते हैं और उन्हें इसका लाभ भी हासिल होता है। हमारे यहां अगर एक्शन हो भी, तो इतना धीमा और देरी से कि ज्यादातर लोग धोखाधड़ी को सह लेने में ही भलाई समझते हैं।

मिलावट देश में जन्मसिद्ध अधिकार है !

बात विज्ञापनों के भ्रम से बचाने की हो रही है। कंपनियों और सेलिब्रिटी पर सख्त कार्रवाई होने की बात है। कंपनियों और उनके प्रोडक्ट्स को प्रचारित करने वालों पर अगर इसका थोड़ा भी असर होता है, तो ये उपलब्धि होगी। लेकिन स्थानीय स्तर (गली-मोहल्लों के बाजार में) पर मिलावट योग्य सामान की गुणवत्ता कौन तय करेगा? साल में दो-एक बार तीज-त्योहारों पर डलने वाले छापों से क्या उपभोक्ताओं के हित सुरक्षित हैं?

बड़ी-बड़ी कंपनियों के आकर्षक वादों से लेकर बाबाओं के चमत्कार के दावों तक। ब्रांडेड फूड पैकेट्स से लेकर रेहड़ी पर बिकने वाली रंगी हुई सब्जियों तक। सुपर स्पेशियलिटी अस्पतालों से लेकर आलीशान प्राइवेट स्कूलों तक। मिलने वाले भरोसे और किए जाने वाले दावे हर रोज टूटते हैं। उपभोक्ता के हितों की सुरक्षा के लिए उठाए गए हर कदम का स्वागत है। लेकिन सरकारों को मानना पड़ेगा कि अभी इस दिशा में शायद एक प्रतिशत भी काम नहीं हुआ है। हां, 15 मार्च को इंटरनेशनल कंज्यूमर डे और अपने देश में 24 दिसंबर को राष्ट्रीय उपभोक्ता दिवस हम जरूर नियमपूर्वक मनाते हैं और मनाते रहेंगे।
(डिस्क्लेमर : अश्विनी कुमार अतिथि लेखक हैं और ये इनके निजी विचार हैं। टाइम्स नेटवर्क इन विचारों से इत्तेफाक नहीं रखता है।)

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